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मैंगो मैन का बनाना रिपब्लिक

इष्ट देव सांकृत्यायन भारतीय स्त्री को अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा पसंद है तो वह है सोना. केवल क्रिया ही नहीं , संज्ञा और यहां तक कि विशेषण के रूप में भी. मेरे एक मामाजी तो कहा करते थे कि महिला लोगों का अगर वश चले तो पति को भी बेच कर सोना ख़रीद लें. जहां तक बात पति टाइप लोगों की है , तो वे उनकी सोने की मांग को केवल क्रिया के रूप में ही समझना चाहते हैं. लेकिन वाक़ई सोना कितना ज़रूरी है और आम आदमी के लिए इसकी कितनी अहमियत है , यह बात अब जाकर समझ में आई. तब जब भारत सरकार ने तय कर लिया है कि वह आम आदमी से सोना ख़रीदेगी. पहले तो मुझे लगा कि यार मैं भी आम आदमी हूं और इस लिहाज़ से मुझे भी   सोना बेचना चाहिए. जब सरकार ही ख़रीदेगी तो ज़ाहिर है कि अच्छा दाम देगी. श्रीमती जी से कहा कि सरकार सोना ख़रीदने की बात कर रही है , ऐसा करते हैं कि हम लोग भी कुछ बेच देते हैं. इतना कहना था कि श्रीमती जी फायर हो गईं , ‘ आप क्या समझते हैं , आपका पड़े-पड़े सोना सरकार ख़रीदेगी ? अगर क्रिया में सोना सरकार को ख़रीदना होता तो उसके लिए उसे जनता से गुहार लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. इसके लिए उसकी पुलिस ही...

कस्तूरी कुंडल बसै...

इष्ट देव सांकृत्यायन   पता नहीं , भ्रष्टाचार जी ने कुछ लोगों का क्या बिगाड़ा है जो वे आए दिन उनके पीछे ही पड़े रहते हैं। कभी धरना दे रहे हैं कि भ्रष्टाचार मिटाओ , कभी प्रदर्शन , नारेबाजी , रास्ताजाम... और न जाने क्या-क्या! कभी दिल्ली का रामलीला मैदान भर डाला और कभी जंतर-मंतर पर लोगों का आना-जाना दुश्वार कर दिया। ख़ैर , भ्रष्टाचार जी को इससे फ़र्क़ ही क्या पड़ता है! उन्होंने ऐसे बहुत लोगों को आते-जाते देखा है। इसीलिए तो वह पूरे आत्मविश्वास के साथ गाते रहते हैं , ' तुमसे पहले कितने जोकर आए और आकर चले गए/कुछ जेबें भरकर गुज़र गए कुछ जूते खाकर चले गए ....’ । एक वही हैं जिनके लिए जाने कहां से लगातार यह सदा आती रहती है , ' वीर तुम बढ़े चलो/धीर तुम बढ़े चलो/.... सामने पहाड़ हो/ सिंह की दहाड़ हो/ तुम निडर हटो नहीं/ तुम निडर डटो वहीं... ’ । फ़ि लहाल तक की हिस्ट्री तो यही है कि उन्हें भगाने जितने आए , ख़ुद ही चले गए। अब यह अलग बात है कि चले जाने के सबके अपने अलग-अलग तरी क़े थे। कुछ तोप चलाकर चले गए , कुछ जांच कराकर चले गए , कुछ हल्ला मचाकर चले गए , कुछ इलेक्ट्रॉनिक कैंपेन चलाकर चल...

apsamskriti ka khatra

व्यंग्य                                                       अपसंस्कृति का खतरा                                                                                                             -हरिशंकर राढ़ी दूसरी किश्त  सड़कीय समारोहों पर प्रतिबंध् आसन्न अपसंस्कृति का सबसे बड़ा उदाहरण है। देश  के लोगों की रंगीनियत, जज्बे और मितव्ययिता का सम्मिलित रूप है सड़कों का ऐसा प्रयोग! गैरसरकारी संगठनों, सरकारों और न्यायालयों का यातायात के लिए परेशान होना सर्वथा अनावश्यक और तर्कहीन है। अपने देश का यातायात आज तक कभी रुका है क्या? यातायात रुक जाएगा, ऐसा सोचकर आप अपने देश  क...

अपसंस्कृति का खतरा

-  हरिशंकर राढ़ी ऐसा पहली बार होगा कि देश की संस्कृति की चिन्ता करने वाले मेरी किसी बात से इत्तेफाक रखेंगे। बात यह है कि अब मैं भी यह मानने लगा हूं कि देश  में अपसंस्कृति का प्रसार हो रहा है। हालांकि इस प्रकार की स्वीकारोक्ति से मैं देश  की युवाशक्ति  का समर्थन खो दूंगा और मेरी गणना भी खब्तियों में होने लगेगी। युवाशक्ति के समर्थन से हिम्मत दुगुनी रहती है और इस बात का गुमान रहता है कि मैं भी युवा हूं। युवाशक्ति से मेरा कोई प्रत्यक्ष हितलाभ नहीं है क्योंकि मैं कोई चुनाव लड़ने नहीं जा रहा जिसके लिए मुझे युवाशक्ति के रैपर में लिपटे वोट की दरकार हो। फिर भी आत्मरक्षा की दृष्टि  से इस वर्ग से पंगा लेना ठीक नहीं। जब भी ऐसी चर्चा होती है कि देश  में अपसंस्कृति का प्रसार हो रहा है, युवावर्ग फायरिंग पोजीशन  में आ जाता है। कुछ युवापार लोग भी इनके समर्थन में आ जाते हैं क्योंकि इसी अपसंस्कृति के चलते उन्हें  भी सुखद मौके मिल जाते हैं । ऐसी दशा  में संस्कृति के संवाहकों की चुनौती दोहरी हो जाती है। जिसे अप...

Aachar ka Yuddh

आचार का युद्ध   (दूसरी किश्त )                   - हरिशंकर  राढ़ी   भ्रष्टाचार  से लड़ने का एक हथियार ढूँढ़ निकाला गया है। यह इस युद्ध की अब तक की सबसे बड़ी सफलता है। सभी जानते हैं कि आधुनिक युद्ध शारीरिक या मानसिक बल से नहीं लड़े जाते। नए युद्ध पूरी तरह हथियारों पर निर्भर हैं। इसीलिए दुनिया के सारे देश  हथियारों की साधना में लगे हैं। पड़ोसी तो हथियारों के दम पर कई युद्ध लड़कर और हारकर भी हथियारों की बटोर में लगे हैं। कलेजा भले ही बकरी का हो पर तलवार तो राणा प्रताप की ही चाहिए। बाजरे की रोटी का ठिकाना भले न हो, पर कर्ज लेकर परमाणु अस्त्र तक बनाएंगे। ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में हथियार का निश्चित  हो जाना कोई कम बात नहीं है। मजे की बात यह है कि दोनों ही दलों ने एक ही प्रकार के हथियार का चयन किया है। वह महत्त्वपूर्ण हथियार है कानून। सबसे बड़ी बात है कि कानून के हाथ बड़े लम्बे होते हैं, ऐसा यहाँ अज्ञातकाल से माना जाता है। पहले भगवान के हाथ लम्बे होते थे, बाद में क...

स्वर एकादश: अग्निशेखर और केशव तिवारी की आवाज़

डॉ. गणेश पाण्‍डेय बोधि प्रकाशन ने ग्यारह कवियों का एक अच्छा संकलन ‘स्वर-एकादश’ निकाला है। इस संकलन की वजह से कई कवियों ने खासतौर से ध्यान खींचा है। संकलन में संकलित कवियों के स्वर की विविधता ने ही नहीं, बल्कि तीव्रता ने भी चौंकाया है। इनमें कई ऐसे कवि हैं जो काफी समय से लिख रहे हैं। अलग-अलग अवसरों पर उनकी कविताओं ने पहले भी ध्यान खींचा है। पर यहाँ ठहर कर और एक साथ कई कवियों की रोशनी के बीच देखने पर इनका महत्व बढ़ जाता है। भूमिका में ठीक ही कहा गया है कि इनके स्वर अलग-अलग हैं। हर कवि के स्वर की निजता कविकर्म की बुनियाद है। जो कवि अपने कविता-संसार में अपनी निजता की रक्षा नहीं कर पाते हैं, वे अपनी कविता को नकली कविता की जमात में पहुँचा देते हैं। अच्छे कवि विचारधारा के आग्रह के बावजूद कविताई में अपनी छाप रखते हैं। विचारधारा ही नहीं, संवेदना के स्तर पर भी हर मजबूत कवि अपनी निजता को बचाये रखता है। तभी उसकी कविता नकल होने से बचती है। इस संग्रह की कविताओं में अपने परिवेश के प्रति जो लगाव है, दरअसल वह कवि जीवन का कविता के प्रति स्वाभाविक व्यवहार है। प्रकृति, समाज, रिश्ते, प्रेम इत्यादि स...

प्रदीप सक्‍सेना को डॉ.रामविलास शर्मा आलोचना सम्‍मान

जोकहरा स्थित श्री रामानन्‍द सरस्‍वती पुस्‍तकालय में  ‘ गोष्‍ठी : इतिहास और आलोचना ’  विषय पर आयोजित एक भव्‍य समारोह में हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो.नामवर सिंह ने प्रो.प्रदीप सक्‍सेना को शॉल ,  प्रशस्ति पत्र ,  नगद राशि प्रदान कर वर्ष 2012 का डॉ.रामविलास शर्मा आलोचना सम्‍मान से सम्‍मानित किया। श्री रामानन्‍द सरस्‍वती पुस्‍तकालय , जोकहरा ,  केदार शोध पीठ (न्‍यास) ,  बॉंदा ,  डॉ.रामविलास शर्मा आलोचना सम्‍मान आयोजन समिति की ओर से प्रदान किए जाने वाले सम्‍मान समारोह के दौरान महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय ,  वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ,  वरिष्‍ठ साहित्‍यकार प्रो.निर्मला जैन , प्रो.चौथीराम यादव ,  भारत भारद्वाज ,  दिनेश कुशवाह ,  प्रदीप सक्‍सेना ,  रमेश कुमार मंचस्‍थ थे।        अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि हिंदी आलोचना में जिस तरह के साध्‍य की जरूरत है वह हिंदी में विरल होती जा रही है। रामविलास शर्मा ने जो श्रम और साधना की हिंदी आलोचना के लिए...

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पेड न्यूज क्या है?