(हरिशंकर राढ़ी के ललित निबंध संग्रह 'कुल्हड़ की चाय' की ख्यातिप्राप्त लेखिका, रेडियो-टीवी उद्घोषिका अर्चना मिश्र द्वारा की गई समीक्षा : ‘
साहित्य नंदिनी’, नवम्बर, 2025)
'कुल्हड़ की चाय' का सोंधापन
-अर्चना मिश्रा
लब्धप्रतिष्ठ लेखक, कवि, व्यंग्यकार, निबंधकार एवं भाषाविद श्री हरिशंकर राढ़ी का निबंध-संग्रह 'कुल्हड़ की चाय' पढ़ने का या यों कहें की पीने का अवसर प्राप्त हुआ और मैं यह कहे बिना नहीं रह
पाऊँगी कि इनके सोंधेपन से मन तृप्त हो गया। इन निबंधों का सरस, रोचक एवं ज्ञानवर्धक होना बड़ा सुखद लगा। इस संग्रह की सबसे मुख्य विशेषता
इसका विस्तृत फलक एवं बहुआयामी होना है। संस्कृत साहित्य एवं उनके कवियों की चर्चा, खेत-खलिहान, गूलर, कनेर, चैत, रुपैया, पेंसिल, संगीत और शबरी जैसे विषयों को समेटता यह संग्रह पाठकों को ज्ञान एवं भाव के
समंदर पर लहराने के लिए छोड़ देता है। राढ़ी जी द्वारा किए गए विषयों के चयन एवं
विषय अनुकूल भाषा के सुन्दर संयोजन ने गद्य को भी काव्य जैसा रसपूर्ण बना दिया है। इन्हें पढ़ते हुए लेखक कभी अतीत की अंतर्यात्रा पर निकल जाता है
तो कभी साहित्य के सरोवर में डुबकियाँ लगाने लगता है, कभी खेत-खलिहान, आँगन-बगान की स्मृतियों के झूले झूलता है तो कभी जीवन और संबंधों की मिठास में
स्वयं को घुलता पाता है। यूँ तो राढ़ी जी साहित्य की लगभग हर विधा में लिखते रहे
हैं, लेकिन इनका व्यंग्यकार रूप इन सबमें सर्वोपरि है और इनके इस व्यंग्यकार रूप ने
इस निबंध-संग्रह की भाषा को अत्यधिक आकर्षक, चुटीला एवं चटपटा बना दिया है।
संग्रह का पहला निबंध 'कुल्हड़ की चाय' जो इस संग्रह का शीर्षक भी है, हमें मिट्टी से बने कुल्हड़ के बहाने मिट्टी से जोड़ता
है। कुल्हड़ के संस्कृत नाम 'कुपात्र' के बहाने लेखक पाठकों को एक अनोखी दार्शनिक यात्रा करा लाते हैं। वह कहते हैं- कुपात्र यानी मिट्टी का
पात्र और सुपात्र यानी सोने का पात्र। लिखते है कि हर इंसान कुपात्र ही तो है, क्योंकि वह मिटटी का बना है और पुनः मिट्टी में हीं मिल जाने वाला है। कितनी
गहरी और सहज व्याख्या! फिर सुपात्र के बहाने लोकजीवन की सैर कराते हैं 'सोने की थाली में जेवना परोसा', इसके बाद भी नायक परोसी थाली छोड़ सौतन के घर चला जाता है... लेखक कहता है कि
आकर्षण कहीं और हो तो सुपात्र भी कुपात्र के पास जाने से रोक नहीं पता'। बात-ही-बात में बातों की इतनी गहरी विवेचना लेखक की संवेदना एवं उस संवेदना
की ऐसी अभिव्यक्ति का मणिकांचन संयोग दर्शाता है। कभी मेरे किसी मित्र ने पूछा था
कि बताओ ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो बेजान में जान डालती है और मेरे न बता पाने पर
उसने कहा था 'मिट्टी'। उसी मिट्टी से बना कुल्हड़ चाय पीने वालों को असीम तृप्ति दे जाता है- 'जैसे आग में पककर लाल हुए कुल्हड़ की सारी तपस्या चाय में घुल जाती हो', एक निर्जीव का ऐसा सजीव चित्रण! लेखक को कभी कुल्हड़ के बहाने कबीर याद आते
हैं तो कभी परबत कुम्हार,
कभी गाँव-जवार में पतीले से छनकर लोटे भर चाय याद आती है तो कभी कोल्हार पर
पकता नया गुड़ और आलू। कभी आजमगढ़ और बनारस के समोसे तो कभी हरिद्वार और हृषिकेश
की कुल्हड़ वाली चाय । निबंध के अंत तक लेखक भविष्य की कल्पना में डूब जाते हैं, जब कुल्हड़ों का निर्यात बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा होने लगेगा। उससे भी
आगे यदि इस सभ्यता का विनाश हो गया तो सदियों बाद उत्खनन में मिट्टी के ये कुल्हड़
सभ्यता का इतिहास रचेंगे। मात्र एक कुल्हड़ के माध्यम से जीव-जगत के इतने आयाम को
नापना राढ़ी जी की गहन दृष्टि का द्योतक है।
'छुट्टी के बैठे-ठाले'
लेख की पहली ही पंक्ति "छुट्टी लेने और मार लेने के स्वाद में बहुत अंतर
होता है", पाठकों के होंठों पर मुस्कान लाने के लिए काफी है। राढ़ी जी की व्यंग्यात्मक
शैली का नमूना देखिए - "कोविड के बाद जुकाम और जुकाम से आए बुखार से
बेइज़्ज़त बीमारी दूसरी कोई है ही नहीं, यहाँ तक की लोगबाग एड्स, हृदयरोग एवं कैंसर को भी सम्मान की नजर से देखने लगे हैं। " मनुष्य की
छोटी-छोटी अनुभूतियों के प्रति राढ़ी जी की सूक्ष्म दृष्टि को उजागर करती ये
पंक्तियाँ देखते बनतीं हैं- "अहा! बिना कुछ ओढ़े सोना, मतलब निरालंब, निराश्रित। चादर ओढ़ते ही सुरक्षित होने का एहसास होने लगता है। निजता की नई
अनुभूति होती है"। शिव-पार्वती की कथा के
बहाने आपने एक मर्म की बात। दी “जिस पदार्थ की इच्छा पूरी तरह पूरी न हो, वह स्वादिष्ट एवं आकर्षक होता है। है"। छुट्टी की पूर्ण व्याख्या
करते हुए आप लिखते हैं "छुट्टी मतलब किसी अप्रिय अनचाहे उबाऊ काम से कुछ देर
के लिए मुक्ति और अपने अस्तित्व को महसूस करने का मौका"। एक छोटे-से विषय के
माध्यम से जिंदगी के तमाम पहलुओं को बटोरना ही लेखन को जीवंत एवं सरस बनाता है, जो राढ़ी जी के निबंधों में सहज ही देखा जा सकता है।
संग्रह का अगला लेख 'गुलरी के फूल' का एक मुहावरा बन जाना और मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करने का आधार बन जाना
लोककाव्य द्वारा रचा गया 'गूलर के फूल' का मिथक... यह साबित करता है कि लेखक को लोक-जीवन एवं लोक-साहित्य का कितना
गहरा बोध है। दरअसल लोक से जुड़े बिना साहित्य गहरा हो भी नहीं सकता। कबीर, जायसी, सूर, तुलसी, मीरा और भारतीय संत साहित्य
को पढ़ने-गुनने के बाद 'लोक' की महत्ता को सहज ही स्वीकारा जा सकता है। गुलर के फूल के साथ पूरबी विरहिणी
से लेकर गिरमिटिया विरहिणी तक के दर्द को समेटता, लोकगीतों में पिरोया गया
उनका विरह एवं प्रेम की पाश्चात्य परिभाषाओं से गुम होता गूलर अतीत की गलियों में
घुमाकर पाठकों के मन पर एक मीठी-सी टीस छोड़ जाती है।
'गुलमोहर के लिए' में लेखक बताते हैं कि गुलमोहर का संस्कृत नाम 'राज-आभरण' है, अर्थात राजसी आभरण से सजा हुआ। आगे कहते है कि "ये संस्कृत वाले ऊपर से
तो बड़े नैतिक और आध्यात्मिक दिखते हैं, लेकिन इनमें श्रृंगार कूट-कूटकर भरा होता है।"
आगे राढ़ी जी की व्यंग्यात्मक शैली की बानगी देखिए "गूगल बाबा ने बताया कि
गुलमोहर मेडागास्कर से लाया गया है और इसे लाने वाले पुर्तगाली थे। हम तो गुलमोहर
को हिन्दुस्तानी मानते रहे,
अपना मानने में हमारा कोई जवाब नहीं, हमने तो
हमलावरों को भी अपना मान लिया, फिर ये तो गुलमोहर है।"
'हे भर्तृहरि, थोड़ा और लिख जाते!' में राढ़ी जी की शुरूआती पंक्तियाँ पढ़कर पाठक मुस्कुराए बिना नहीं रह सकता-
"सोचा था कि आपके दो-चार पद अर्थ सहित याद कर लूँगा और मौक़ा आने पर दूसरों पर
रौब जमाने के लिए सुना मारूँगा।" आगे लिखते हैं "पहले आपकी इच्छाएँ एवं इन्द्रियाँ आप पर राज करती
थीं, अब आप उन पर राज करने लगे, क्षण भर
में सत्ता पलट दी आपने, इतनी तेजी से तो लोकतंत्र
में भी नहीं पलट पाती।" भर्तृहरि के 'वाक्यपदीयम' की चर्चा करके उनके व्याकरण के ज्ञान एवं योगदान के
साथ-साथ श्री हरिशंकर राढ़ी जी के संस्कृत साहित्य एवं भाषा के गहन ज्ञान का पता
चलता है। भर्तृहरि को जिन्होंने नहीं पढ़ा, वो भी इसे पढ़ने के बाद उन्हें जान और
समझ सकते हैं। भर्तृहरि के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर इस निबंध के माध्यम से आपने
समुचित प्रकाश डाला है।
'ज्वार का भाटा' एक अनाज के माध्यम से भारतीय अतीत और वर्तमान परिवेश को उजागर करता, पाठकों को मिट्टी से जोड़ता एक अर्थपूर्ण निबंध है। ज्वार जिसे ग्रामीण भाषा
में बजड़ा भी कहते हैं, जो एक समय में गरीब-कुपोषित लोगों का भोजन हुआ करता था, आज गरीब का वही भोजन अमीर के लिए 'डिश' बन गया है' । हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार श्री
शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास 'अलग-अलग वैतरणी' के 'फसलभेंट पाल्टी' का जिक्र करके आपने बजड़ा, बजड़ी, मडुवा, रागी जैसे अनाजों को मानो साहित्यिक
सम्मान प्रदान कर दिया हो। बजड़ा-बजड़ी के लिंगभेद द्वारा उनके आकार-प्रकार का
विश्लेषण भी कम रोचक नहीं। बजड़े को भूनकर मकर संक्रांति पर बनाए जाने वाले 'ढुंढा' का क्या कहना जो अब एलीट क्लास का शगल बन चुका है। भारतीय संस्कृति और परिवेश के लुप्त होते प्रारूप
से दुखी हो लेखक ज्वार को जंगल का रुख लेने की सलाह देते हैं। वर्तमान के सन्दर्भ
में क्या मार्मिक पंक्तियाँ हैं- “सभ्यता का चोला पहनने वाला जंगली हो जाता है तो
उसे प्राकृतिक जंगल की जरूरत नहीं होती।" ज्वार का ज्वार समाप्त होकर भाटा
बनने की कहानी समाप्त कर राढ़ी जी पुनः एक उपेक्षित पुष्प कनेर की व्यथा सुनाते
हैं।
'कनेर : हाशिए का फूल'
कनेर के आत्मकथन के रूप में छिपा लेखक का संवेदनशील वक्तव्य “जब तक अभिजात
पुष्प नहीं खिलते, तब तक तुम अपनी आस्था,
सौन्दर्यबोध एवं सुगंधबोध का काम मुझसे ही चला लो। मैं हूँ ना! क्या हुआ जो
कनेर हूँ!" कनेर के फूल बाज़ार में नहीं बिकते। सच में इनका व्यावसायिक महत्व
न के बराबर ही है, लेकिन बिकने वाले फूलों का भी अपना अलग ही दर्द है, जिसे लेखक के हृदय ने महसूस किया "बेचने के लिए तुम्हें प्रकृति ने बहुत
कुछ दिया था, फिर भी पेट नहीं भरा तो फूल भी बेच दिए।" कवि श्री माखनलाल चतुर्वेदी की
कविता पुष्प की अभिलाषा' को स्मरण कर लेखक कहते हैं “कविता को घोंटना नहीं पड़ता, वह अस्तित्व में मिल जाती है हवा और धूप की तरह।“ आगे राढ़ी जी की
व्यंग्यात्मक शैली का कमाल देखिए- "हाशिए के कनेर को सुरबालाओं के शीश या
देवताओं के चरणों में तो शरण मिलने से रही, रह गए आज के आका और नेता, इन पर कनेर चढ़ाने का मतलब अपने बनते काम बिगाड़ना।" वाल्मीकि रामायण में
आए उपेक्षित कनेर का सश्लोक उद्धरण देकर लेखक ने कनेर का सम्मान बढ़ाया है। साथ ही
अंतिम पंक्तियों में जीवन की विडम्बना की अनुभूति में लिखते हैं "अजीब है न, पुष्पों का भाग्य भी मनुष्यों की भाँति 'अभिजात' व 'अज्ञात' में विभाजित है।“ राढ़ी जी की लेखनी की सबसे बड़ी
विशेषता यही है कि विषय चाहे कोई भी हो, वह उसे विविध रस की चाशनी
में डुबो देते हैं। हास्य, व्यंग्य, करुणा, ज्ञान, संस्कृति, अतीत, वर्तमान, समाज, साहित्य और अनगिनत पहलुओं की सैर किसी
भी एक विषय के माध्यम से करा ही देते हैं। असल में यह उनके ज्ञान-वैविध्य एवं लेखन
क्षमता का मणिकांचन संयोग है।
'कालिदास की उज्जयिनी’ उज्जयिनी यानी उज्जैन, जिसका कुछ हिस्सा
विक्रमादित्य का है, कुछ हिस्सा महर्षि संदीपनि का है तो कुछ हिस्सा भर्तृहरि का। इस बार कालिदास
से मुलाक़ात कुछ लंबी ही रही।" लेखक विक्रमादित्य के टीले का वर्णन करते हुए
उनके नौ-रत्नों का उल्लेख करते हैं, जिन्हें इतिहासकारों एवं शिक्षाविदों ने वह गरिमा
नहीं प्रदान की, जो अकबर के नौ-रत्नों को प्राप्त है। लेखक की इन पंक्तियों में जीवन का दर्शन
देखते बनाता है- "बेताल को पीठ पर लादने वाले विक्रमादित्य जानते थे कि जीवन
में ताल के साथ बेताल का होना भी जरूरी है।" लेखक द्वारा 'कालिदास' एवं 'मेघदूत' का वर्णन पढ़ते हुए पाठकों को ऐसा अनुभव होगा जैसे लेखक के अन्दर कालिदास की
आत्मा समाहित हो गई हो।
'चैत को आने दो' में- “रामनवमी की बात होगी तो राम और चैत दोनों की बात होगी। मानवता के इतने
बड़े आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्म चैत में हीं हुआ था। विधाता ने उनके
लिए चैत मास कुछ सोचकर ही निर्धारित किया होगा। जब तक राम हैं तब तक चैत
रहेगा।" राढ़ी जी बसिऔरा और उसमें बनने वाले गुलगुले की याद दिलाकर पाठकों को
परम्परा के स्वाद का आस्वाद कराते हैं। चैत में टपकते रसीले महुए को लेकर एक
लोकोक्ति का बड़ा मनोरम सन्दर्भ आपने दिया है कि जब साँप पिछले पहर टपकते महुए के
नीचे से गुज़रता है और उसके ऊपर महुआ टपक पड़ता है तब साँप महुए से कहता है- ‘टिप
से टपाक से कपार काहें फोड़ा?’ हाजिरजवाब महुआ कहता है- ‘रात में बिरात में घर काहें छोड़ा?’" महुआ, गुलगुला, गुझिया, व्रत के आलू, आम का टिकोरा, टिकोरे और पुदीने की चटनी से लेकर
खेत-खलिहान, किसान और फिर कोयल की कूक, पपीहे की टेर, पलाश के फूल, चैती के सुर और इन सब में बसता चैत अब अपना बस्ता
समेट हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है।
'हे रुपैया' में रुपैया की महिमा में लेखक लिखते हैं, "जिसके होने से समस्त अवगुण गुण में
परिवर्तित हो जाते हों, पाप पुण्य में बदल जाते हों, लातनीय पूजनीय हो जाते हों, जिसके न होने के कारण से मानवता एवं प्रेम से लबालब भरा हुआ मनुष्य तुच्छ, गुणहीन, त्याज्य एवं जुगुप्सनीय हो जाता हो, उसे सजीव कैसे न मानें?" रुपैया का राजदार बटुआ और वह भी घुंडीदार हो तो फिर क्या कहना! वर्तमान
परिदृश्य में ई-वालेट के बढ़ते प्रचालन की चर्चा करते हुए लेखक लिखते है-
"असली रुपैया में एक दुर्गुण था। आते हुए अच्छा लगता था, जाते हुए बुरा, अब आभासी रुपैया जाता है तो उस टक्कर की तकलीफ नहीं होती।" आगे लिखते है
- "रुपैया का एक नाम मुद्रा भी है। मुद्राराक्षस से याद आया कि एक समय था, जब विशाखदत्त ने 'मुद्राराक्षस' की रचना की और एक यह समय है कि तमाम मुद्राराक्षस देश के रुपैया पर कब्जा किए
बैठे हैं।" ऐसी लाक्षणिक भाषा एवं भाव का प्रयोग एक सिद्धहस्त लेखक ही कर
सकता है। रुपैया के बांगला नाम टका को लेकर आपने अच्छा विनोद किया है- "टका
कभी अंधेर नगरी से भी जुड़ा रहा होगा, सुना था वहाँ टका सेर मूली, टका सेर खाजा बिकता था।" आगे हास्य-विनोद की
पराकाष्ठा देखिए- "संस्कृत के किसी स्वयंभू शौक़ीन विद्वान ने अर्ज किया है 'टका माता टकाश्च पिता टका बंधुः टकेश्वरः । यस्य पार्श्वे टका नास्ति सः टका
टकटकायते।"
'मड़ई' के बहाने जीवन के विविध रंगों में झाँकते लेखक लिखते हैं - "महामार्ग से
गुजरने वाली विदेशी गाड़ियों में बैठे कुछ पंचभूत मड़ई के सुख के सपने देखते हैं।
अहा! कितना अच्छा लगता होगा न! कितनी एअरी और इको फ्रेंडली होती हैं ये!" आगे
लिखते हैं- "गरीब है तो मड़ई है और मड़ई है तो गरीब होगा, दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, एक-दूसरे से ही उनका अस्तित्व टिका है।" लेखक
द्वारा वर्णित आंचलिक जीवन की बानगी देखिए- "मड़ई का छोटा भाई मचान फसलों के
समय किसानों का वाचटॉवर हुआ करता है। उसमें उन्हीं महानुभावों को भेजा जाता, जिन्हें बजरंगबली, हनुमान चालीसा, बउरहवा बाबा या फिर चामुंडा
माई पर विश्वास हो, वही मचान का प्रभारी होता था।"
'महेन्दर मिसिर' के लोकगीतों से लेकर,
रिजार्ट में बनने वाली फैंसी मड़इयों की चर्चा के साथ स्विट्जलैंड को भी मात
देती इन मड़इयों के स्वाभाविक सम्मान में आप लिखते हैं- "कौन नहीं चाहेगा कि
आबादी से दूर, विजन एकांत में डाँड़ पर एक ठो 'मड़ई' हो और उसमें अपनी 'चिरई' हो।"
पहुना और पहुनाई' में बारिश के मौसम में पहुना
की तरह आए सूरज की धूप सेंकते लेखक को भारतीय पहुना और पहुनाई की क्या गजब की याद
आई! राढ़ी जी ने जमाने की क्या नब्ज पकड़ी है- “जबसे चाय चलन में आई, पहुना चलन से बाहर हो गए। फिर अतिथि आए और बाद में तो गेस्ट आने लगे।"
पहुनाई की परम्परा मर्यादा पुरुषोत्तम राम के समय से चली आ रही है। तुलसी का मानस
तो ऐसे प्रसंगों से अटा पड़ा है, जिसकी समीचीन चर्चा राढ़ी जी ने इस लेख में की है।
लोकगीतों में वर्णित पहुना के स्वागत में गाए जाने वाले गीत अब मन में कसक पैदा
करते हैं... कहाँ गए वो दिन? रिश्तों की वह मिठास... कहाँ लुप्त हो गए?
'पारिजात के फूल', सहज-सुन्दर... हवा के जरा-से झोंके से झर जाने वाला। इनकी प्रशंसा में लेखक
कहते हैं- "पारिजात होकर भी अभिजात नहीं है, अभिजात तो गुलाब बाबू
हैं।" आगे वे निराला जी की कविता 'अबे सुन बे गुलाब' की चंद पंक्तियाँ लिखते हैं-
“जनाब इतरा रहे हैं अपनी किस्मत पर, प्रेम के इजहार में भी काम आते हैं तो बिककर।"
पारिजात के माध्यम से लेखक ने कितनी गहरी बात कही है- "पता नहीं किसने श्वेत को प्रेम से बाहर कर दिया।
गुलाबी को प्रेम का प्रतीक बना दिया, शायद इसीलिए प्रेम में धोखे का रोना सदियों से चला
आ रहा है। श्वेत होता तो शायद ऐसा नहीं होता। प्रेमियों के मन को कुछ तो निर्मल
करता।" पारिजात को हरिश्रृंगार से हरसिंगार बनने तक की यात्रा में लेखक ने
प्रेम और यथार्थ के अद्भुत तथ्य उजागर किए हैं।
‘पेंसिल के अक्षर': पेंसिल को आधार बनाकर राढ़ी
जी ने जीवन की अनगिनत गूढ़ बातें कह डाली हैं, जैसे-
"पेंसिल को छीलने लगा तो बहुत-सी परतें उतरने लगीं। लिखना है तो परतें उतारनी
ही पड़ेगी और मुँह को नुकीला बनाना ही पड़ेगा। भोथरे मुँह से शब्दों का आचार नहीं
किया जा सकता।" इन शब्दों में छिपा निहितार्थ एक लेखक के लिए हिदायत जैसा है।
आगे लिखते हैं- "पेंसिल की लिखाई कच्ची होती है। कच्ची पेंसिल ने न जाने
कितनों को बहुत पक्का बनाया है।" पेंसिल को माध्यम बनाकर जीवन का मर्म व्यक्त
करते हुए राढ़ी जी लिखते हैं- "टूटने और मनोवांछित नोक पाने का सिलसिला अपने
जीवन में लगातार चलता रहता है। जो भोथरे से काम चला लेते हैं, उन्हें कम छीलना पड़ता है, कम टूटना पड़ता है।" आगे लिखते हैं- "बीच
में घुसने के लिए महीन होना पड़ता है, नुकीला होना पड़ता है।" लेखक अतीत की स्मृतियों में मिट्टी की दावात, सरकंडे की कलम और विद्यालय के गुरु जी को याद करते, आवाज़ देते अपने बचपन को याद कर वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर चोट करते हुए
लिखते हैं- "उन दिनों बचपन का एक बड़ा हिस्सा बचपन का ही हुआ करता था। शिक्षा
में निवेशक, मनोवैज्ञानिक और प्रयोगशाला वाले नहीं
घुसे थे, इसलिए थैला उठाने की ताकत होने पर ही
बच्चे विद्यालय जाते थे।" एक लेखक के जीवन में पेंसिल का बना रहना उसके
सक्रिय रहकर साहित्य के द्वारा समाज को रेखांकित करने का मनो पर्याय हो।
'प्रकृति और संगीत' में बताया गया है कि वास्तव में प्रकृति ही संगीत का स्रोत है। प्रकृति के
कण-कण में एक लय है, सुर है; हमें मात्र उसे महसूस करने की आवश्यकता है, कोयल की कूक में, पपीहे की टेर में, हवाओं की सरसराहट में, नदियों के कलकल में, कृष्ण की बाँसुर में, शिव के डमरू में, नारद की वीणा में, कहाँ नहीं है संगीत? लेखक ने जीवन मात्र में संगीत की उपस्थिति को शिद्दत से महसूस किया है।
'रहिया बुहारे शबरी' में शबरी के माध्यम से राढ़ी जी ने एक समुदाय विशेष के अनवरत कर्तव्यनिष्ठा को उजागर करने का एक संवेदनशील
उपक्रम किया है। राम की शबरी तो मुक्त हो गई थी, पर वर्तमान पथ बुहारती शबरियों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस
सुकृत्य को बिना रुके करती ही चली आ रही है। लेखक ने कितनी सुन्दर और मार्मिक बात
लिखी है- "कभी शबरी को राम का इंतज़ार था, आज पथ को शबरी का इंतज़ार है।" आगे लिखते हैं,
"पहले वह राम के लिए पथ बुहारती थी, आज रोटी के लिए बुहारती है।" वर्तमान शबरी का
दर्द लेखक की इन पंक्तियों में उभर आया है- "शबरी समझ गई है कि अब उसके राम
नहीं आएँगे, अब राम के बजाय आलिशान गाड़ियों में
रावण और मारीच जैसे लोग आते हैं।" एक ऐसे अनछुए विषय पर इतना संवेदनशील लेख
पाठकों को लेखक के विचार-वैविध्यता का बोध कराता है।
'रिवर्स गियर' यानी अतीत की स्मृतियों में भटकना। यहाँ लेखक का यही अभिप्राय है। एक बानगी
देखिए- "बैठे-ठाले निपट अकेला लेखक साहित्य का न्यूटन हो जाता है।" आगे
लिखते हैं- "जिसके पास सोचने-विचारने, बोलने-बतियाने, पढने लिखने या कुछ महसूस करने के लिए
क्षणमात्र भी शेष नहीं है,
वही सफल है, इसके विरुद्ध जो
सोचने-विचारने, दूसरों को सुख देने, मन की कोमल अनुभूतियों को स्वर देने
और थोड़े में गुजारा कर लेने को जीवन का उद्देश्य समझ बैठा, वह असफल है।" लेखक नास्टैल्जिक
एवं नार्सिसिस्ट की व्याख्या करते हुए कहीं-न-कहीं समाज के बनाए हुए मापदंडों पर
प्रहार करते दिखते हैं, जो अन्तः की करुणा से प्रेरित है। लेख के अंत की एक पंक्ति उद्धृत किए बिना
आगे बढ़ना संभव नहीं- "अपने माथे पर लगा चन्दन पावन होता है, जबकि दूसरे के माथे पर पाखण्ड।"
'ठंढा तेल' निबंध लेखक को माँ के स्नेहमय स्पर्श की याद दिला जाता है और इसी स्पर्श की
डोर थामे वह समाज की तमाम संगति एवं विसंगति से पाठकों को रूबरू कराते चलते हैं।
'भारवि का छंद-पद चमत्कार' संस्कृत साहित्य को जानने-समझने वाले भारवि की
काव्य-प्रतिभा से परिचित हैं। भारवि पर इतना सारगर्भित लेख पढ़कर राढ़ी जी के अकूत
संस्कृत ज्ञान की थाह लगाई जा सकती है। भारवि की इन छंदों की समझ किसी सामान्य
ज्ञानी के वश की बात नहीं। महाकवि भारवि के साथ-साथ यह लेख पाठकों को संस्कृत के
अप्रतिम साहित्य भण्डार से भी परिचित कराता है।
इस तरह बाईस ललित निबंधों का यह संग्रह 'कुल्हड़ की चाय' राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, द्वारा प्रकाशित, हिंदी साहित्य जगत को समृद्ध
करता एक अविस्मरणीय निबंध संग्रह है। हजारीप्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र, विवेकी राय जैसे निबंधकारों की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए श्री हरिशंकर राढ़ी जी ने सुगढ़ निबंधों का एक अद्भुत संकलन
हिंदी पाठकों को दिया है। पढ़ते समय कहीं-कहीं तो ऐसा लगा कि यह संग्रह ग्रामीण
भारत का एक सुरक्षित दस्तावेज है, जो आनेवाली पीढ़ियों को बहुत-सी गुम होती संस्कृति
एवं परम्परा से परिचित कराता रहेगा। राढ़ी जी के हिंदी, अंग्रेजी एवं संस्कृत के सम्यक ज्ञान ने निबन्धों को एक अद्भुत भाषा एवं भाव
का ओज प्रदान किया है। कहीं उनका व्यंग्यकार प्रखर होता है तो कहीं उनका कवि रूप।
आपकी साहित्य साधना यूँ हीं हिंदी साहित्य को समृद्ध करती रहे, इस शुभकामना के साथ-साथ पाठकों को आपके अगले ललित निबंध संग्रह की प्रतीक्षा
रहेगी।
समीक्षिका संपर्क :
कांदीवली वेस्ट, मुंबई-400067
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