कोर्ट पर हमला क्यों?


सत्येन्द्र प्रताप
वाराणसी में हुए संकटमोचन और रेलवे स्टेशनों पर विस्फोट के बाद जोरदार आंदोलन चला. भारत में दहशतगर्दी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था जब गांव-गिराव से आई महिलाओं के एक दल ने आतंकवादियों के खिलाफ फतवा जारी किए जाने की मांग उठा दी थी. बाद में तो विरोध का अनूठा दौर चल पड़ा था। संकटमोचन मंदिर में मुस्लिमों ने हनुमानचालीसा का पाठ किया और जबर्दस्त एकता दिखाई. मुस्लिम उलेमाओं ने एक कदम आगे बढ़कर दहशतगर्दों के खिलाफ़ फतवा जारी कर दिया.

इसी क्रम में न्यायालयों में पेश किए जाने वाले संदिग्धों के विरोध का भी दौर चला और वकीलों ने इसकी शुरुआत की। लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद में वकीलों ने अलग-अलग मौकों पर आतंकवादियों की पिटाई की थी।शुरुआत वाराणसी से हुई. अधिवक्ताओं ने पिछले साल सात मार्च को आरोपियों के साथ हाथापाई की और उसकी टोपी छीनकर जला डाली। आरोपी को न्यायालय में पेश करने में पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी. फैजाबाद में वकीलों ने अयोध्या में अस्थायी राम मंदिर पर हमले के आरोपियों का मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया। कुछ दिन पहले लखनऊ कचहरी में जैश ए मोहम्मद से संबद्ध आतंकियों की पिटाई की थी.
राजधानी लखनऊ के अलावा काशी तथा फैजाबाद के कचहरी परिसर बम विस्फोटों से थर्रा उठे हैं। यह सीधा हमला है आतंकियों का विरोध करने वालों पर। कश्मीर के बाद यह परम्परा देश के अन्य भागों में भी फैलती जा रही है. नीति-निर्धारकों और चरमपंथियों का समर्थन करने वालों को एक बार फिर सोचा होगा कि वे देश में क्या हालात बनाना चाह रहे हैं.

Comments

  1. यह किसी चरमपंथी-वन्थी का हमला नहीं है सत्येन्द्र भाई. यह हमला है उन राजनेताओं का जिनकी नस-नस में नकारापन और तुष्टीकरण का फार्मूला भरा है. यह हमला है उस जनता पर जो सब कुछ सह कर भी अभी जूता उठाने में संकोच कर रही है. सोचने की बात है कई सिम्मी उत्तर प्रदेश में पिछले बीस सालों से अपने गढ़ बना रही है और इसके बावजूद हमारे राजनेता कुछ नहीं कर रहे. यहाँ तक की मुसलमानों के खुद चरमपंथियों के खिलाफ आवाज उठाने के बाद भी कुछ नहीं किया जाता. और तो और, नंदीग्राम की सार्थक लड़ाई को अचानक तस्लीमा नसरीन के फालतू विरोध की और मोड़ दिया जाता है और पूरे देश के बुद्धिजीवी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं. डर है, कहीं प्रतिक्रियावादी न करार कर दिए जाएं! इन बेवकूफियों का कहीं तो कोई अंत हो!

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  2. यही तो बात है भइया। मुसलमान के खिलाफ बोलना दक्षिणपंथ है। मुसलमान का समर्थन करना बुद्धिजीविता यानी वामपंथ है। सिर्फ विरोध करने के लिए मुसलमानों का विरोध करना दक्षिणपंथियों का काम है। सही और गलत का आंकलन करना नहीं।
    एक बात और। एक नई विचारधारा चल पड़ी है। लोग कहते हैं कि दक्षिण पंथियों ने फैलाई। मुसलमान आतंकवादी है।
    उधर एक विचारधारा और चल पड़ी है। लोग कहते हैं कि वामपंथियों ने फैलाई। कश्मीर में आतंकवाद नहीं। वह तो सर्वहारा यानी चरमपंथियों का पूंजीवादी-जमींदारों यानी कश्मीरी पंडितों के खिलाफ संघर्ष है।
    हमारे जैसे आम लोगों की जीभ खींचने के लिए तो दोनों पंथी तैयार बैठे रहते हैं। कब समझेंगे ये लोग, कि आतंकवाद, दुराचार, दहशतगर्दी आदि-आदि बुरी चीज है। इसे धर्म से जोड़ना बन्द करें।इसे पंथ से जोड़ना बंद करें।
    एक नया अखबार आया है। मेल टुडे। गंदी बात लिखी थी इसलिए चर्चा नहीं की। क्योंकि चर्चा में आने के लिए ही ऐसी बातें लिखी जाती हैं। लेकिन प्रसंगवश। उसके दूसरे संस्करण में ही पहले पेज की खबर थी । साफ लिखा था कि गुजरात में मुसलमानों को वोटिंग आई काडॆ नहीं दिया जा रहा है। उन्हें वोट से वंचित किया जा रहा है। आंकड़े थे सूरत के और फोटो थी ऐसी, जिसमें दूसरे के आई कार्ड पर दूसरे की फोटो थी।
    अरे विद्वानों... कब तक आम आदमी को चूतिया बनाकर दुकान चलाओगे। मैंने भी रिपोर्टिंग की है। हर जिले में हजारों लोगों के आई कार्ड नहीं बने हैं। मैं भी उसमें से एक हूं। सूरत जैसे शहर के लिए विद्वान रिपोर्टर ने आई कार्ड न बने लोगों की संख्या हंड्रेड्स लिखी थी । यानी कि जिस जिले की आबादी २० लाख से ऊपर है वहां एक हजार से भी कम। जरा कोशिश करके गिन लेते कि वहां कितने हिंदुओं के आई कार्ड नहीं बने हैं तो शायद उसकी ४० गुनी संख्या निकल आती। सेंसेशन के लिए और दूकान चलाने के लिए खून खराबा की नौबत न लाओ नहीं तो चरमपंथ तो बढ़ेगा ही। स्थितियों का सही आकलन करके ही सही दिशा में चला जा सकता है।

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  3. यह सब सही लग रहा है।

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  4. सत्येन्द्र प्रताप जी आपसे सहमत हूँ. एक विचारोतेजक लेख लिखा आपने.
    "सेंसेशन के लिए और दूकान चलाने के लिए खून खराबा की नौबत न लाओ नहीं तो चरमपंथ तो बढ़ेगा ही। स्थितियों का सही आकलन करके ही सही दिशा में चला जा सकता है।"

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  5. अरे भाई हम सब तो नपुंसक बन गए हैं .सिर्फ मूकदर्शक बनकर देखना हमारी विवशता है,हमला चाहे लोक तंत्र के दिल संसद पर हो या लालकिले या न्यायपालिका पर हमारा खून नहीं खौलता. हमे शर्म नहीं आती. संजय दत्त के प्रति कभी हम सहानुभूति की बात करते हैं तो कभी अफ़ज़ल को भूल जाते हैं.आखिर कब तक हम सोए रहेंगे?

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