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मुल्ला और इंसाफ़

इधर बहुत दिनों से मुल्ला नसरुद्दीन की बड़ी याद आ रही है. मित्रों से निजी बातचीत के क्रम में उनका जिक्र भी अकसर होता रहा है. पढ़ता भी ख़ूब रहा हूं, गाहे-बगाहे जब भी मुल्ला के बारे में जो कुछ भी मिल गया. पर उधर जूते ने ऐसा परेशान कर रखा था कि मुल्ला को इयत्ता पर याद करने का मौक़ा ही नहीं मिल सका. आज एक ख़ास वजह से उनकी याद आई. एक बात आपसे पहले ही कर लूं कि मुल्ला से जुड़े इस वाक़ये को किसी अन्यथा अर्थ में न लें. कहा यह जाता है कि यह एक चुटकुला है, लिहाजा बेहतर होगा कि आप भी इसे एक चुटकुले के ही तौर पर लें. अगर किसी से इसका कोई साम्य हो जाता है तो उसे बस संयोग ही मानें. तो हुआ यह कि मुल्ला एक बार कहीं जा रहे थे, तब तक सज्जन दौड़ते-दौड़ते आए और उन्हें एक चाटा मार दिया. ज़ाहिर है, मुल्ला को बुरा लगना ही चाहिए था तो लगा भी. लेकिन इसके पहले कि मुल्ला उन्हें कुछ कहते, वह मुल्ला से माफ़ी मांगने लगे. उनका कहना था कि असल में उन्होंने मुल्ला को मुल्ला समझ कर तो चाटा मारा ही नहीं. हुआ यह कि मुल्ला को आते देख दूर से वह किसी और को समझ बैठे थे और इसी धोखे में उन्होंने चाटा मार दिया. पर मुल्ला तो मुल्ला ठहरे. उन...

दास्तान- ए- बेदिल दिल्ली

पुस्तक समीक्षा दास्तान- ए- बेदिल दिल्ली संभवतः बहुत कम ही साहित्यप्रेमियों को इस बात की जानकारी होगी कि लब्धप्रतिष्ठ उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली , पिछली सदी के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित होने वाली अत्यंत लोकप्रिय पत्रिका धर्मयुग में ‘ बुनियाद अली ’ के छद्म नाम से एक स्तंभ लिखा करते थे , जिसका शीर्षक था - बेदिल दिल्ली। धर्मयुग पत्रिका के सर्वाधिक पढे जाने वाले और चर्चित स्तंभों में सम्मिलित बेदिल दिल्ली के अन्तर्गत लिखे गए उन्हीं लेखों को संकलित कर पुस्तकाकार में किताबघर प्रकाशन ने हाल में ही प्रकाशित किया है । कहने की जरूरत नहीं कि पुस्तक में संकलित सभी 52 लेख ऐतिहासिक महत्व के हैं। इनके माध्यम से लेखक ने तत्कालीन दिल्ली की सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दशाओं का चित्रण पूरी प्रामाणिकता के साथ किया है। दिल्ली स्थित सरकारी महकमों में फैला भ्रष्टाचार हो या सामाजिक स्तर पर पसरी संवेदनहीनता, साहित्यिक गलियारों में होने वाली आपसी टाँग खिचाई हो या फिर राजनीतिक मठाधीशों की छद्म सदाचारिता , हर जगह व्याप्त विसंगति को उकेर कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने के ...

चार रंग जिंदगी के

पुस्तक समीक्षा चार रंग जिंदगी के अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में सर्जनात्मक लेखन से जुडने वाली रचनाकार डाॅ अरुणा सीतेश ने बहुत कम समय में ही तत्कालीन कथा-लेखिकाओं के बीच अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर ली थी। उनके कथा- साहित्य के केंद्र में प्रायः स्त्री जीवन की गहन भावनाओं का मार्मिक चित्रण उपस्थित रहता है। कुछ समय पूर्व प्रकाशित कथा संकलन ‘ चार लंबी कहानियां ’ में सम्मिलित उनके द्वारा लिखी गई कहानियां जहां एक ओर नारी मन के अंतद्र्वंद्व को उजागर करती हैं तो साथ ही मानवीय मनोविज्ञान का विश्लेषण भी करती हैं। समीक्ष्य संग्रह में संकलित पहली कहानी ‘डूबता हुआ सूरज’ एक असफल प्रेम की मार्मिक गाथा को बयान करती है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई यह कहानी यद्यपि चिर- परिचित कथानक पर ही आधारित है , लेकिन इसका शिल्प और मनोभावों को पूरी सशक्तता से व्यक्त करने के लिए गढे गए वाक्य विन्यास , पाठकों को बांध कर रखने में पूर्णतः सक्षम हैं। भावुक इंसान के जीवन की मुश्किलें तब और बढ जाती हैं , जब उस पर अपने ही परिजनों और जीवन को व्यावहारिकता से देखने वालों का दबाव पडने लगता है। बुद्धिजनित तर्कों...

अथातो जूता जिज्ञासा-32

आप कई बार देख चुके हैं और अकसर देखते ही रहते हैं कि ख़ुद को अजेय समझने वाले कई महारथी इसी खड़ाऊं के चलते धूल चाटने के लिए विवश होते हैं. यह अलग बात है कि अकसर जब आप धूल चाटने के लिए उन्हें मजबूर करते हैं तो यह काम आप जिस उद्देश्य से करते हैं, वह कभी पूरा नहीं हो पाता है. हर बार आप यह पाते हैं कि आप छले गए. इसकी बहुत बड़ी वजह तो यह है कि आप अकसर 'कोउ नृप होय हमें का हानी' वाला भाव ही रखते हैं. कभी अगर थोड़ा योगदान इस कार्य में करते भी हैं तो केवल इतना ही कि अपना खड़ाऊं चला आते हैं, बस. और वह काम भी आप पूरी सतर्कता और सम्यक ज़िम्मेदारी के साथ नहीं करते हैं. आप ख़ुद तमाशेबाज खिलाड़ियों के प्रचार तंत्र से प्रभावित होते हैं और इसी झोंक में हर बार अपने खड़ाऊं का पुण्यप्रताप बर्बाद कर आते हैं. और यह तो आप अपनी ज़िम्मेदारी समझते ही नहीं हैं कि आपके आसपास के लोगों के प्रति भी आपकी कोई ज़िम्मेदारी बनती है. अगर आपका पड़ोसी ग़लती करता है और आप उसे ग़लती करते हुए देखते हैं तो ज़्यादा न सही पर थोड़े तो आप भी उस ग़लती के ज़िम्मेदार होते ही हैं न! बिलकुल वैसे ही जैसे अत्याचार को सहना भी एक तरह का अत्याचार है, ग़...

अथातो जूता जिज्ञासा-31

तो अब बात उस खड़ाऊं की जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी थी और जिसकी पहचान अब आप भूल गए हैं, या फिर पहचान कर भी उससे अनजान बने हुए हैं. यह भी हो सकता है कि आप उसे पहचान कर भी अनजान बने हों. इसकी एक वजह तो आपका आलस्य हो सकता है और दूसरी आपमें इच्छाशक्ति की भयावह कमी भी. अपनी इसी कमज़ोरी की वजह से आप तब वाह-वाह तो कर रहे हैं जब दूसरे लोग उल्टे-सीधे जूते परम माननीयों पर फेंक रहे हैं, लेकिन ख़ुद अपने हाथों में मौजूद खड़ाऊं का उपयोग करने से बच रहे हैं. मुझे मालूम है कि आप वह जूता भी नहीं चला सकेंगे. आख़िर आप बुद्धिजीवी हैं. बुद्धिजीवी कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े करता है. असल बुद्धिजीवी तो सारा तूफ़ान चाय की एक प्याली में उठाता है और चाय के साथ ही उसे थमने के लिए मजबूर भी कर देता है. आजकल तो चाय की प्याली की भी ज़रूरत नहीं है. आज का बुद्धिजीवी तो एक ब्लॉग बनाता है और ब्लॉगे पे बेमतलब का बखेड़ा खड़ा कर देता है. ब्लॉग पर ही वह ख़ुश हो लेता है और ब्लॉग पर ही नाराज हो लेता है. कभी इस बात पर तो कभी उस बात पर. कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों नहीं देता है. कभी इस बात पर कि क...

अथातो जूता जिज्ञासा-30

यक़ीन मानें आम जनता जो  जूता चला रही है, असल में वह जूता है ही नहीं. यह तो वह खड़ाऊं है जो भगवान राम ने दिया था भरत भाई को. भरत भाई ने यह खड़ाऊं अपने लिए नहीं लिया था, उन्होंने यह खड़ाऊं लिया था आम जनता के लिए. इसीलिए उनके समय में उस खड़ाऊं का इस्तेमाल उनके मंत्रियों, अफ़सरों और निजी सुरक्षाकर्मियों ने नहीं किया. यही वजह थी जो ख़ुद भरत राजधानी के बाहर कुटी बना कर रहते रहे और वहां से राजकाज चलाते रहे. जनता की व्याकुलता की वजह इस दौरान राम की अनुपस्थिति भले रही हो, पर शासन या व्यवस्था में किसी तरह की कोई कमी कतई नहीं थी. और सबसे बड़ी बात तो यह कि अधिकारों के उस खड़ाऊं में भरत के लिए कोई रस भी नहीं था. उनकी रुचि अगर थी तो उस ज़िम्मेदारी में जो राम की अनुपस्थिति के कारण उन पर आ पड़ी थी. जबकि अब के शासकों की रुचि अपनी ओढ़ी हुई ज़िम्मेदारी में कभी ग़लती से भी दिख जाए तो यह एक असामान्य बात मानी जाती है. क्योंकि सामान्यतया उनकी कुल रुचि केवल उस अधिकार में है जो उन्होंने जनता को बहला-फुसला कर या डरा-धमका कर अपने ही जैसे अपने प्रतिद्वन्द्वियों से छीना है. नतीजा यह है कि आपके जनप्रिय नेताओं के बंगलों के ब...

अथातो जूता जिज्ञासा-29

इन समानधर्माओं में सबसे पहला नाम आता है इराकी पत्रकार मुंतजिर अल ज़ैदी का, जिन्होंने ख़ुद को दुनिया सबसे ताक़तवर समझने वाले महापुरुष जॉर्ज बुश पर जूतास्त्र का इस्तेमाल किया. इसकी आवश्यकता कितने दिनों से महसूस की जा रही थी और कितने लोगों के मन में यह हसरत थी, यह बात  आप केवल इतने से ही समझ सकते हैं कि यह जूता चलते ही दुनिया भर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. भले ही कुछ लोगों ने दिखावे के तौर पर शिष्टाचारवश इसकी भर्त्सना की हो, पर अंतर्मन उनका भी प्रसन्न हुआ. बहुत लोगों ने तो साफ़ तौर पर ख़ुशी जताई. गोया करना तो वे ख़ुद यह चाहते थे, पर कर नहीं सके. या तो उन्हें मौक़ा नहीं मिला या फिर वे इतनी हिम्मत नहीं जुटा सके. सोचिए उस जूते की जिसकी क़ीमत चलते ही हज़ारों से करोड़ों में पहुंच गई. असल में ज़ैदी ने यह बात समझ ली थी कि अब अख़बार तोप-तलवार के मुकाबले के लिए नहीं, सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए निकाले जाते हैं. उन्होंने देख लिया था कि अख़बार में बहुत दिनों तक लिख-लिख कर, टीवी पर बहुत दिनों तक चिल्ला-चिल्ला कर बहुतेरे पत्रकार तो थक गए. मर-खप गए और कुछ नहीं हुआ. वह समझ गए थे कि कलम में अब वह ताक़त नहीं रही कि इंकलाब ला ...

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