Aachar ka Yuddh

आचार का युद्ध   (दूसरी किश्त )
                  -हरिशंकर  राढ़ी 

 भ्रष्टाचार  से लड़ने का एक हथियार ढूँढ़ निकाला गया है। यह इस युद्ध की अब तक की सबसे बड़ी सफलता है। सभी जानते हैं कि आधुनिक युद्ध शारीरिक या मानसिक बल से नहीं लड़े जाते। नए युद्ध पूरी तरह हथियारों पर निर्भर हैं। इसीलिए दुनिया के सारे देश  हथियारों की साधना में लगे हैं। पड़ोसी तो हथियारों के दम पर कई युद्ध लड़कर और हारकर भी हथियारों की बटोर में लगे हैं। कलेजा भले ही बकरी का हो पर तलवार तो राणा प्रताप की ही चाहिए। बाजरे की रोटी का ठिकाना भले न हो, पर कर्ज लेकर परमाणु अस्त्र तक बनाएंगे। ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में हथियार का निश्चित  हो जाना कोई कम बात नहीं है। मजे की बात यह है कि दोनों ही दलों ने एक ही प्रकार के हथियार का चयन किया है। वह महत्त्वपूर्ण हथियार है कानून। सबसे बड़ी बात है कि कानून के हाथ बड़े लम्बे होते हैं, ऐसा यहाँ अज्ञातकाल से माना जाता है। पहले भगवान के हाथ लम्बे होते थे, बाद में कानून के होने लगे। हाथ लम्बे होने का फायदा यह होता है कि आप नजदीक गए बिना यानी दूर से ही दुश्मन  पर वार कर सकते हैं; खतरा कम होता है।

 बहरहाल, विरोधी दलों की जबरदश्त  खींचतान में यह निश्चित  हो गया है कि हथियार के रूप में कानून का ही इस्तेमाल किया जाएगा। दोनों सेनाएं युद्ध भ्रष्टाचार के विरुद्ध करेंगी, लेकिन वार करेंगी एक दूसरे पर। दोनों सेनाओं में कोई बराबरी नहीं है। एक सेना में संख्याबल ज्यादा है तो दूसरी में छलबल। छलबल वाली सेना रथ पर सवार है जबकि संख्याबल वाली सेना पैदल है। रथ पर सवार सैनिक कम भले हों, पर वे भ्रष्टाचार दल के महारथी हैं। उनकी प्रतिभा एवं हस्तकौशल  का कोई जवाब नहीं। हाथ तो हाथ, उनकी जिह्वा से भी तीर छूटते हैं। वे एक साथ कई तीर चला सकते हैं और निशाचरी युद्ध में निष्णात  हैं। अभी कुछ दिनों पहले उन्होंने इस बात को सिद्ध भी कर दिया था जब आधी रात को भ्रष्टाचार विरोधी एक योगी को एक ही बाण से राजधानी से काफी दूर पर्वतराज हिमालय की उपत्यकाओं में फेंक दिया था। हमारे यहाँ योगियों के लिए हिमालय को संरक्षित क्षेत्र घोषित  किया गया है। उचित व्यवस्था है। जब राजागण योग के मामले में दखल नहीं देते तो योगीजन राज्य के मामले में दखल क्यों दें?
 
भ्रष्टाचार के महारथी भ्रष्टाचार विरोधी सैनिको के गणवेश  में युद्धक्षेत्र में शंख  फूँक चुके हैं। जनता-जनार्दन एक तलवार लेकर आई है। वह चाहती है कि उसकी तलवार से लड़ाई लड़ी जाए। यह तलवार न तो पूजित है और न विशेष  मंत्रों से अभिसिंचित। इसमें गुण इतना ही है कि यह फौलाद की बनी है और इसे चलाना आसान है। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए वे जो तलवार ले आए हैं, वह जनता की तलवार से बढि़या है। इसे मान लेना चाहिए। जब उनका खाना-पीना, कपड़ा-लत्ता, रहन-सहन, धन-दौलत और वेतन-भत्ता जनता से बढि़या है तो तलवार तो बढि़या होगी ही। इसी तलवार से वे न जाने कितने युद्ध लड़ चुके हैं और कोई बाल तक बाँका नहीं कर सका है। ये तलवार चमत्कारी है जो सदैव दूसरों की ही गर्दन काटती है और अपने मालिक की बचा देती है। उन्होंने  एक नई तलवार बनाने की सोची है जो दुश्मन  पर कम और हमलावर पर ज्यादा वार करेगी। इधर जनता ज्यादा हमलावर बनने लगी है, कानूनी हथियार चाहिए उसे। इसलिए उन्होंने एक विशिष्ट  तांत्रिक अनुष्ठान  करवाकर यह तलवार बनवाई है। यह तलवार युद्ध में किसी के द्वारा भी चलाई जाए पर रक्षा करेगी अपने निर्माता की। ले जाओ इस तलवार को; पता चलेगा कि मियाँ की जूती, मियाँ का सिर किसे कहते हैं।
 
 इधर एक समझौता हो गया है कि जनता अपनी तलवार जमा करा दे। उसकी जांच की जाएगी। एकाध व्यक्तिगत तलवारें भी जमा हैं। हथियार विशेषज्ञ सबकी जांच करेंगे। यदि जनता की तलवार में कोई एकाध हिस्सा अच्छा पाया गया तो उसका प्रयोग महारथियों की तलवार में कर लिया जाएगा और भ्रष्टाचार को मार गिराया जाएगा। इतिहासकारों का मानना है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध युगों-युगों से लड़ा जा रहा है। यह बड़ा मायावी है और इससे कोई जीत नहीं सका है। यह परकाया प्रवेश  में माहिर है और प्रभावशाली  एवं उच्च पदासीन लोगों की काया में प्रवेश  कर जाता है। जिसकी काया में प्रवेश करता है वह धन्य हो जाता है और चाहता है वह काया में ही में ही बना रहे। उसके शरीरस्थ  रहने से जीवन धन्य हो जाता है। अब आत्मा की भाँति शरीर में बैठे भ्रष्टाचार का पता लगा पाना या उसका समूल नाश  कर पाना संभव है क्या?


 इसीलिए महत्त्वपूर्ण और पहुँचे हुए लोगों का यह मत समर्थन योग्य है कि यह लड़ाई बन्द कर देनी चाहिए। कोशिश भी की जा रही है कि अर्जुन को किसी तरह बन्धु-बान्धवों के बीच लाकर खड़ा कर दिया जाए और वह अपने कुल के विनाश  का भावी दृश्य  देखकर पुनः मोहग्रस्त हो जाए। युद्ध को टालने का यही एक उपाय है। आखिर समय और संसाधन यों ही व्यर्थ करने का क्या लाभ?


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