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दीवार की काई की तरह

- विनय ओझा 'स्नेहिल' अपनी उम्मीद है दीवार की काई की तरह। फिर भी ज़िन्दा है खौफ़नाक सचाई की तरह॥ पेट घुटनों से सटा करके फटी सी चादर - ओढ़ लेता हूँ सर्दियों में रजाई की तरह ॥ आँधियाँ गम की और अश्कों की उसपर बारिश - साँस अब चलती है सावन की पुरवाई की तरह ॥ जाने यह कौन सी तहज़ीब का दौर आया है- बात अब अच्छी भी लगती है बुराई की तरह ॥ सारी जनता तो उपेक्षित है बरातीयों सी - और नेताओं की खातिर है जमाई की तरह ॥

अशआर

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- विनय ओझा स्नेहिल मुस्कराहट पाल कर होंठों पे देखो दोस्तों- मुस्करा देगा यकीनन गम भी तुमको देखकर. थाम लेगा एकदिन दामान तुम्हारा आस्मां - थोड़ा थोड़ा रोज़ तुम ऊँचा अगर उठते रहे. यह और है कि हसीनों के मुँह नहीं लगते- वरना रखते हैं जिगर हम भी अपने सीने में. पाँव में ज़ोर है तो मिल के रहेगी मंज़िल - रोक ले पाँव जो ऐसा कोई पत्थर ही नहीं.

कहाँ मिलता है!

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विनय ओझा स्नेहिल हर एक शख्स बेज़ुबान यहाँ मिलता है. सभी के क़त्ल का बयान कहाँ मिलता है. यह और बात है उड़ सकते हैं सभी पंछी फिर भी हर एक को आसमान कहाँ मिलता है. सात दिन हो गए पर नींद ही नहीं आयी दिल को दंगों में इत्मीनान कहाँ मिलता है. न जाने कितनी रोज़ चील कौवे खाते हैं हर एक लाश को शमशान कहाँ मिलता है.

ट्रांस्पैरेंसी इंटरनेशनल की हेराफेरी

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इष्ट देव सांकृत्यायन व्यंग्य चित्र : श्याम जगोता मास्टर एकदम से फायर है. सलाहू से उसने पूछा है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में मानहानि के मुकदमों की सुनवाई कहाँ होती है और इनके लिए याचिका कैसे लगाई जा सकती है. बेचारा सलाहू अभी हाई कोर्ट से आगे तो जा नहीं पाया. सुप्रीम कोर्ट का मुँह तो जरूर देखा है लेकिन भीतर घुसने की अभी तक तो उसे अनुमति मिली नहीं. सोच रहा है कैसे समझाए मास्टर को. सलाहू उसे समझाने की वैसे तो बहुतेरी कोशिशें कर चुका है कि इन सब झमेलों में मत पड़ो. पर जो समझ ही जाए वो मास्टर भला किस बात का? असल में राष्ट्रीयता की भावना मास्टर में कूट-कूट कर भरी है और यह भावना उसमें भरी है उसके परमपूज्य पिताश्री ने, जो तहसील के मुलाजिम हुआ करते थे। वे पूरे देश की सम्पत्ति को अपनी सम्पत्ति समझते थे। सरकारी जमीनों को तो धेले के भाव किसी के भी नाम करते उन्हें कभी डर लगा ही नहीं, कमजोर लोगों की जमीन दबंगों और दबंगों की जमीन उनसे ज्यादा दबंगों या समझदार लोगों की लोचेदार जमीन बेवकूफों के नाम करने में भी वे कभी हिचकिचाए नहीं। दूसरे हलकों के लोग भी अभी तक बच्कन लाल पटवारी का उदाहरण देते नहीं थकते और ...

आस्था का सवाल

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हरिशंकर राढ़ी एक बार आस्था फिर बाहर आ गयी है. लड़ने का मूड है उसका इस बार. इस बार उसकी लडाई इतिहास से है. यों तो इतिहास लडाई एवं षड्यंत्र का ही दूसरा नाम है, पर यह लडाई कुछ अलग है. लड़ने चली तो आई पर हथियार के नाम पर बेहया का एक डंडा भी नहीं है. यहाँ तक कि यदि पिट-पिटा गई तो ऍफ़आईआर दर्ज़ कराने के लिए एक किता चश्मदीद गवाह भी नहीं है. उसकी ओर से खड़ा होकर कोई यह भी कहने वाला नहीं है कि मैने राम को देखा है. उन्होने समुद्र में सेतु बनाया ,यह तो दूर की बात है. सच भी है. पहले तो उन्हें देखने की किसी ने कोशिश ही नहीं की, अगर किसी ने दावा कर भी दिया तो लोग उसे पागल समझेंगे. दूसरी तरफ इतिहास है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण लेकर आया है. विदेशी है सो अच्छा होगा ही. उसके चलन-कलन मे कोई गलती हो ही नहीं सकती. गलती हो भी जाए तो परिहार है -सॉरी. अभी गलती से अमेरिका आस्था की गवाही में बोल पड़ा कि समुन्दर के अन्दर एक पुराना पुल पड़ा हुआ है. उसे पता नहीं था कि राम सेतु की पक्षधर पार्टियां सत्ता में नहीं हैं. सो जल्दी से सॉरी बोल दिया। इस टीप के साथ कि पुल मानव निर्मित नहीं है. यही बात तुलसी बाबा भी बोले, भारत की...

बर्मा में ब्लॉगर्स पर पहरा और हमारे लिए इसका मतलब?

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- दिलीप मंडल बर्मा यानी म्यांमार में सरकार ने इंटरनेट कनेक्शन बंद कर दिए हैं । इससे पहले वहां की सबसे बड़ी और सरकारी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कंपनी बागान साइबरटेक ने इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड इतनी कम कर दी थी कि फोटो अपलोड और डाउनलोड करना नामुमकिन हो गया । साथ ही साइबर कैफे बंद करा दिए गए हैं । बर्मा के ब्लॉग के बारे में ये खबर जरूर देखें - Myanmar's blogs of bloodshed बर्मा में फौजी तानाशाही को विभत्स चेहरा अगर दुनिया के सामने आ पाया तो इसका श्रेय वहां के ब्लॉगर्स को ही जाता है । वहां की खबरें , दमन की तस्वीरें बर्मा के ब्लॉगर्स के जरिए ही हम तक पहुंचीं । बर्मा में एक फीसदी से भी कम आबादी की इंटरनेट तक पहुंच है । फिर भी ऐसे समय में जब संचार के बाकी माध्यम या तो सरकारी कब्जे में हैं या फिर किसी न किसी तरह से उन्हें चुप करा दिया गया है , तब बर्मा के ब्लॉगर्स...

कोई कहाँ है अपना

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रतन सभी अपने हैं मगर कोई कहॉ है अपना यों तो कहने के लिए सारा जहाँ है अपना लोग कहते हैं कि तुम दिल में मेरे रहते हो सच यही है कि नहीं कोई मकां है अपना लोग जो करते हैं ओ जानें करम है उनका यह जनम अगला जनम उनपे फ़ना है अपना वो न समझें वो न जानें कोई गुस्ताखी नहीं ग़लत-सही हो जान उनपे फ़िदा है अपना आपसा हमने उन्हें माना जो थे आपके लोग जिनके बारे में बताया कि फलां है अपना भूल जाये ये जहाँ खत्म हो जाये दुनिया ख़त्म होगा नहीं वो नामो-निशां है अपना यकीन तुम न करो पर है यही सच्चाई कि रतन अलग सा अंदाजे बयाँ है अपना

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