भ्रष्टाचार अमर रहे
इष्ट देव सांकृत्यायन
ये क्या बात हुई कि पुलिस महकमे में भ्रष्टाचार की पोल खोलने वाले को सिर्फ सस्पेंड कर के छोड़ दिया गया।
ऐसा कोई भी आदमी या औरत या किसी तीसरे, चौथे, पाँचवें लिंग वाला कोई मनुष्य या अन्य प्राणी, जो किसी सरकारी महकमे में भ्रष्टाचार की पोल खोलने की बात सोचे भी, उसके लिए तो टर्मिनेशन भी बहुत छोटी बात है। इतनी छोटी कि छोटी से भी छोटी। गौर करने लायक ही नहीं मानी जानी चाहिए।
भ्रष्टाचार की पोल खोलने की सज़ा तो कायदे से ये होनी चाहिए कि उस शख्स को देखते ही गोली मार दी जाए। या, किसी चौराहे पर फाँसी की सजा दी जाए। जैसे कि चीन में भ्रष्टाचार करने वालों के साथ किया जाता है।
या फिर, एक तरीका यह भी हो सकता है कि उसे चौराहे पर जिंदा जला दिया जाए। जैसा कि मध्यकाल के दौरान यूरोप में ईसाइयत के उभार के दौर में पतियों के चर्च में मजबूरन ईसाइयत स्वीकार लेने के बावजूद अपने अपने घरों में चुपचाप प्रकृति पूजा करने वाली पैगन स्त्रियों को डायन बताकर उनके साथ किया जाता रहा है।
दूर न जाना चाहें तो यहीं अपने गोवा से सबक ले सकते हैं। जैसा कि महान और दयानिधान संत जेवियर जी कर रहे थे। जबरिया ईसाइयत स्वीकार करवाए जाने के बावजूद घरों में चुपचाप अपने देवताओं को पूजने वाले हिंदुओं के साथ। मने कि एक हाथ कटारो खंब बनाकर उसके हाथ-पैर काटे जा सकते हैं।
या फिर वह भी किया जा सकता है जो भेरी भेरी काइंड मर्सिफुल औरंगजेब सर ने गुरु गोबिंद सिंह जी के शहजादों के साथ किया था। मने कि उसे दीवार में जिंदा चिनवाया जा सकता।
अच्छा आप खुद सोच के देखिए। ऐसा कौन है जो नहीं जानता कि किसी आईएएस को किसी नए जिले का डीएम किस आधार पर बनाया जाता है? किसको नहीं मालूम है कि किसी डीएम को बॉर्डर इलाके वाला कोई जिला किसलिए दिया जाता है? थानेदार किसी को किस शर्त पर बनाया जाता है? और 'अच्छे थाने' में पोस्टिंग पाने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है?
जब सबको सब पता ही है तो वह कौन सी चीज है जिसकी आप पोल खोलना चाहते हैं। और जो चीज ऑलरेडी खुली ही हुई है, भारत-बांग्लादेश के तीन तरफ के बॉर्डर की तरह, उसे और खोलकर आप क्या कर लेंगे? अच्छा आप पुलिस में भर्ती क्या सोचकर हुए थे? आपके माँ-बाप, भाई-बहन, पत्नी और साले-साली या सास-ससुर को आपसे क्या-क्या उम्मीदें रही होंगी? क्या वो सब शिष्टाचार से पूरी होने वाली थीं।
अरे भाई, सरकारी महकमा, जो बना ही है भ्रष्टाचार के लिए, वहाँ आप शिष्टाचार लेकर गए क्यों? भारत के हर सरकारी महकमे के बारे में हर आदमी जानता है कि और कुछ यहाँ रहे या न रहे, भ्रष्टाचार तो यहाँ रहेगा। एक भ्रष्टाचार ही है जो यहाँ रहने लायक है।
हमारे यहाँ, भ्रष्टाचार तो छोड़िए, अपराध तक का बुरा नहीं माना जाता। बल्कि पुरस्कृत किया जाता है। यही हमारे महान लोकतंत्र की उदात्त परंपरा है। भ्रष्टाचार और अपराध के खुलासे को तो हमारा कानून ही बहुत खराब बात मानता है। और हमारे देश की लोकतांत्रिक परम्पराएँ भी उसी का अनुसरण करती हैं। आप देख लीजिए, आखिर हमीं तो भेजते हैं संसद में चुनकर लोगों को। और हम किन महापुरुषों को चुनकर संसद में भेजते हैं, यह आपसे बेहतर कौन जानता है!
एक ऐसी संसद जहाँ हर दूसरे सदस्य पर आपराधिक मामला दर्ज हो, हर चौथे शख्स पर गंभीर या जघन्य अपराध का मामला दर्ज हो, और जहाँ हर छठे शख्स पर कोर्ट में अपराध साबित हो चुका हो, वहाँ से आप किस प्रकार का कानून बनकर निकलने की उम्मीद करते हैं! इतनी महान और उदात्त परंपरा के बावजूद इस बात का क्या तुक है कि कोई भ्रष्टाचार की पोल खोलने निकले! एक ऐसे समय में जबकि दरोगा 50 रुपये जेब के हवाले करते हुए दाहिनी तरफ से चलते हुए रेडलाइट टॉप जाने वाले ट्रक का चालान छोड़ने में अति व्यस्त हो, तब एक मामूली सिपाही भ्रष्टाचार की पोल खोले, नालायकी और नामुरादी का इससे बड़ा उदाहरण कुछ हो सकता है क्या? मैं एक बार फिर से अपील करता हूँ कि ऐसे हर सिपाही को फाँसी की सज़ा दी जाए जो भ्रष्टाचार की ऑलरेडी खुली हुई पोल को और खोलने की बात भी सोचे।
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