विश्वशांति के लिए खतरा मत्स्यन्याय
इष्ट देव सांकृत्यायन
बात बेहद कड़वी है, लेकिन वस्तुस्थिति को सरल शब्दों में समझाने का इससे बेहतर तरीका नहीं है। भगवान न करें, लेकिन मान लीजिए कि आपके पास बहुत उपजाऊ खेत हों और उस पर किसी माफिया की नजर हो। वह माफिया कल अपना गिरोह लेकर आए और आपका अपहरण कर ले जाए। साथ नाचने के लिए सौ-दो सौ भाड़े के नचनिए लेकर आए और आपके अपहरण के बाद उन्हें आपके दरवाजे पर नचाने लगे, या आपके ही परिवार के किसी बिगड़े हुए गजेड़ी बच्चे को सुलफा सुंघाकर नचाने लग जाए, तो क्या इससे ये सिद्ध हो जाता है कि आपके अपहरण और आपके खेतों पर उस माफिया के कब्जे से आपके परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई है? बिलकुल यही वेनेजुएला के साथ हो रहा है। दुर्भाग्य यह कि नरेंद्र मोदी के नाम पर दशकों से भारत के अहित की कामना में लगे हुए चुटकी भर निर्लज्ज लालची तत्त्व इन भाड़े के नचनियों को उदाहरण बना रहे हैं। जबकि सच यह है कि ट्रंप जैसे बड़बोले तानाशाह के नेतृत्व में संयुक्त राज्य अमेरिका, न केवल पूरे उत्तर एवं दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप, बल्कि विश्वशांति के लिए खतरा बन चुका है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि पूरा यूरोपीय यूनियन लंबे समय से अमेरिका का पिछलग्गू बना हुआ है।
खुद अमेरिका में जिस बात का विरोध है, यूरोप के कई राजनेता उसका समर्थन कर रहे हैं। शब्दों के हेरफेर की बात छोड़ दें यूरोप के लगभग सभी राष्ट्र प्रमुखों की बात एक ही जैसी है। अगर एक बार मान भी लें कि निकोलस मादुरो तनाशाह हैं और उनका शासन लोकतांत्रिक नहीं था, तो क्या इससे ट्रंप को वेनेजुएला की संप्रभुता के सत्यानाश का लाइसेंस मिल जाता है? वेनेजुएला से कई हजार गुना ज्यादा तानाशाही चीन, उत्तर कोरिया, कतर और सऊदी अरब में है। उस ओर कभी ट्रंप ने रुख क्यों नहीं किया? अभी बहुत दिन नहीं गुजरे जब पूरे संयुक्त राज्य अमेरिका में फिफ्टी फिफ्टी वन (50501) यानी ‘पचास राज्य एक आंदोलन’ हुआ था। यह आंदोलन न केवल डोनाल्ड ट्रंप की तानाशाही, बल्कि उनकी अयोग्यता एवं अक्षमता के भी खिलाफ था और यह कहीं से भी प्रायोजित नहीं था। अप्रैल में हुए इस आंदोलन के बाद अक्टूबर में एक और आंदोलन ‘नो किंग्स’ भी हुआ। इसके स्वर भी वही थे और यह भी एक स्वतःस्फूर्त एवं सजीव जनांदोलन था। अमेरिका के सभी प्रमुख शहरों में आज ही बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं, वेनेजुएला पर की गई ट्रंप की इस तानाशाही के खिलाफ। केवल एक साल के भीतर ट्रंप के खिलाफ तीन बहुत बड़े प्रदर्शन हो चुके। ये तीनों प्रदर्शन स्वतःस्फूर्त और सजीव हैं। इस आधार पर अगर ट्रंप में जरा सी भी नैतिकता है तो उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देकर राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए। क्या वे ऐसा करेंगे? या फिर लोकतंत्र का पाखंड ही करते रहेंगे?
दूसरा आरोप ट्रंप ने यह लगाया कि वेनेजुएला में नशीले द्रव्यों का बड़ा कारोबार है। क्या यह केवल वेनेजुएला में है? ट्रंप की नाक के नीचे शिकागो से बड़ा कोई अड्डा है क्या नशे के कारोबार का? द अर्गनाइजेशन ऑफ अमेरिकन स्टेट्स के अनुसार 2013 में 34 बिलियन डॉलर का केवल कोकेन बेचा गया था अमेरिका में। उनकी ऑफिस ऑफ द नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी की रिपोर्ट के अनुसार कुल मिलाकर 100 बिलियन डॉलर के अवैध ड्रग उस साल पूरे संयुक्त राज्य अमेरिका में बेचे गए थे। यह आँकड़ा अब कई गुना हो चुका है। 2023 में इल्लीगल ड्रग ट्रैफिकिंग से जुड़े कुल 18939 बड़े केस दर्ज किए गए थे। ये नशीले द्रव्य बेचने के धंधे में ट्रंप के देश में आठ लाख से ज्यादा अवयस्क शामिल पाए गए। तो क्या इसके बाद भी ट्रंप के पद पर बने रहने का कोई आधार बचता है? क्या इस आधार पर दूसरे किसी ताकतवर को देश को चाहिए कि वह डोनाल्ड और मेलानिया ट्रंप को उठा ले जाए? अगर नहीं तो वेनेजुएला पर की गई इस बर्बर कार्रवाई के लिए यह तर्क सही कैसे हो सकता है?
इन कुतर्कों के साथ किसी देश की संप्रभुता का सत्यानाश करना, उसके राष्ट्रपति एवं उनकी पत्नी को बंधक बनाना और महिला उपराष्ट्रपति को धमकी देने जैसे कुकृत्य किसी माफिया डॉन के तो हो सकते हैं, राजनेता के नहीं। ये कुकृत्य बताते हैं कि ट्रंप का विश्वास मत्स्य न्याय में है। चूँकि ट्रंप के पास लाठी है, इसलिए दुनिया की हर भैंस ट्रंप की है। सच पूछिए तो ट्रंप का सिद्धांत विश्वशांति के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुका है। अब अगर दुनिया विश्वयुद्ध की ओर बढ़ती है तो उसके लिए जिम्मेदार डोनाल्ड ट्रंप होंगे। लंबे समय तक खुफिया एजेंसियों से जुड़े रह चुके मेरे एक अग्रज मित्र कहते हैं कि इस तरह के हमले संकेत देते हैं कि संबंधित राजनेता का विश्वास राजनयिक चैनल से खत्म हो चुका है।
ट्रंप ने कोई पहली बार ऐसा नहीं किया है। अपनी ताकत की धौंस वे पहले भी कई बार दिखा चुके हैं। अपने पिछले कार्यकाल में उन्होंने उत्तर कोरिया के साथ ऐसा ही कुछ किया था। हाल में रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से मुलाकात में भी उन्होंने अपनी ताकत के धृष्ट प्रदर्शन की कोशिश की थी। यद्यपि रूस की ओर से तुरंत इसका अनुकूल उत्तर पाकर वे थम गए थे। यही बात वे चीन या इजरायल के साथ नहीं कर सकते। एक ऐसी ही साजिश चीन में मोदी के साथ भी हो चुकी है। चूँकि ट्रंप को उनकी साजिश का जवाब उन्हीं की तरह मिल गया तो आगे उन्हें भारत के साथ ऐसा कुछ करने की हिम्मत नहीं होगी। लेकिन भारत प्राकृतिक संसाधनों से एक अत्यंत संपन्न देश है। दुर्भाग्य से इसके पास नेताओं और बुद्धिजीवियों के रूप में ट्रंप की ही तरह कई अयोग्य, अक्षम, अशिष्ट और अति महत्त्वाकांक्षी लोग हैं। इसलिए भारत के सिर से यह खतरा कभी टल नहीं सकता।
अंतरराष्ट्रीय नीतियों को भी ताक पर रखकर वेनेजुएला पर किया गया हमला और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया अदेला फ्लूरो को बंधक बनाने के कृत्य उन कारणों से बिलकुल भी नहीं किए गए जो दुनिया भर को बताए जा रहे हैं। ये कोई कारण नहीं, पाखंड हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे दूसरे राष्ट्रों की संप्रभुता और लोकतंत्र में अमेरिका का विश्वास। वेनेजुएला पर हमले का असल कारण वह भी नहीं है जो कहा जा रहा है, यानी तेल। तेल एक ह्रासोन्मुख खनिज संपदा है। बतौर ईंधन अब यह गए जमाने का घोषित हो चुका है। ट्रंप की कुदृष्टि वस्तुतः उन दुर्लभ खनिजों पर है जो वेनेजुएला, पेरू और इंडीज के पास हैं, लेकिन जिनकी प्रॉसेसिंग पर कब्जा अधिकांशतः चीन का है। वह रेयर अर्थ मेटल, जिसके नाते चीन दुनिया भर में बिजली वाहनों का बेताज बादशाह बना हुआ है, वेनेजुएला के पास है।
ऐसे कई खनिजों का एक बड़ा भंडार पेरू के पास है। पेरू के पास भी इनकी प्रॉसेसिंग का अपना कोई उद्यम नहीं है। वहाँ चीन अपने तरीके से काम कर रहा है और अमेरिका उससे सीधे भिड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता। वेनेजुएला और पेरू के बीच एक और गरीब देश कोलंबिया है। अमेरिका सबसे पहले पेरू तक चीन की पहुँच का रास्ता काटना चाहता है। यह पूरा इलाका यानी वेनेजुएला, कोलंबिया, इक्वाडोर, पेरू, बोलिविया, पैरागुए, अर्जेंटीना और चिली; और इनके साथ साथ इंडीज भी दुर्लभ खनिजों के सुषुप्त बड़े भंडार के रूप में जाना जाता है। ये खनिज हैं तांबा, निकल, जिंक, सोना, चाँदी, लेड, बॉक्साइट, प्राकृतिक गैस और वह रेयर अर्थ मेटल जिसके बिना विद्युत वाहनों का चलना संभव नहीं है।
वेनेजुएला पर कब्जे का अर्थ है इस पूरे भंडार के मुख्य दरवाजे पर अमेरिका का कब्जा। अगर अमेरिकी तानाशाही अभी नहीं रोकी गई तो उसकी इस लूट खसोट के शिकार ये सारे देश होंगे। केनेडा के लिए तो ट्रंप आते ही लार टपका चुके हैं, अब दक्षिण अमेरिका को निगलने का उनका अभियान शुरू हो चुका है। मैं नहीं कह सकता कि बीच में होने के नाते कोलंबिया बख्शा जाएगा या नहीं, लेकिन पेरू अब बचने वाला नहीं है। अगले साल तक वहाँ से भी किसी को नोबल या मैग्सेसे कुछ न कुछ जरूर दिया जाएगा।
एक एक कर इन सभी देशों का नंबर आएगा। ध्यान रखिएगा, बहुत जल्दी ही भारत से भी किसी को नोबल मिलेगा। वैसे पहले भी भारत में कुछ लोगों को नोबल और कई लोगों को मैग्सेसे मिल चुका है। भारत के लिए उनकी भूमिका क्या रही है, इसे हर पुरस्कार पर ताली बजाने वालों की दृष्टि से न देखें। याद रखें कि तीन महीने पहले तक डोनाल्ड ट्रंप खुद नोबल शांति पुरस्कार के लिए छाती पीट रहे थे। ऐसे जैसे ट्रंप कोई राष्ट्रपति नहीं, मामूली प्रॉपर्टी डीलर हों। फिर यह पुरस्कार वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को मिल गया और मिलते ही मचाडो ने वह पुरस्कार ट्रंप को समर्पित कर दिया। दुनिया वाकई इतनी मूर्ख है क्या कि इसका निहितार्थ न समझे? खासकर तब जबकि भारत के पड़ोस में एक नोबलविजेता कठपुतली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को उखाड़कर अपने देश में हर दिन अल्पसंख्यकों के नरसंहार की नई इबारत लिख रहा हो। दर्ज कर लें, भारत में भी मैगसेसे और नोबल की नई बाढ़ आने ही वाली है। अमेरिका अपने विखंडन की ओर तो बढ़ चुका है, बाकी आप अपनी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षा के शिकार बनते हैं या अपनी भावी पीढ़ियों का सुरक्षित भविष्य चुनते हैं, यह तो आपको ही तय करना है।
#southamerica #usa #KidnappingCase #UnitedStates #UnitedNations #UNSC #NicolasMaduro #VenezuelaCrisis #internationaldiplomacy
●

Comments
Post a Comment
सुस्वागतम!!