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Showing posts from September, 2008

अल्लाह की मर्जी का आउटसोर्स

Technorati Tags: ,,,,,, इस्लामाबाद में धमाका हुआ, होना ही चाहिए था. जरदारी साहब गुस्साए, उन्हें गुस्साना ही चाहिए था. पर उनके गुस्साने में एक गड़बड़ हो गई. जैसा कि अकसर होता है. इसीलिए कहा जाता है- गुस्सा बुरी बात है. पर अब तो साहब गुस्सा चुके थे और इस गुस्साने का कुछ किया नहीं जा सकता था. गुस्से में वह वह बोल गए जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था. उन्होंने कहा- हम इन कायराना हमलों से नहीं डरेंगे. 'तो मत डरिए, आपको डरने के लिए कहा ही किसने? पर जनाब! इसे कायराना तो मत कहिए. अभी कल तक आप और आपके रकीब इन्हें महान लोगों में गिना करते थे. आपकी नजर में ये वे लोग थे जो दीन के लिए और दूसरे देशों की दबी-कुचली अवाम के लिए बड़ी बहादुरी से लड़ रहे थे. ये अलग बात है कि अपने मुल्क के अवाम की फिक्र न तो आपको हुई, न आपके पहले के हुक्मरान को हुई और उसे दबाने-कुचलने के लिए आपने और आपके पुराने हुक्मरान ने इनका बेसाख्ता इस्तेमाल कर बेहिसाब सबाब लूटा.' हमारे गांव के जुम्मन मियां ने एकदम तुरंत प्रतिक्रिया दी. जुम्मन मियां की आदत है, वह तुरंत प्रतिक…

ज़रा सुनिए पाटिल महाराज

दिल्ली में ताबड़तोड़ हुए धमाको  और उनमें कई लोगों की जान जाने के बाद दूसरे दिन जितनी भी बैठके हुईं, सबमें केन्द्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल अलग-अलग परिधानों में दिखाई दे रहे थे. मीडिया ने इस बात की जबर्दस्त आलोचना की. यह अपेक्षा न करें कि मैं यह कहूंगा कि आलोचना नहीं की जानी चाहिए. कायदे से तो इस बात की कड़ी भर्त्सना की जानी चाहिए. मीडिया ने नहीं की, इसके लिए वह आलोचना की पात्र है. पर अब इस बात पर पाटिल की सफाई आई है. पाटिल ने कहा है के मैं साफ-सुथरा रहता हूं. आप राजनेता की नीतियों की आलोचना करें, उसके कपड़ों की नहीं। मैं पाटिल को बताना चाहता हूं कि मान्यवर यह आपकी नीतियों की ही निंदा है, कपड़ों की नहीं एक ऐसे समय में जब पूरा देश जल रहा हो और तब आपका ध्यान अगर बार-बार कपड़े बदलने पर लगा हो तो जाहिर है कि देश और जनता से आपका कोई मतलब नहीं है. दुलहन के जोड़े में सजी बैठी लड़की के पड़ोस में भी अगर आग लग जाए तो अपने शृंगार और कपड़ों की परवाह छोड़कर उसे बुझाने की कोशिश में जुटेगी. ऐसी स्थिति में दिन में एक बार भी कपड़े बदल लेना काफी है. और एक ऐसे राजनेता के लिए, जो पूरे देश की सुरक्षा और व…

भूक दहक और धुआं

---मंथन
आज दिल की चिमनियों से, उठ रहा है इक धुआं
भूख से दहक रहा है, मुफलिसों का कारवां
खेत की खुशहालियां तो, साहुकार ले गए
होरी और धनिया के लिये, है सिर्फ़ इम्तिहाँ
उन हवेलियों की ज़ुल्म ढाती , ऊँची गुम्बदें
आबरू अपनी लुटाके , जा रही शोषित वहां
हुक्मरान हमसे कह रहे हैं, चैन से रहो
शर्त इतनी है की हमको , बंद रखनी है ज़बां
कौडिओं के मोल में ज़मीर, जिनके बिक गए
उनके वास्ते ज़मीन है , न और आसमां
आओ मुट्ठी बांधकर कसम, उठाये आज हम
फूँक डाले ज़ुल्म को , बनाये इक नया जहाँ

(manthan ji ki kuch panktiya mujhe achi lagi, aapake samane rakh raha hun)







Spartacus

1.
People were sold and purchased like cattle;
They were treated no better than animal.
Their only duty to obey their ruthless masters;
They were backbone of Roman Empires.
Slaves could not dream of a better life;
They were never allowed for any strife.

2.
Five centuries ago before the birth of Christ
The last emperor of Rome was thrown from dice
Traquin's ruthless nature was not like by public
The Patrician decided to establish a republic.
After revolt, to look after the governance of state;
The heads of those families created a Senate.

3.
Plebians were, too, considered citizens;
They were given little right in horizon.
Tiberius and Gaius tried to reform the polity
But these two brothers killed with brutality.
A civil war broke out all around the empire
The Roman kingdom was on faming fire.

4.
During the turmoil, degeneration and fault
With anger, slaves raised the banner of revolt.
It was impossible to smother the flame of…

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