श्रीशैलम : बांध लेता है यह छंद मुक्त

इष्ट देव सांकृत्यायन

श्रीशैलम के लिए हमारा सफ़र तिरुपति से शुरू होना था। तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार एक दिन पूर्व यानी 31 दिसंबर को ही दिन में तिरुपति के सभी दर्शनीय स्थल घूमकर अगले दिन यानी 1  जनवरी को सुबह ही हमें वहां से श्रीशैलम  के लिए निकलना था। 31 दिसंबर को दिन में तो वहां घूमना संभव नहीं हो सकाक्योंकि पूरा समय तिरुमाला पर्वत स्थित भगवान श्री वेंकटेश्वर मंदिर में ही बीत गया। नए साल की पूर्व संध्या पर वहां दर्शनार्थियों की जो क़तार लगी थीउसे देखकर किसी की भी हिम्मत छूट सकती थी। काफ़ी जद्दोजहद के बाद हमने दर्शन किया और रात में बाक़ी जगहें घूम लीं। छोटा क़स्बा होने के नाते बहुत अधिक समय नहीं लगा। तीर्थस्थल होने और दूर-दराज से अकसर श्रद्धालुओं के आते रहने से तिरुपति में किसी भी समय निकलना मुश्किल नहीं है। छोटा सा यह क़स्बा दिन-रात जागने और चलते रहने वाला है। अगले दिन सुबह 9 बजे ट्रेन पकडऩे में हमारे लिए कोई बाधा नहीं थी। तिरुपति में जिस गेस्टहाउस में हम ठहरे थेवह रेलवे स्टेशन के ठीक सामने ही था। वहां से स्टेशन पहुंचना  मुश्किल नहीं था। रात में तय हुआ कि सुबह नाश्ते से पहले ही हम लोग चेक आउट कर जाएंगे। इसके बाद नाश्ता करेंगे और फिर ट्रेन पकड़ेंगे।
 
श्रीशैलम की पहाड़ियां 
नाश्ते के बाद सभी लोग स्टेशन पहुंचे। वहां ट्रेन के बारे में कोई सूचना ही नहीं थी। इन्क्वायरी काउंटर पहुंचने पर पता चला कि ट्रेन तो छह घंटे देर है। जो ट्रेन 9 बजे खुलने वाली थीवह 3 बजे जाएगी। अब हमारे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि हम दुबारा गेस्ट हाउस लौट आते और वहीं बैठकर इंतज़ार करते। बीते दिन बहुत देर तक बिना खाए-पिए क़तार में खड़े रहने से हमारे साथी श्री हरिशंकर राढ़ी का स्वास्थ्य भी थोड़ा ख़राब हो गया था। ऐसी स्थिति में स्टेशन के वेटिंग रूम में समय गुज़ारना मुश्किल था। मजबूरन गेस्ट हाउस वापस आए। केवल छह घंटे के लिए अब दुबारा कमरा तो बुक कराया नहीं जा सकता था और कोई दूसरी वैकल्पिक व्यवस्था वहां थी नहीं। आख़िरकार हमने वहां वेटिंग हॉल में ही समय गुज़ारना तय किया। गेस्ट हाउस के वेटिंग हॉल में पर्याप्त जगह थी। कुछ लोग किताबों में व्यस्त हो गएकुछ ख़रीदी गई वस्तुओं या आइपॉड में और बच्चे फ़ोन पर गेम में। हालांकि बच्चे फ़ोन पर बहुत देर तक व्यस्त नहीं रह सके। लंबा-चौड़ा हॉल देखकर वे हाइड एंड सीक खेलने में जुट गए। 

देखते ही देखते अब तक अपरिचित रहे दूसरे पर्यटक बच्चों से भी उनकी दोस्ती हो गई। धमाचौकड़ी का माहौल कुछ ज्य़ादा ही गहरा होते देख हमने लंच के बहाने उन्हें बाहर निकाला और बाज़ार की ओर चल दिए। काफ़ी देर इधर-उधर भटकने के बाद एक रेस्टोरेंट में दक्षिण भारतीय भोजन किया और वापस गेस्ट हाउस आ गए। अभी भी केवल 12 बजे थे और तीन घंटे बाक़ी थे। बच्चों को तीन घंटे बांधकर रखना आसान नहीं थाइसलिए मेरे अनुज अभीष्ट उन्हें लेकर म्यूजि़यम दिखाने चले गए। वहीं से पद्मावती देवीमंदिर भी चले गए। क़रीब दो बजे वापस लौटे। हमने सोचा, दुबारा सबको लेकर स्टेशन जाने से बेहतर होगा कि केवल दो लोग जाकर पहले ट्रेन का पता कर लें। इसके बाद जाया जाए। स्टेशन की इनक्वायरी से मालूम हुआ कि ट्रेन 3 बजे ही जाएगी। यह अलग बात है कि अभी प्लैटफॉर्म तय नहीं है। तय हुआ कि अब सब स्टेशन चलेंलेकिन स्टेशन पहुंचने पर मालूम हुआ कि अब ट्रेन रात 8 बजे जाएगी।

श्रीशैलम बस अड्डा 
आख़िर धैर्य कब तक साथ देता। तय हुआ कि अब यहां बैठकर इंतज़ार करने से बेहतर होगा रेल का रिज़र्वेशन कैंसिल करा श्रीशैलम के लिए बस पकड़ी जाए। ख़ैर, वहीं वेटिंग रूम में बैठकर रिज़र्वेशन कैंसिल कराया। उम्मीद थी कि पहले तरह जब ट्रेन 8 घंटे से ज़्यादा लेट हो चुकी है तो आसानी से हमारा पूरा पैसा वापस मिल जाएगा। पर अफ़सोस, आइआरसीटीसी ने उसका पैसा लौटाने के बजाय हमें बताया कि चार्ट बन चुका है। अतः अब आपको टीडीआर भरना होगा। इसके पहले तक मैं टीडीआर शब्द से भी परिचित नहीं था। मुझे पूरा भरोसा था कि आइआरसीटीसी बेईमानी नहीं करेगी और हमारा पूरा पैसा लौट आएगा। बारहां अफ़सोस, हमने साल भर इंतज़ार किया, कई बार कार्पोरेशन को फोन भी लगाया और अंत में मुझे मेल आया कि उनके रिकॉर्ड के मुताबिक गाड़ी समय पर चली और हमने सफर किया। वैसे वे ग़लत नहीं थे। क्योंकि हमने सफ़र तो किया ही, ये अलग बात है कि सफ़र हमने उर्दू-हिंदी में नहीं, अंग्रेज़ी में किया। इससे मुझे यह समझ में आ गया कि रेल में कितना गड़बड़झाला होता है और यह भी कि अगर कभी ऐसी नौबत आए तो वे दूसरे टिकट संभाल कर रखे जाएं जिनसे हम सफ़र करें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उपभोक्ता फोरम के काम आएं।

यह कड़वा अनुभव तो आपको सिर्फ़ इसलिए बता दिया ताकि आपके लिए यह सनद रहे और वक़्त ज़रूरत पर काम आए। आइए अब आगे बढ़ते हैं। तिरुपति से श्रीशैलम तक बस का सफ़र आसान नहीं था। ख़ासकर ऐसी स्थिति में जबकि साथ का एक व्यक्ति अस्वस्थ हो, पूरे 400 किमी बस से जाना अपने आपमें एक बड़ी सज़ा है। पर घुमक्कड़ी में श्रद्धा-भक्ति निभा पाना उनके बूते की बात भी नहीं है जो थोड़ी-बहुत सज़ा भुगतने के लिए तैयार न हों। फिर भी हिम्मत जुटा कर मैं राढ़ी जी के साथ पास ही मौजूद बस स्टैंड की ओर चल पड़ा। वहाँ मालूम हुआ कि श्रीशैलम के लिए सामान्य बस तो अभी जा रही हैलेकिन डीलक्स 6 बजे और सुपर डीलक्स रात 10 बजे निकलेगी। डीलक्स बस में हमें आसानी से मनचाही दस सीटें मिल गईं। वापस रेलवे स्टेशन आकर हमने सबको साथ लिया। दो टैक्सियां तय की गईं और बस स्टैंड आ गए। बस स्टेशन पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही हमारी बस भी आ गई। क़रीब आधे घंटे में सभी व्यवस्थित हो गए और यह भी भरोसा हो गया कि बस से भी यात्रा उतनी कष्टप्रद होगी नहींजितनी सोच कर हम डर रहे थे। बस अपने सही समय से चली।

कुछ ही दिनों पहले क्रिसमस बीता था और नए साल के जश्र का असर अभी पूरे माहौल पर तारी था। इसकी गवाही रास्ते भर पडऩे वाले छोटे-बड़े क़सबों-शहरों से लेकर गांव तक दे रहे थे। जगह-जगह सजे क्रिसमस स्टार और झिलमिलाती रोशनियां एक अलग ही कहानी कहती लग रही थीं।

आतंक से मुक्त

चलते समय एक अनजाना भय आंध्र प्रदेश में बहुचर्चित नक्सलीआतंक का भी था। बस से चलने में संकोच का एक कारण यह भी था। लेकिन, बस जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई, भय कम होता गया। हाइवे पर बसों का जैसा तांता लगा था और जिस तरह हमारी बस में जगह-जगह लोग बेखौफ़ चढ़ उतर रहे थे, उससे यह तो समझ में आ गया कि उतना डरने की ज़रूरत नहीं है, जितना हम डर रहे थे। रात क़रीब दस बजे वेल्लूर पहुंच कर मैंने एक सहयात्री से पूछ ही लिया। जो कुछ उन्होंने बताया उसका सारांश यह था कि यह बस जिन-जिन रास्तों से होकर जाएगी उस पूरे रास्ते में कहीं भी नक्सलियों का कोई भय नहीं है। हमें चित्तूर से निकल कर कुर्नूल जिले में जाना था और यह पूरा क्षेत्र नक्सलियों से लगभग अप्रभावित है। कभी कोई छिटपुट घटना हो जाए तो नहीं कहा जा सकता, पर आम तौर पर यह पूरा क्षेत्र सुरक्षित माना जाता है।


रात क़रीब साढ़े बारह बजे हम शिंगरैकोंडा पहुंचे। इस वक़्त भी पूरा क़स्बा रौशनी से जगमगा रहा था और चहल-पहल थी। यह नए साल का असर था। यह प्रकाशम जिले में एक छोटा सा क़स्बा है, जिसकी ख्याति 15वीं सदी में निर्मित भगवान वाराह नरसिंह मंदिर के लिए है। राजा देवराय द्वारा बनवाए गए इस मंदिर को दक्षिण सिंहाचलम नाम से भी जाना जाता है। क़स्बे के बाहर आकर बस एक ढाबे पर रुकी। हमने उतर कर हाथ-पैर सीधे किए, थोड़ा घूमे-टहले और चाय पी। थोड़ी ही देर में बस वहां से फिर चल पड़ी और रात साढ़े तीन बजे मरकपुर पहुंची। यहां से श्रीशैलम की कुल दूरी 84 किलोमीटर यानी दो घंटे की बचती है, लेकिन बस फ़िलहाल इसके आगे नहीं जा सकती थी। इसकी वजह बीच में पडऩे वाली श्रीशैलम वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी है। इस सैंक्चुरी में सुबह 6 बजे तक प्रवेश वर्जित है। ज़ाहिर है, ढाई घंटे का समय हमें यहीं काटना था। चूंकि बस आदतन एक ढाबे पर ही ठहरी थी और वहां कामचलाऊ स्तर की सभी ज़रूरी सुविधाएं थीं, इसलिए समय गुज़ारना बहुत मुश्किल नहीं था। बच्चे, जो अब तक सोए थे, वे भी अब उतर आए। इतनी रात गए खाने का कोई अर्थ तो था नहीं, लिहाज़ा चाय चलती रही।


प्रकृति की कविता
सुबह 6 बजते ही बस चल पड़ी। रास्ता जंगल से होकर गुज़र रहा था। सड़क के दोनों तरफ़ हरे-भरे पेड़ और घने जंगलों में इधर-उधर दौड़ते-भागते, कहीं-कहीं ऊंघते बैठे छोटे-छोटे वन्य जीव बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहे थे। बच्चे उन्हें उछल-उछल कर देखने की कोशिश करते, कई अपना किताबी या टीवी चैनलों से मिला ज्ञान बघारते और कभी-कभी हमसे सवाल करने लगते। यहां हिरन, भालू, बंदर और सेही तो बहुतायत में हैं। पक्षी भी कई तरह के हैं। शेर-चीते आदि देखने के लिए अलग से निकलना पड़ता है। उन्हें सड़क  के इर्द-गिर्द आने की अनुमति नहीं है और आम तौर पर वे अपने लिए बनाए गए क़ानून का सम्मान करते हैं, भले यह मजबूरी हो। चारों तरफ़ पहाड़ों से घिरा यह क़स्बा अद्भुत ही है। सुबह पौ फटते ही हम श्रीशैलम पहुंच चुके थे। चूंकि बस के स्टेशन पहुंचने का समय सात बजे का था, लिहाज़ा हमें क़स्बे के बाहर ही फिर एक ढाबे पर रुकना पड़ा। यहां आधे घंटे का समय गुज़ार कर ही आगे बढ़ा जा सकता था। सवा सात बजे हम श्रीशैलम बस स्टेशन पहुंच गए थे।

बस से उतरने के बाद सबसे पहली आवश्यकता कोई ठिकाना ढूंढने की थी। स्थानीय लोगों से पूछने पर मालूम हुआ कि बमुश्किल आधा किलोमीटर आगे बढऩे पर कई मध्यम दर्जे के गेस्ट हाउस और धर्मशालाएं हैं। हमें कम से कम दो बड़े कमरों की ज़रूरत थी, जो आसपास के गेस्ट हाउसों में एक ही तल पर उपलब्ध नहीं थे। अलग-अलग तलों पर ठहरने पर समन्वय में मुश्किल होती। इसलिए मल्लिकार्जुन मंदिर वाली सड़क पर ही मौजूद एक धर्मशाला में गए। यहां हमें एक साथ दो कमरे मिल गए। वह भी बहुत कम क़ीमत पर, जिसमें एक समय का भोजन भी शामिल था। हमें तुरंत तैयार होकर दर्शन के लिए निकलना था। अत: कोई देर किए बग़ैर हम तैयार हुए और 9 बजे मंदिर के लिए निकल पड़े।


कथाओं में कथाएं
मल्लिकार्जुन मंदिर का शिखर  
इस छोटे से क़स्बे की महत्ता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे दक्षिण का कैलास कहते हैं। नल्लमलाई पर्वतशृंखला पर मौजूद इस पहाड़ी को सिरिधन, श्रीनगम, श्रीगिरी और श्री पर्वत भी कहते हैं। मान्यता है कि अमावस्या को स्वयं शिव और पूर्णिमा को माता पार्वती इस ज्योतिर्लिंग में वास करती हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में होने के नाते भीड़ तो यहां भी थी, लेकिन तिरुपति जैसी नहीं। प्रवेश के लिए यहां भी दो तरह की व्यवस्थाएं हैं। एक तो टिकट वाली और दूसरी बिना टिकट की। हमने 101 रुपये प्रति व्यक्ति वाले टिकट लिए और लाइन में लग गए। हालांकि क़तार तेज़ी से चल रही थी, लेकिन मुख्य मंडप के बाहर ही रोक दी गई। मालूम हुआ, अभी अभिषेक हो रहा है। यह संपन्न हो जाने के बाद ही क़तार आगे बढ़ सकती है। वहां क़रीब एक घंटे तक इंतज़ार करना पड़ा और इस दौरान बेवजह जो धक्का-मुक्की हुई, वह अवर्णनीय है। बहरहाल 11 बजे तक हम मुख्य मंदिर में दर्शन कर चुके थे। हालांकि भीड़ के कारण उस दिन यहां मंदिर के भीतर जाना संभव न हो सका, लेकिन एक बात अच्छी लगी कि दक्षिण के कुछ मंदिरों की तरह श्रीशैलम में जाति-धर्म का कोई भेदभाव नहीं है। किसी भी जाति-धर्म को मानने वाले लोग यहां भीतर जाकर अभिषेक कर सकते हैं और यह प्रथा यहां आरंभ से चली आ रही है।

श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग को लेकर कई किंवदंतियां हैं। इनमें से कुछ यहां प्रकारम पीठिका पर खुदी भी हैं। एक तो यह है कि महर्षि शिलाद के पुत्र पर्वत ने भगवान शिव का घोर तप किया। जब भगवान शिव ने दर्शन दिया तो पर्वत ने उनसे अपने शरीर पर ही विराजमान होने का अनुरोध किया। शिव ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। इस प्रकार तपस्वी पर्वत उसी स्थान पर पर्वत के रूप में बदल गए और उन्हें श्रीपर्वत कहा गया तथा भगवान शिव ने मल्लिकार्जुन स्वामी के रूप में उनके शिखर पर अपना वास बनाया। इसीलिए श्रीशैलम में भगवान शिव को मल्लिकार्जुन स्वामी के नाम से जाना जाता है।

ज्योतिर्लिंग ही नहीं, शक्तिपीठ भी
मल्लिकार्जुन स्वामी की एक विशिष्टता यह भी है कि यही एक ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जो शक्तिपीठ भी है। मल्लिकार्जुन स्वामी के साथ देवी भ्रमरांबा भी इसी परिसर में विराजित हैं। श्री शिव महापुराण के अनुसार देवी सती के ऊपरी होंठ यहीं गिरे थे। कथा यह भी है एक राजकुमारी ने भगवान शिव को पति के रूप में पाना चाहा और इसके लिए उसने कठोर तप किया। एक रात भगवान शिव ने स्वप्न में उसे निर्देश दिया कि तुम इस भ्रमर के पीछे आओ। जहां यह रुक जाए, वहीं ठहर कर मेरी प्रतीक्षा करना। नींद खुली तो उसने पाया कि सचमुच एक भौंरा उसके सामने मंडरा रहा है। राजकुमारी उसके पीछे-पीछे चल पड़ी। काफ़ी दूर तक चलने के बाद भ्रमर श्रीशैलम पर्वत पर स्थित चमेली के एक पौधे पर ठहर गया। राजकुमारी वहीं बैठकर भगवान की प्रतीक्षा करते हुए पुन: तप करने लगी। उसे तपलीन देख स्थानीय वनवासी उसके लिए शहद और फल लाने लगे। अंत में भगवान शिव एक वृद्ध के रूप में प्रकट हुए और राजकुमारी के साथ विवाह किया। इसके कुछ दिनों बाद वनवासियों ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। वनवासियों ने अपनी परंपरा के अनुसार भोजन में उन्हें मांस और मदिरा परोसी, जिसे वह स्वीकार नहीं कर सके। राजकुमारी ने हठ किया तो शिव वहां से दूर चले गए और कई बार अनुनय-विनय के बाद भी लौट कर नहीं आए। इससे रुष्ट राजकुमारी ने उन्हें पत्थर हो जाने का शाप दिया। वे यहां ज्योतिस्वरूप शिवलिंग में बदल गए और मल्लिका (चमेली) पुष्पों से अर्चित (पूजित) होने के कारण मल्लिकार्जुन कहे गए। जब यह बात देवी पार्वती को पता चली तो उन्होंने राजकुमारी को भ्रमर हो जाने का शाप दिया, क्योंकि वह भ्रमर के पीछे आई थीं। इस प्रकार उनका नाम भ्रमरांबा पड़ा और वही यहां शक्तिस्वरूप में प्रतिष्ठित हैं।

एक कथा यह भी है कि भगवान शिव श्रीशैलम के जंगलों में एक बार शिकारी के रूप में आए। यहां उन्हें एक चेंचू कन्या से प्रेम हो गया। उसके साथ विवाह कर वह यहीं पर्वत पर बस गए। इसीलिए स्थानीय चेंचू जनजाति के लोग मल्लिकार्जुन स्वामी को अपना रिश्तेदार बताते हैं और चेंचू मल्लैया कहते हैं।

श्री शिव महापुराण में इस ज्योतिर्लिंग के आविर्भाव की कथा बिलकुल भिन्न है। इसके अनुसार भगवान शिव के पुत्र श्री गणेश और कार्तिकेय एक बार विवाह को लेकर आपस में बहस करने लगे। दोनों का हठ यह था कि मेरा विवाह पहले होना चाहिए। बात भगवान शिव और माता पार्वती तक पहुंची तो उन्होंने कहा कि तुम दोनों में से जो पूरी पृथ्वी की परिक्रमा पहले पूरी कर लेगा, उसका ही विवाह पहले होगा। कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मयूर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए चल पड़े। लेकिन, गणेश जी के लिए यह बहुत कठिन था। एक तो स्थूल काया, दूसरे वाहन मूषक। उन्होंने एक सुगम उपाय निकाला। सामने बैठे माता-पिता के पूजनोपरांत उनकी ही परिक्रमा कर ली और इस प्रकार पृथ्वी की परिक्रमा का कार्य पूरा मान लिया। उनका यह कार्य शास्त्रसम्मत था। पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर जब तक कार्तिकेय लौटे तब तक गणेश जी का विवाह हो चुका था और उनके दो पुत्र भी हो चुके थे। अत: कार्तिकेय रुष्ट होकर क्रौंच पर्वत पर चले गए। वात्सल्य से व्याकुल माता पार्वती कार्तिकेय जी को मनाने चल पड़ीं। बाद में भगवान शिव भी यहां पहुंच कर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। चूंकि शिवजी की पूजा यहां सबसे पहले मल्लिका पुष्पों से की गई, इसीलिए उनका नाम मल्लिकार्जुन पड़ा और माता पार्वती ने यहां शिवजी की पूजा एक भ्रमर के रूप में की थी, इसीलिए यहां उनके स्थापित रूप का नाम भ्रमरांबा पड़ा। मान्यता यह भी है कि भगवान शिव के वाहन नंदी ने स्वयं यहां तप किया था और शिव-पार्वती ने यहां उन्हें मल्लिकार्जुन और भ्रमरांबा के रूप में दर्शन दिए थे।
मंदिर के पीछे का हिस्सा 

है अतिशय प्राचीन

दूसरी तरफ़, पुराविज्ञानियों का विश्लेषण यह है कि इस परिसर में प्राचीनतम अस्तित्व वृद्ध मल्लिकार्जुन शिवलिंग है, जो संभवत: अर्जुनवृक्ष का जीवाश्म है। उनका अनुमान है कि यह 70-80 हज़ार साल पुराना है। शायद इसीलिए इसे वृद्ध मल्लिकार्जुन कहते हैं। मंदिर में प्रवेश से पूर्व एक मंडप है। इसके बाद चारों तरफ़ ऊंचे मंडप हैं। यह स्थापत्य की विजयनगर शैली है। वस्तुत: वर्तमान रूप में इसका निर्माण विजयनगर के सम्राट हरिहर राय ने कराया था। इनके अलावा कोंडावेडू राजवंश के रेड्डीराजाओं ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान किया था। इसके उत्तरी गोपुरम का निर्माण छत्रपति शिवाजी ने कराया है। हालांकि यहां इस मंदिर के अस्तित्व के प्रमाण दूसरी शताब्दी ईस्वी से ही उपलब्ध हैं। चारों तरफ़ से छह मीटर ऊंची क़िले जैसी दीवार से घिरे इस परिसर में कई अन्य हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर हैं। इनमें सहस्रलिंग और नटराज प्रमुख हैं। भ्रमरांबा शक्तिपीठ के निकट ही लोपामुद्रा की एक प्रतिमा भी है। महर्षि अगस्त्य की धर्मपत्नी लोपामुद्रा प्राचीन भारत की विदुषी दार्शनिकों में गिनी जाती हैं। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने श्री मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शनोपरांत ही शिवानंदलहरी की रचना की थी। मंदिर की चहारदीवारी पर जगह-जगह रामायण और महाभारत की कथाएं उत्कीर्ण हैं। कहीं तेलुगु, कहीं संस्कृत और कहीं चित्रों की भाषा में भी। निकासद्वार पीछे से है। नारियल के पेड़ों की छाया में दीवारों पर खुदी इन कथाओं को पढ़ते-देखते निकलना एक अलग ही तरह का सुखद एहसास देता है।

Comments

Popular posts from this blog

गढ़ तो चित्तौडग़ढ़...

Bhairo Baba :Azamgarh ke

Azamgarh : History, Culture and People

Most Read Posts

Bhairo Baba :Azamgarh ke

Maihar Yatra

Azamgarh : History, Culture and People

सीन बाई सीन देखिये फिल्म राब्स ..बिना पर्दे का

रामेश्वरम में

ये क्या क्रिकेट-क्रिकेट लगा रखा है?

गन्ने के खेत में रजाई लेकर जाती पारो

गढ़ तो चित्तौडग़ढ़...

चित्रकूट की ओर

चित्रकूट में शेष दिन