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...ये भी कोई तरीका है!

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  इष्टदेव सांकृत्यायन ऐसा लग रहा है जैसे अभी कल की ही तो बात है और आज एकदम से सन्न कर देने वाली यह सूचना मिली - मनोज जी ( प्रो. मनोज कुमार सिंह ) नहीं रहे। दस पंद्रह दिन पहले उनसे बात हुई थी। तब वह बिलकुल स्वस्थ और सामान्य लग रहे थे। हमारी बातचीत कभी भी एक घंटे से कम की नहीं होती थी। फोन पर बात करते हुए पता ही नहीं चलता था कि बात कितनी लंबी खिंच गई। अभी जब 21 को बात हुई तब पेंटिंग के अलावा कुछ कविताओं पर बात हुई। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि देश-विदेश में चित्रकला , और उसमें भी खासकर भित्तिचित्र ( murals) विधा के लिए जाने जाने वाले डॉ. मनोज कविताएं भी लिखते थे। अभी वे एक ऐसा संग्रह लाना चाहते थे जिसमें कविताओं के साथ चित्र हों। लेकिन अब कौन लाएगा। यह तो केवल वही कर सकते थे। वे ऐसा ही मेरा भी एक संग्रह देखना चाहते थे। मेरे एक संग्रह के लिए उन्होंने कवर का चित्र बनाया भी। लेकिन न तो वह संग्रह आ पाया और न चित्र। नहीं , उसमें हमारी ओर से कोई ढिलाई नहीं थी। दोनों भाइयों ने अपना-अपना काम बड़ी शिद्दत से किया था लेकिन प्रकाशक तो प्रकाशक ही होता है। हिंदी में जिसने प्रकाशक को जान लिया , वह ब्

प्रेम नाम होता बंधु!

सागर तोमर नहीं सभी की क़िस्मत में   है प्रेम लिखा होता बंधु   हर एक आदमी तो अपना   यूँ चैन नहीं खोता बंधु।   जो चले दर्प को आग लगा   पार वही पा जाता है   प्रेम-द्वार सबके हेतु   नहीं खुला होता बंधु।   रहे एक आसक्ति इसमें   कहीं विरक्ति भी लेकिन   यही तो इसकी रंगत है   जो ' प्रेम ' नाम होता बंधु !  कभी तो मिलना , कहीं बिछड़ना   इसके धंधे हैं अजीब   इसी मिलन-बिछड़न में जीवन   शहर-गाम होता बंधु।   प्रेम-लगन का हासिल क्या  ?  कुछ रातों के जगराते   लेकिन इक उपलब्धि जैसे   चार धाम होता बंधु।   हर कण इसका है अनमोल   कोई ख़रीद नहीं सकता   फिर भी दुनिया के बाज़ार   एक दाम होता बंधु।   इसे चाहिए पूर समर्पण   हर पल इसको दे दो बस   इसका एक तगादा अपना   आठ याम होता बंधु।   सब गतियों की एक गति   सब रस्तों का एक धाम   एक संचरण इसका हर पल   दखन-वाम होता बंधु।   हो कोई ' सागर ' या ' कमल '  डुबना-खिलना सब इसमें ही   तरना-मुरझाना एक तमाशा   सुबह-शाम होता बंधु !   

झरने की हर झरती झलकी!

गोपाल बघेल मधु झरने की हर झरती झलकी , पुलकी ललकी चहकी किलकी ; थिरकी महकी कबहुक छलकी , क्षणिका की कूक सुनी कुहकी!   कब रुक पायी कब देख सकी , रुख़ दुख सुख अपना भाँप सकी ; बहती आई दरिया धायी , बन दृश्य विवश धरिणी भायी!   कब पात्र बनी किसकी करनी , झकझोर बहाया कौन किया ; कारण था कौन क्रिया किसकी , सरका चुपके मग कौन दिया!   प्रतिपादन आयोजन किसका ,  क्या सूत्रधार स्वर सूक्ष्म दिया ; हर घट बैठा घूँघट झाँका ,  चौखट टक टक देखा बाँका!   चैतन्य चकोरी किलकारी ,  कैवल्य ललित लय सुर धारी ; क्या बैठा था हर ‘ मधु ’ पलकी , क्या वही नचाया दे ठुमकी!  

बाज़ार

मुमताज़ अज़ीज़ ना ज़ाँ यहाँ हर चीज़ बिकती है कहो क्या क्या ख़रीदोगे यहाँ   पर मंसब-ओ-मेराज की   बिकती हैं ज़ंजीरें अना को काट देती हैं   ग़ुरूर-ओ-ज़र की शमशीरें यहाँ   बिकता है तख़्त-ओ-ताज बिकता है   मुक़द्दर भी ये वो बाज़ार है बिक जाते हैं इस में सिकंदर भी यहाँ बिकती है ख़ामोशी भी ,  लफ़्फ़ाज़ी भी बिकती है ज़मीर-ए-बेनवा की हाँ   अना साज़ी भी बिकती है दुकानें हैं सजी देखो यहाँ पर हिर्स-ओ-हसरत की हर इक शै मिलती है हर क़िस्म की ,  हर एक क़ीमत की यहाँ ऐज़ाज़ बिकता है ,  यहाँ हर राज़ बिकता है यहाँ पर हुस्न बिकता है ,  अदा-ओ-नाज़ बिकता है सुख़न बिकता है ,  बिक जाती है शायर की ज़रुरत भी यहाँ बिकती है फ़नकारी ,  यहाँ बिकती है शोहरत भी यहाँ पर ख़ून-ए-नाहक़ बिकता है ,  बिकती हैं लाशें भी यहाँ बिकती हैं तन मन पर पड़ी ताज़ा खराशें भी यहाँ नीलाम हो जाती है बेवाओं की मजबूरी यहाँ बीनाई बिकती है ,  यहाँ बिकती है माज़ूरी लहू बिकता है ,  बिकते हैं यहाँ अ ’ अज़ा-ए-इंसानी यहाँ   बिकते हैं दो दो पैसों में जज़्बात-ए-निस्वानी मोहब्बत ,  जज्बा-ओ-हसरत ,  सभी नीलाम होते हैं इनायत ,  उन्स ,  और रग़बत ,  सभी नीलाम होते हैं अगर बिकता नही

क़ौल से बनी कव्वाली

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पं. विजयशंकर मिश्र कव्वाली संगीत की एक ऐसी विधा है जो लोकप्रिय तो बहुत है , लेकिन संगीत समाज में बहुत अधिक प्रतिष्ठित नहीं। कव्वाली शब्द की व्युत्पत्ति क़ौल शब्द से हुई है- जिसका अर्थ है- वचन। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि ईश्वर के वचनों का गायन , उनका गुणगान , उनकी प्रशंसा और स्तुति ही कव्वाली है। लेकिन , यह ईश्वर किसी भी मजहब का , किसी भी संप्रदाय का हो सकता है। यहां यह लिखना ग़लत नहीं होगा कि शुरु-शुरु में कव्वालियां सिर्फ मुस्लिम धर्म के पीरों , पैगंबरों और धर्मगुरुओं के लिए ही लिखी और गाई गईं। एक बहुत बड़े वर्ग का यह मानना है कि हिंदू धर्म की सामूहिक कीर्तन परंपरा से प्रभावित होकर हजरत अमीर खुसरो ने तेरहवीं-चैदहवीं शताब्दी में कव्वाली की शुरुआत की। शुरू-शुरू में कव्वाली और खयाल गायन की रचनाओं और गायन शैलियों में बहुत समानताएँ थीं। अंतर सिर्फ इतना था कि खयाल को एकल या युगल रुप में गाया जाता है। हालांकि , गायन तो कव्वाली का भी एकल या युगल रूप में ही होता है , किंतु कव्वाली गायन में- कुछ लोग मुख्य गायक के पीछे बैठते हैं , टेक को दोहराने के लिए। वे मुख्य गायक की गाई हुई पंक्तियों को बा

देश को जोड़ने का काम करता है कम्युनिटी रेडियो : प्रो. द्विवेदी

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अंकुर विजयवर्गीय नई दिल्ली। '' भारत में 290 कम्युनिटी रेडियो स्टेशन हैं , जिनकी पहुंच देश की लगभग 9 करोड़ आबादी तक है। ये रेडियो स्टेशन समुदायों द्वारा उनकी स्थानीय भाषा एवं बोली में चलाए जाते हैं। इस तरह भारतीय भाषाओं के माध्यम से कम्युनिटी रेडियो देश को जोड़ने का काम करता है। '' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने सोमवार को सरदार वल्लभभाई पटेल की 145वीं जयंती प्रसंग के मौके पर , ' कम्युनिटी रेडियो-सबका साथ सबका विकास ' विषय पर आयोजित वेबिनार में व्यक्त किए।   कार्यक्रम में वन वर्ल्ड फाउंडेशन के प्रबंध निदेशक श्री राजीव टिक्कू , रेडियो अल्फ़ाज़-ए-मेवात की प्रमुख श्रीमती पूजा ओबेरॉय मुरादा , कम्युनिटी मीडिया कंसल्टेंट डॉ. डी. रुक्मिणी वेमराजू एवं रेडियो बनस्थली राजस्थान के स्टेशन मैनेजर श्री लोकेश शर्मा भी वक्ता के तौर पर शामिल हुए। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि सामुदायिक रेडियो स्टेशन लोगों से उनकी भाषा में संचार करते हैं , जिससे न सिर्फ भाषा के बचाव में योगदान होता है , बल्कि अगली पीढ़ी तक उसका विस्तार भी होता है। एक

विद्रूप स्थिति और आंतरिक खोखलापन

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भूपेंद्र सिंह   बंद गली का आखिरी मकान अभी अभी पढ़ डाली। प्रिय शिव कुमार जी बहुत डूबकर उसका जिक्र करते हैं , सो खोज कर पढ़ना ही था। शानदार अंतर्संघर्ष और संबंधों के उलझे ताने-बाने , समाज की विद्रूपता भरी स्थिति और मूल्यों का आंतरिक खोखलापन। भारती जी का रचनाकार अपनी पूरी ताकत से उभरता है घटनाओं के बीच से। लगता है पलंग पर कोई और नहीं मुंशी जी के रूप में स्वयं भारती जी ही लेटे हों।  मछली रेत की पढ़ी कांता भारती की कल ही। शिव ही दिल्ली से लाए खास तौर पर मेरे लिए और तमाम कीमती किताबों के साथ। उस घटनाक्रम से इस कहानी का खूबसूरत तालमेल बैठा है। वही तनाव , दोहराव वाला जीवन जीने से पैदा , वही सामाजिक दबाव , वही कूट रचनाएं , गो कि निजी जीवन में भारती और पुष्पा जी खुद रहीं तनावकारक की भूमिका में। यहां समाज , मामा और बिटानू। निम्न वर्ग की सीमितताओं से जूझता आदमी कितना टूटता है , कितना छीजता है। पल पल यह मुंशी जी का चरित्र साफ दिखाता है। राधे के लिए उमड़ती ममता और स्नेह का ज्वार उसे सब कुछ दे डालना चाहता है पर प्यार हरिया से भी कम नहीं। जो समाज नन्हे बच्चों की परवरिश न कर पाया वह नौकरी मिलते ही उनके मह

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