Posts

Showing posts from 2015

चित्रकूट में शेष दिन

Image
हरिशंकर राढ़ी  स्फटिक शिला: चित्रकूट शहर से कुछ ही दूरी पर मंदाकिनी के तट पर यह शिला है जो स्फटिक पत्थर की ही। नदी के उस पर सुंदर घना जंगल है और कुल मिलाकर नेत्रों को बड़ी शांति मिलती है। इस शिला पर भगवान राम सीता के साथ बैठा करते थे और समय को देखते रहते थे। यहीं इंद्रपुत्र जयंत कौवे के भेश में सीता के चरणों में चोंच मारकर भागा था और श्रीराम ने सींक का तीर चलाकर दंडित किया था। यह कथा बहुत प्रसिद्ध है। लेकिन, मुझे जो चीज सबसे रोचक लगी, वह यह कि राम कितने प्रकृति प्रेमी रहे होंगे और कितना चिंतन करते रहे होंगे। उनका सीता जी के साथ प्रेम का एक सुुंदर प्रसंग रामचरित मानस में मिलता है:


एक बार चुनि कुसुम सुहाए।
निजकर भूषण राम बनाए।।
सीतहिं पहिराए प्रभु सादर।
बैठे फटिक शिला पर सुंदर।।
                            (अरण्य कांड, )
इस शिला पर राम के पैरों के चिह्न बने हुए दिखाई देते हैं। यहीं पर जयंत ने अपनी एक आंख देकर अपने प्राणों की रक्षा की थी। जयंत की वह आंख भी यहां पत्थर पर अंकित है।
जानकी कुंड:  स्फटिक शिला से रामघाट की ओर बढ़ने पर जानकी कुण्ड  मिलता है। दरअसल यह मंदाकिनी का एक घाट है जहाँ च…

इन्द्राणी के बहाने

हालांकि मीडिया के सोचने-करने के लिए हमेशा बहुत कुछ रहता है, इस वक़्त भी है. न तो किसानों की आत्महत्या रुकी है, न कंपनियों की लूट, न ग़रीबों-मज़दूरों का शोषण, न फीस के नाम पर स्कूलों की लूट. सांस्कृतिक दृष्टि से देखें देश का सबसे बड़ा पर्व महाकुंभ नासिक में और राजनीतिक नज़रिये से चुनाव बिहार में चल ही रहे हैं. मीडिया चाहे तो इनके बहाने उन बुनियादी सवालों से जूझ सकती है जिनसे जूझना देश और जन के लिए ज़रूरी है. लेकिन हमारी मीडिया ऐसा कभी करती नहीं है. इन सवालों से वह हमेशा बचती रही है और आगे भी बचती रही है. इनसे बचने के लिए ही वह कभी कुछ झूठमूठ के मुद्दे गढ़ती है और कभी तलाश लेती है. जिन मुद्दों को वह तलाश लेती है, उनमें कुछ देश को जानना चाहिए या जिन प्रश्नों की ओर देश का ध्यान जाना चाहिए, उनसे वह हमेशा बचती है. ऐसा ही एक मुद्दा इन दिनों इंद्राणी मुखर्जी का है. ख़बरें उन्हें लेकर बहुत चल रही हैं, लेकिन उन तीखे प्रश्नों से हमारी मीडिया बच कर भाग जा रही है, जो उठाए ही जाने चाहिए. वही प्रश्न उठा रहे हैं भारत संस्कृति न्यास के अध्यक्ष संजय शांडिल्य
वास्तव में कहा आ गए है हम। क़ुछ समझ में नहीं आता। हम…

चित्रकूट के रामघाट पर

Image
हरिशंकर राढ़ी 
रामघाट पर हमारा पहला मुकाबला बोटिंग वालों से हुआ। घाट की ओर रुख करते ही बोटिंग वाले कुछ इस तरह हम पर टूटे जैसे मधुमक्खियों, ततैया या बर्र का झुण्ड  टूटता है। केवल उनकी खींचतान और शोर -शराबा । मुझे ऐसे मुकाबलों से सख्त नफरत है। एक-दो बार मना करने के बावजूद जब उनकी दुकानदारी बंद नहीं हुई तोे गुस्सा फूट पड़ा। यार चैन से जीने दोगे या नहीं ? कोई यात्री तुम्हें ग्राहक के अलावा भी कुछ नजर आता है कि नहीं ? कौन किस मूड और किस परिस्थिति में आया है, तुम्हें इससे फर्क पड़ता है या नहीं ? और न जाने क्या - क्या ! थोड़ी सी भीड़ जमा हुई और फिर कोई खास मनोरंजन न पाकर धीरे-धीरे छंट गई। अपने देश  का भीड़तंत्र तो है ही ऐसा। अकेला पाकर रामघाट की सीढि़यों पर बैठ गया। शांत  होने का प्रयास करने लगा और सोचने भी लगा। आखिर ऐसा हुआ क्यों जा रहा है। लोग तीर्थों पर इसलिए जाते रहे होंगे कि कुछ शांति  मिल सके; थोड़ा सा स्वयं को भी देखने का अवसर मिल सके। भौतिकवाद और मौज-मस्ती से अलग अपनी आत्मा के नजदीक जाने का अवसर मिल सके। लेकिन कहां से कहां पहुंच गई हमारी सभ्यता और मानसिकता ! तीर्थस्थल पिकनिक और मौजमस्त…

गढ़ तो चित्तौडग़ढ़...

Image
इष्ट देव सांकृत्यायन 
गढ़ तो चित्तौडग़ढ़, बाक़ी सब गढ़ैया... यह कहावत और इसके साथ-साथ मेवाड़ के महाराणाओं की शौर्यगाथाएं बचपन से सुनता आया था। इसलिए चित्तौड़ का गढ़ यानी क़िला देखने की इच्छा कब से मन में पलती आ रही थी, कह नहीं सकता। हां, मौक़ा अब जाकर मिला, अगस्त में। जिस दिन कार्यक्रम सुनिश्चित हो पाया, तब तक रेलवे रिज़र्वेशन की साइट दिल्ली से चित्तौडग़ढ़ के लिए सभी ट्रेनों में सभी बर्थ फुल बता रही थी। जैसे-तैसे देहरादून एक्सप्रेस में आरएसी मिली। उम्मीद थी कि कन्फर्म हो जाएगा, पर हुआ नहीं। आख़िर ऐसे ही जाना पड़ा, एक बर्थ पर दो लोग। चित्तौडग़ढ़ पहुंचे तो साढ़े 11 बज रहे थे। ट्रेन सही समय पर पहुंची थी। स्टेशन के प्लैटफॉर्म से बाहर आते ही ऑटो वालों ने घेर लिया। मेरा मन तो था कि तय ही कर लिया जाए, पर राढ़ी जी ने इनके प्रकोप से बचाया। उनका कहना था कि पहले कहीं ठहरने का इंतज़ाम करते हैं। फ्रेश हो लें और कुछ खा-पी लें, फिर सोचा जाएगा। इनसे बचते हुए सड़क पर पहुंचे तो सामने ही एक जैन धर्मशाला दिखी। यहां बिना किसी झंझट के कम किराये पर अच्छा कमरा मिल गया। रेलवे स्टेशन के पास इतनी अच्छी जगह मिलने की उम्मी…

Most Read Posts

Bhairo Baba :Azamgarh ke

Maihar Yatra

Azamgarh : History, Culture and People

सीन बाई सीन देखिये फिल्म राब्स ..बिना पर्दे का

रामेश्वरम में

ये क्या क्रिकेट-क्रिकेट लगा रखा है?

गन्ने के खेत में रजाई लेकर जाती पारो

गढ़ तो चित्तौडग़ढ़...

चित्रकूट की ओर

चित्रकूट में शेष दिन