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भारतीय इतिहास पर एसिड अटैक

इष्ट देव सांकृत्यायन
अगर भंसाली ने अपनी फिल्म में ऐसा कुछ दिखाने की कोशिश की है, जैसा बताया जा रहा है तो इसे क्या माना जाए? यह भारतीय इतिहास के स्थापित तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं, बलात्कार जैसा है. इतिहास के सीने में खंजर भोंकने जैसा है. क्या दुनिया का कोई और देश अपने इतिहास के स्थापित तथ्यों के साथ कला के नाम पर ऐसा कुछ करने की इजाजत देता है? भारतीय इतिहास और जन ऐसी इजाजत क्यों देगा? उससे यह मूर्खतापूर्ण अपेक्षा क्यों की जानी चाहिए? क्या यह वैसा ही जघन्य अपराध नहीं है जैसे बलात्कार या छेड़छाड़ के किसी मामले में अपराधी को उसके अत्याचारों की शिकार लड़की का प्रेमी बताया जाए? क्या यह् पद्मावती की चरित्र हत्या जैसा मामला नहीं है? यह कौन करता है? वे टुच्चे वकील जिनका पेशा ऐसे घटिया लोगों की पक्षधरता करके ही चलता है. जिनके बारे में माना जाता है कि नैतिकता, मानवता और जीवन के उदात्त मूल्यों से उनका कोई लेना-देना नहीं है. क्या कला का धंधा करने वाले उन वकीलों से भी ज़्यादा गए-गुज़रे हो गए हैं? क्या इनका कोई दीन-ईमान नहीं रह गया है? क्या यह न केवल भारतीय इतिहास, बल्कि भारतीय जन से भी विश्वासघात जैसा न…

Mahrajganj Of Azamgarh

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आधुनिकता और महराजगंज --हरिशंकर राढ़ी  महराजगंज बाजार और पूरे क्षेत्र की यह विशिष्टता उल्लेखनीय है कि इक्कीसवीं सदी के लगभग दो दशक पार
कर लेने के बावजूद यहां अभी पश्चिमीकरण और बनावटीपन नहीं आया है। यह कहा जा सकता है कि जितना विकास राजमार्गों और जिला मुख्यालयों के पास वाले कस्बों का हुआ, उसकी तुलना में महराजगंज काफी
पिछड़ा ही है । अभी तक इस क्षेत्र में कोई सिनेमा हॉल, ऑडीटोरियम, स्टेडियम या बड़ा सार्वजनिक सभा स्थल भी नहीं है। यदि महराजगंज बाजार का व्यापार देखा जाए तो किसी भी बड़े कस्बे से टक्कर ले सकता है। बड़ी गल्ला मंडी, सब्जी मंडी, मशीनरी, भवन निर्माण सामग्री और जीवनोपयोगी पदार्थों का एक विशाल बाजार है यहां। महराजगंज से उत्तर लगभग 12 किलोमीटर की दूरी, यानी घाघरा के तट तक कोई दूसरा बड़ा बाजार नहीं है और समस्त बड़ी खरीदारियां लोग यहीं से करते हैं। पश्चिम में राजे सुल्तान पुर, दक्षिण में कप्तानगंज और पूरब में सरदहा तथा बिलरियागंज बाजार जरूर हैं लेकिन बड़ी खरीदारी के लिए अभी महराजगंज थोकमंडी जैसी भूमिका रखता है।इस सबके बावजूद महराजगंज का विकास नहीं हुआ। राजनैतिक कमजोरी, मुख्य मार्ग से दूर होना …
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कविता [] राकेश सोहम

चुनाव आ गए 
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वे फिर द्वारे आ गए
भैया चुनाव आ गए।

पिछले  बार  हंसे  थे
घर के भीतर घुसे थे
अम्मा के पाँव पड़े थे
बाद में कहाँ बिला गए ?

भैया चुनाव आ गए .......

अब की बार न भूलेंगे
आनंद के झूले झूलेंगे
दद्दा  जी  न  कूलेंगे
हाथ जोड़कर जता गए !

भैया चुनाव आ गए .......

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