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मेरी पहली सरस्वती वंदना .....

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मेरी पहली सरस्वती वंदना --------------------- वर दे, वीणावादिनि वर दे। प्रिय घोटालेबाजी नव, झूठ फरेब मंत्र हर मन में भर दे। काट अंध सच के बंधन स्तर बहा धन के नित नव निर्झर ईमानदारी हर बस घोटाले भर घोटाले ही घोटाले कर दे। चहुँदिश होंवें कलमाडी सर, कंठ कंठ हों घोटाले स्वर राजा हों या प्रजा जी हों सबको घोटालेबाज कर दे।

आओ बदलें शहरों की आत्मा...

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गांवों का शहरीकरण हुआ इसमें बुराई भी क्या है..सुख-सुविधा संपन्न हों हमारे गाँव अच्छा ही तो है, लेकिन क्यूँ न हम गाँव वाले जो गाँवबदर हो शहर आ बसे,कुछ ऐसा करें कि शहरों की काया तो शहरी ही हो पर आत्मा का जरुर ग्रामीनिकरण हो जाये....सुख-सुविधा तो शहर की हों पर अपनापन,संबंधों की मिठास, छोटे-बड़े का सम्मान, रिश्तों की गरिमा, खानपान,मस्ती,आबोहवा और अनेकता में एकता से जीने का अहसास गाँव का हो..आप क्या कहते हैं.. ..?

matri smriti

                                                             मातृ स्मृति और अब पहली पुण्यतिथि भी आ गई.....। जैसे विश्वास  करना मुश्किल  हो। पूरे वर्श में शायद  कोई ही दिन रहा हो जब उनकी याद दस्तक देकर, कुरेद कर और निर्बल महसूस कराकर न गई हो। सच तो यह है कि मैं उनकी यादों से भागना भी नहीं चाहता। मुझे भी एक सुकून सा मिलता है यादों में डूबकर। कभी- कभी तो लगता है कि उन यादों के अलावा कोई अन्य शरण  स्थल ही नहीं है। जैसे दर्द ही अब दवा हो। मैं नहीं जानता कि उम्र के पाँचवें दशक  में भी माँ के बिना अनाथ की स्थिति में आ जाना, बेहद अकेला महसूस करना मुझे अच्छा क्यों लगता है ? जैसे - जैसे फरवरी माह की ४/५   की वह रात नजदीक आती जा रही है, माँ का देहत्याग और तीव्रता से याद आने लगा है। सब कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आँखों के सामने घूमता जा रहा है। मुझे यह भी नहीं लगता कि यह कोई सांसारिक मोहपाश  है क्योंकि...

चन्दन चन्दन रूप तुम्हारा केसर केसर सांसे...

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चन्दन चन्दन रूप तुम्हारा केसर केसर सांसे, इन आँखों में बसी हुई हैं कुछ सपनीली आशें... मुझमें तुम हो तुम में मैं हूँ तन मन रमे हुए हैं, प्रेम सुधा बरसाती रहती अपनी दिन और रातें... जब से दूर गई हो प्रिय सुध बुध बिसर गई, याद तुम्हारी साँझ सवेरे आँखों में बरसातें... दर्पण मेरा रूप तुम्हारा यह कैसा जादू है, जब भी सोचूँ तुमको सोचूँ हर पल तेरी यादें...

हमाम में सब नंगे- दोषी कौन ?

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कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया यानि कि लोकतंत्र के चार खम्बे... और आज ये चारों खम्बे धराशायी होने को हैं...संसद हो या विधानसभा या फिर नगर-ग्राम की चुनी हुई प्रतिनिधि सभाएं...आलम हर ओर एक जैसा ही है...भ्रष्टाचार आम है...सरकारें नकारा और निकम्मी सी हो गई हैं...नेताओं की दशा और दिशा देख सर धुनने का मन करता है...देर से मिलने वाला न्याय भी कई बार भ्रष्टाचार के दरवाजे से ही होकर गुजरता है...इन सब पर लगाम रखने और लोकतंत्र की चौकीदारी की जिम्मेदारी मीडिया की मानी जाती रही है, पर आज वहां भी आलम वही है...सब एक दूसरे के गलबहियां हो रहे हैं यानि कि हमाम में सब नंगे हैं...आखिर इस सबका दोषी कौन....?

मत समझो आजादी गांधी ही लाया था....

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मत समझो आजादी गांधी ही लाया था.... बिस्मिल ने भी इसकी खातिर रक्त दिया था... बंगाली बाबू का भी बलिदान ना कम है... कितने अश्फाकों ने इसमें वक़्त दिया था... कली- कली निर्दय माली पर गुस्साई थी, सच कहता हूँ तब ही आजादी आई थी... लाखों दीवानों ने गर्दन कटवाई थी सच कहता हूँ तब ही आजादी आई थी.. (डॉ सारस्वत मोहन मनीषी की कविता का एक अंश )

इस अर्पण में कुछ और नहीं केवल उत्सर्ग छलकता है....

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ठण्ड गुजरने को है पर इस साल अभी तक बाजरे की रोटी नहीं खाई.गाँव में थे तो सर्दी शुरू होते ही रोजाना बाजरे की रोटी खाने को मिलती थी, गरमागरम. संग में कभी सरसों का साग, कभी चने का साग तो कभी उड़द की दाल.रोटी के ऊपर देशी घी की मोटी सी डली और गुड.बाजरे की खिचडी और बाजरे की रोटी का गुड मिला चूरमा भी कितना लजीज होता था...!!! गाँवबदर हो शहर आए तो मक्के की रोटी भी खाने को मिली, पर वो मजा कभी नहीं आया जो गाँव में आता था...जब तक घर में गैस का चूल्हा नहीं आया था तो मिट्टी के चूल्हे पर सिकी करारी रोटी मिलती थी.चौके में चूल्हे के सामने जमीन पर बैठकर तवे से उतरती गरमागरम रोटी खाने का मजा ही अलग था. माँ बनाती जाती और हम दोनों भाई खाते जाते, कभी छोटी बहन के साथ तो कभी पिताजी के साथ. कलई से चमके हुए पीतल के थाल में, जो हमारे होश सँभालते सँभालते स्टील की थाली बन गया और जब गैस का चूल्हा आ गया तो बाकी सब तो वही रहा पर रोटी की मिठास बदल गई. जो मीठापन लकड़ी की आग में चूल्हे पर सिकी रोटी में था वो गैस में कहाँ... मुझे याद नहीं कि माँ ने भी कभी अपने चौके में तवे से उतरती गरमागरम करारी बाजरे की रोटी खाई हो...!...

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