Tuesday, 15 September 2020

आहार, आय, आजीविका और आवागमन की भाषा है हिन्दी

इक्कीसवीं सदी में हिन्दी आहार, आय, आजीविका और आवागमन की भाषा के रूप में समूचे विश्व में इस्तेमाल में लाई जा रही है, जिससे हिन्दी सम्बन्ध, सम्पर्क, संवाद और सहचार के सर्वाधिक सशक्त माध्यम के तौर पर दुनिया भर में शान से अपनी विजय पताका लहरा रही है। नई शिक्षा नीति में भाषा को सुदृढ़ बनाने हेतु अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं जिनसे हिन्दी का सर्वांगीण विकास और प्रचार - प्रसार सम्भव हो सकेगा। 

ये उद्गार मुख्य अतिथि इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक के कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश के सहयोग से हिन्दी दिवस के अवसर पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि नई शिक्षा नीति 2020 में हिन्दी को शिक्षण की भाषा के रूप में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और  इसे रोज़गार से जोड़ने का प्रयास किया गया है। सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिग्री पाठ्यक्रमों तथा एक संकाय या विषय से दूसरे में जाने की सुविधा देकर विद्यार्थियों को अपनी अभिरुचि के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था से भी वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने की दिशा में देश अग्रसर होगा। त्रिभाषा सूत्र को इसमें स्थान देकर संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं पर भी बल दिया गया है, जो भारतीयता की जड़ों को मजबूत करेगा। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जेवी वैशंपायन ने नई शिक्षा नीति के विविध पक्षों की विशद चर्चा करते हुए हिन्दी भाषियों का आह्वान किया कि वे अधिक से अधिक भारतीय भाषाओं को सीखकर हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के मध्य सौहार्द्र एवं हिन्दी के प्रचार  प्रसार में सहयोग करें। उन्होंने आगे कहा कि हिन्दी भाषा तथा बोलियों की नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत महत्त्वपूर्ण भूमिका स्वीकार की गई है, जो मातृ भाषा में ज्ञान दिए जाने से विकसित होने वाली मौलिक सोच और नवोन्मेषी दृष्टि को विकसित करने का कार्य करेगी।

विशिष्ट अतिथि विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के हिन्दी विभाग के आचार्य एवं कुलानुशासक प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने नई शिक्षा नीति में विद्यार्थी के भारतीय संस्कृति और भारतीयता से जुड़ने की विस्तृत चर्चा की और बताया कि हिन्दी त्रिभाषा सूत्र के रूप में सर्वाधिक व्यवहृत होकर देश की शिक्षा व्यवस्था में अपनी चिर प्रतीक्षित जगह हासिल करेगी और देश में हिन्दी का सर्वांगीण विकास सम्भव हो सकेगा।

इससे पहले कार्यक्रम संयोजक एवं हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ पुनीत बिसारिया ने देश - विदेश से जुडे़ 500 से अधिक हिन्दी प्रेमियों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों का स्वागत करते हुए हिन्दी विभाग की उपलब्धियों के विषय में बताया। इस अवसर पर हिन्दी विभाग में उपलब्ध सुविधाओं से सम्बन्धित एक वीडियो पत्रिका का विमोचन किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ अचला पांडेय ने किया तथा विभाग के सह आचार्य डॉ. मुन्ना तिवारी ने सभी के प्रति आभार जताया। इस अवसर पर डॉ श्रीहरि त्रिपाठी, डॉ नवीन चंद पटेल, डॉ काव्या दुबे, डॉ मृत्युंजय श्रीवास्तव, डॉ श्वेता पांडेयडॉ षीबा शरथ, डॉ राकेश पाण्डेय, डॉ सत्यप्रकाश मणि त्रिपाठी, पीयूष भारद्वाज, डॉ ऋषि सक्सेना, डॉ गुंजन त्रिपाठी, डॉ राकेश नारायण द्विवेदी, डॉ दमयंती तिवारी, डॉ सुनीता त्रिपाठी, डॉ अजय ओझा, डॉ ऊषा मिश्रा, डॉ ऊषा पाठक, शिवाजी सिंह, शुचि मिश्रा, प्रीति सिंह, ममता तिवारी, पुनीत तिवारी, अंजनी उपाध्याय, मंजू पटेल, शाश्वत सिंह, मनीष मण्डल समेत देश विदेश के अनेक हिन्दी प्रेमी उपस्थित थे।


Monday, 14 September 2020

IAF STRIKES @ 0328 hours: A Clear picture of air strike

Vinay Kumar 

New Delhi: More than a year has passed since Indian Air Force (IAF) carried out Balakot air strikes across the border in Pak occupied Kashmir (PoK) on February 26, the first such strike across the border in nearly 50 years. Air strikes to dismantle terrorist camps in Balakot evoked a keen interest not only among the people but also showcased India’s air power and the capability of IAF.

Reports in print and electronic media in the country came up with their accounts of the air strike on the basis of whatever was put out by the government at that time. Two senior defence journalists Mukesh Kaushik and Sanjay Singh have put together graphic and authentic account of Balakot air strike of February 26, 2019 which were taken up in the wake of Pulwama terror attack by Pak-supported terror outfits on CRPF convoy in which 40 para-military personnel lost their lives.

The author duo came up with ``IAF Strikes @0328 hours’’ which has a foreword penned by Air Marshal (Retd) Hari Kumar Chandrashekharan who successfully carried out the operation as the Air Officer Commanding-in-Chief of Western Air Command. Incidentally, he retired on February 28 last year just couple of days after the daring air strike.

The air strikes were carried out deep inside Pakistani territory at Jaish’s terror camp, changing the politico-strategic scenario at that time. Air Marshal’s account of the planning and implementation of the operation not only brings out facets hitherto unwritten but is also attention gripping.

On the eve of February 25 which happened to be Air Marshal Harikumar’s birthday, the IAF had organized his retirement-cum-birthday party at Akash Officers Mess near India Gate. He recalls that there was a strange wave of nationalism, suspense and adventure flowing through his body.

"The mission’s blueprint was set. You can imagine the circumstances of a man responsible for mission of that scale. My sole focus was on our targets that lay hidden in the dead of night," he recalled. Though laughter and hubbub echoes in the mess, he and the Air Chief strolled in the law outside, enjoying the pleasant weather and discussed the final preparations.

Air Marshal Harikumar was in control of the mission and reported the progress at the control room to the Air Chief who reported to the National Security Advisor who in turn kept the Prime Minister updated.

If the walls of privacy enveloped him that evening, he knew that he had to display only happiness during the party and as if it was not enough some of his friends showed up with cake at midnight at his residence. Silence from his end would create curiosity, he drove back home, met his friends, cut the cake and went back to the control room.

Young as well as experienced pilots flew 18 Mirage-2000s, twelve of these were in attack formation and the remaining six were weaponised with MISA missiles. These fighter jets took off from Gwalior in the dead of night and were to be refueled mid-air over Bareilly. Care was taken not to arouse any curiosity at ATC, Delhi. There were some key factors taken up for consideration while deciding upon the time of the air strikes, one of them was to avoid the 0400 hours Salaat-Al-Fajr prayer, second was the lunar cycle as the moon was at a favourable 30 degree angle from the horizon and the third reason was western disturbance. Air Marshal had to inform the Air chief with their pre-decided code word ``Bandar’’ (Monkey) only upon success of the mission.

The author duo spoke to a large number of their defence sector friends to help them draw a clear picture of the events that took place during that time. The 170-page volume has interesting details on why Balakot was chosen, how the Prime Minister monitored the progress and stayed up the whole night, why Mirage-2000s were chosen for the mission and the strategic vision behind air strikes.

The duo has also added a chapter on India’s quest for an indigenous Light Combat Aircraft (LCA) and how Tejas project was conceived and the progress so far which is unrelated to Balakot air strikes. Overall, the book manages to keep the attention of the reader throughout in a simple and unassuming way and comes up with a credible and authentic account of the air strikes of February 26, 2019.


BOOK REVIEW

IAF STRIKES@0328 hours

Writers: Sanjay Singh and Mukesh Kaushik

Publisher: Prabhat Paperbacks

Pages: 168

Price: Rs. 250 

 


Tuesday, 8 September 2020

ममता का अपना ही सर्वे कह रहा - अलविदा दीदी

 अवनीश पी.एन. शर्मा

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने राजनीतिक कंसल्टेंट प्रशांत किशोर की कंपनी इंडियन पोलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) को राज्य में राजनीतिक सर्वे का काम सौंपा था। इस साल मार्च से जुलाई तक 6 महीने तक किए गए इस सर्वे के अनुसार ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार के प्रति राज्य के मतदाताओं में भीषण नाराजगी है। तृणमूल के एमएलए उच्चतम स्तर की एंटी-इनकंबेंसी झेल रहे हैं और सर्वे साफ कहता है कि ऐसे में पश्चिम बंगाल में तृणमूल सरकार बना पाने की स्थिति नहीं रहेगी। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव अगले साल अप्रैल-मई के बीच होने हैं। 

प्रशान्त किशोर की कंपनी ने पूरे राज्य की सभी 294 विधानसभा सीटों पर तीन स्तरीय यानी तीन बार यह जमीनी आकलन किया। पहला सर्वेक्षण इसी साल मार्च में कोरोना के चलते हुए पहले लाकडाउन के ठीक पहले किया गया। दूसरा सर्वे जून के महीने में तो अंतिम सर्वे अगस्त के तीसरे हफ्ते में किया गया।

जमीनी रिपोर्ट्स कहते हैं कि जो तृणमूल मार्च के पहले सर्वे में विधानसभा की 110 सीटों पर अच्छा कर रही थी, वह अब तीसरे दौर के आकलन में मात्र 78 सीटों पर बेहतर कर पाने की स्थिति में है। यहां ध्यान रहे साल 2016 के राज्य विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी की तृणमूल ने 211 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

आई-पीएसी अपने अगस्त के सर्वे के बाद अपने जमीनी आकलन में आगे कहता है कि 100 ऐसी सीटें हैं जो तृणमूल के लिए कठिनतम हैं तो बाकी 116 सीटों पर ममता की पार्टी के लिए कड़ा संघर्ष है और वहां तृणमूल के लिए जीत की संभावना का स्तर 50:50 यानी आधा-आधा ही है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में आधी संख्या 148 सीटों की बैठती है।

मार्च में किए गए पहले सर्वे में प्रशान्त किशोर की टीम ने पाया था कि तृणमूल 110 सीटों पर ठीक कर रही है, 50 सीटों पर साफ-साफ हार रही है जबकि 134 सीटों पर कड़ी लड़ाई है।

जून के दूसरे जमीनी सर्वेक्षण में बताया गया कि तृणमूल के लिए ठीक प्रदर्शन करने वाली सीटें 110 से घट कर 92 हो गईं। हारने वाली सीटों की संख्या 50 से बढ़ कर 75 पहुंची तो कड़ी लड़ाई वाली सीटों की संख्या 134 से घट कर 127 हुई।

हालांकि आधिकारिक तौर पर प्रशांत और उनकी कंपनी ऐसे किसी सर्वे और उसके ऐसे किसी परिणाम से इनकार कर रही है लेकिन भरे लाकडाउन के दौरान प्रशांत का बंगाल की छुप-छुपा कर हवाई यात्रा करना यह साफ संकेत देता है कि प्रशांत की टीम बंगाल में अपने किसी बेहद जरूरी मिशन में लगी हुई है।

इस जमीनी सत्य से परिचित होने के बाद प्रशांत की सलाह पर ममता बनर्जी ने उनकी कंपनी को 100 से अधिक कठिनतम सीटों "सुपर 100" टीम को काम पर लगाया है जिसमें प्रति सीट 100 पीआर से लेकर अन्य पेशेवर कर्मचारी तैनात रहेंगे।

पश्चिम बंगाल में 32 सालों से सत्ता में काबिज वामपंथी सरकार को बाहर करने के बाद 2011 में पहली बार सत्ता में आई 2016 के चुनावों में वापसी करते हुए ममता अब तीसरे चुनाव का सामना करते समय भीषण एंटी-इनकंबेंसी झेल रही हैं।

इसी के साथ मुस्लिम तुष्टीकरण की उनकी राजनीति ने लगातार प्रदेश के मतदाताओं के बीच गहरी नाराजगी पैदा की है। तीन दशक से ऊपर राज्य में अराजक वामपंथी सरकार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर मताधिकार के स्वतंत्र उपयोग से वंचित रही बंगाल की जनता चुप रहते हुए दर्द सहने की आदती सी हो चली थी। 2011 में उससे मुक्ति के नाम पर ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल के रूप में एक बार फिर वही अराजक वामपंथी मॉडल का क्लोन यानी दुहराव ही मिला। 2016 में बंगाल में ममता की सत्ता में वापसी वामपंथी शैली में उसी के अराजक कैडर को ठीके पर तृणमूल द्वारा अपने लिए इस्तेमाल के जरिये संभव हुई।

लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद 2019 में उसके दुहराव ने देश भर में मतदाता के स्तर पर एक क्रांतिकारी परिवर्तन की स्थापना की है। लोकतंत्र का मालिक मतदाता अब अपने मताधिकार का प्रयोग आजादी के साथ कर रहा है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं ने लोकसभा से लेकर विधानसभा के चुनावों को अलग-अलग चरणों में कराने की व्यवस्था कर इस पूरी प्रक्रिया को ज्यादा सुरक्षित, आजाद और सुविधाजनक बना रही हैं। ऐसे में पश्चिम बंगाल में तृणमूल की वामपंथी शैली आधारित अराजकता अब मतदाता को पहले जैसे डरने पर मजबूर न कर सकेगी।

रही बात इसी पश्चिम बंगाल में 32 सालों तक सत्ता में कायम रहे वामपंथियों की.. तो उसके जमीनी अराजक कैडर अब ममता बनर्जी के पेरोल पर पलने-खाने के सांचे में ढल चुके हैं और आज बंगाल में इन्हें पूछने वाला कोई नहीं इसलिए ये चर्चा से ही बाहर रहने के योग्य हो कर रह गए हैं।

इसी के साथ कोरोनाकाल में ममता सरकार के बदतर प्रबंध और बंगाल में आई प्राकृतिक आपदा (साइक्लोन अम्फन) के दौरान भ्रष्टाचार ने तृणमूल के विधायकों और पूरी सरकार की बेहद नकारात्मक छवि बनाने का काम किया जिसके नतीजे जमीनी सर्वेक्षण में दिख रहे हैं।

इस सबके साथ जिस तरह पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने 2019 लोकसभा चुनावों में तृणमूल को झटका देते हुए कुल 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटों पर भाजपा की जीत दर्ज कराई, उसने साफ संकेत दे दिया है। आगे जिस तरह भाजपा विधानसभा में खुद को विकल्प के तौर पर प्रस्तुत कर रही है उसने राज्य के मतदाताओं के सामने एक साफ-साफ विकल्प दे दिया है और बंगाल का मतदाता अराजकों से बिना डरे ईवीएम पर मजबूती से बोलने के तेवर में है।

उसे भाजपा का साथ कैसे मिल रहा है, यह 2019 लोकसभा चुनाव में उसके नारे "उन्नीस में हाफ, इक्कीस में साफ" के आधा सत्य होने से दिख रहा है जिसके इक्कीस में पूर्ण होने के साफ संकेत खुद ममता बनर्जी, तृणमूल के कराए अपने जमीनी सर्वेक्षण से मिलते नजर आ रहे हैं।

बंगाल अपने भीतर पैदा कराए गए तमाम कीचड़ में अब कमल खिलाने की तरफ बढ़ता दिख रहा है।

#अवनीश पी. एन. शर्मा

 

 

 

Monday, 7 September 2020

जासूसी का चीनी रैकेट

India rejects as untenable Chinese claim on Ladakh's Galwan valley - india  news - Hindustan Times

इष्ट देव सांकृत्यायन 

देश के दुश्मनों की बात करें तो अभी तक आप केवल पाकिस्तान के नाम पर भरमाए जा रहे थे. 1962 के बाद भी आपके ही हुक्मरानों ने आपके सामने चीन का ऐसा हव्वा बना रखा था कि देश के भीतर मौजूद शल्य यानी देश के दुश्मन आपको चीन के नाम पर चिढ़ाते थे. भला हो डोकलाम और गलवान का जिसने आपको चीन की असली औकात बता दी.

हम आप यही मानते रह जाते कि चीनी पिस्सू हमारी जासूसी के मामले में टुच्चे अर्बन नक्सलों के भरोसे बैठे हुए हैं. शायद यह बात इन चिरकुटों को भी पता न हो कि चीन जैसे चिरकुट विश्वासघाती देश अपने बाप पर भी भरोसा करना नहीं जानते. उसने इनके पीछे भी न मालूम कितने जासूस लगा रखे हों. 

China demands India's withdrawal from Galwan Valley - The Hindu

ये बेचारे जो एक-एक बात पर बिलबिलाते हैं, उससे भी यही पता चलता है कि इन्हें बताया कुछ नहीं जाता, सिर्फ कोंचा जाता है. यह उस कोंचने का नतीजा है जो पप्पू सुप्रीम कोर्ट की लात खाने के बाद भी 'चौकीदार चोर' रेंकता रहता है और अर्बन नक्सल तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर फेसबुक -ट्विटर और व्हाट्सएप तक झूठ का बफर स्टॉक दौड़ाते रहते हैं.


अर्धसत्य इन चीकटों का सबसे बड़ा हथियार है. सोवियत संघ के दिनों से. रोने की हालत यह है कि अगर नदी पर पुल न बना हो तो ये रोएंगे कि जी देखिए तीन आदमी की आबादी वाले इस गाँव को कितनी परेशानी है. लोगों को सुबह पाँच उठकर आठ बजे निकल जाना पड़ता है. तब जाकर ये बेचारे 9 बजे स्कूल पहुँच पाते हैं. और अगर पुल बन जाए तो इस बात पर रोते फिरेंगे कि देख रहे हैं, ये क्या हो रहा है. मोदी जी की सरकार ने करोड़ों की लागत से अंबानी जैसे पूँजीपतियों के लिए पुल बनवा दिया. अब बताइए इन 3 नाविकों का क्या होगा जिनकी रोजी-रोटी का एकमात्र जरिया यही छोटी सी नाव है? जरा सोचिए, अब कौन इन्हें पूछेगा.


ख़ैर, अभी तक आपके सामने सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर पापिस्तान को खड़ा किया गया था और आपके मन में यह डर बैठाया गया था कि भारत कभी इस लायक होगा ही नहीं कि वह चीन से आँख मिला सके. सोचिए, ऐसा क्या केवल उस 90 लाख रुपये के लिए किया गया होगा जो राजीव गांधी फाउंडेशन के खाते में दर्ज पाए गए? और कितनी बड़ी रकम किन-किन मध्यमों से आई, कौन जानता है!


जान लीजिए, इन्हीं माध्यमों में एक हवाला भी है और हवाला रैकेट केवल खाड़ी देशों से नहीं चलता. चीन का अपना एक हवाला है और ये हवाला शेल कंपनियों के मार्फत चलता है. ऐसी ही किसी शेल कंपनी के हत्थे चढ़ा था अलीगढ़ का एक युवक राहुल. उसका सच क्या है, यह सामने आने में अभी समय लगेगा... लेकिन इन कंपनियों का सच जानने के लिए आपको जाननी होगी करीब बीस दिन पुरानी एक खबर.. जिसे शायद लोगों ने बहुत हल्के में लिया है. इतने हल्के में अखबार वालों ने उसकी फॉलो अप तक करने की जरूरत नहीं समझी.

Isht Deo Sankrityaayan


Saturday, 5 September 2020

पूर्णिमा का चाँद है गुरु

कृतघ्न मनुष्य के लिए माता-पिता, भाई-बहन, गुरु-शिष्य... या किसी भी संबंध का कोई अर्थ नहीं है. लेकिन यदि कृतज्ञ मनुष्य हो तो उसके लिए पूरा जीवन ही कम पड़ जाए. ऐसे ही संबंधों में एक है गुरु का. ऐसे हमारे जीवन में बहुत गुरु होते हैं और सबके प्रति कृतज्ञता भी होती है. लेकिन कोई-कोई होते हैं जिन्हें हम सद्गुरु कह पाते हैं. जो बहुत भाग्यशाली होते हैं, उनके ही जीवन में सद्गुरु का अविर्भाव होता है. फिर उस सद्गुरु के लिए हर दिन कम पड़ जाता है. पूरा जीवन ही कम लगने लगता है. गुरु को केवल शिक्षक के रूप में देखना और वह भी आज मैकालेवादी व्यवस्था के शिक्षक के रूप में देखना तो उसका भयावह अवमूल्यन है. यह वह व्यवस्था है जिसने हमें 'बलिहारी गुरु आपने' से लाकर 'गुरुघंटाल' पर औंधे मुँह गिरा दिया है. तो फिर इसके लिए उस बात का अर्थ भी नहीं है, जो यहाँ कही जा रही है. ठीक है कि अब हम सरकारी तौर पर शिक्षक दिवस मनाते हैं. मुझे इसे भी मना लेने में कोई हर्ज नहीं दिखता. लेकिन हमारे यहाँ गुरु पूर्णिमा है इसके लिए. यह क्यों है... इसका रहस्य ओशो के शब्दों में. 

इष्ट देव सांकृत्यायन 

 

प्रश्न : आषाढ़ पूर्णिमा को गुरूपूर्णिमा के रूप में मनाने का क्या राज है?

एक तो राह है जीवन को देखने की गणित की, और एक राह है जीवन को देखने की काव्य की। गणित की यात्रा विज्ञान पर पहुंचा देती है। और अगर काव्य की यात्रा पर कोई चलता ही चला जाए, तो परम काव्य परमात्मा पर पहुंच जाता है। लेकिन काव्य की भाषा को समझना थोड़ा दुरूह है, क्योंकि तुम्हारे जीवन की सारी भाषा गणित की भाषा है। तो गणित की भाषा से तो तुम परिचित हो, काव्य की भाषा से परिचित नहीं हो।

Osho ने कहा था, ध्यान का शास्त्र गहराई से बीमरियों को पकड़ता है – Legend  News

दो भूलों की संभावना है। पहली तो भूल यह है कि तुम काव्य की भाषा को केवल कविता समझ लो, एक कल्पना मात्र! तब तुमने पहली भूल की।

और दूसरी भूल यह है कि तुम कविता की भाषा को गणित की तरह सच समझ लो, तथ्य समझ लो, तब भी भूल हो गई। दोनों से जो बच सके, वह समझ पाएगा कि आषाढ़ पूर्णिमा का गुरुपूर्णिमा होने का क्या कारण है।

काव्य की भाषा तथ्यों के संबंध में नहीं है, रहस्यों के संबंध में है। जब कोई प्रेमी कहता है अपनी प्रेयसी से कि तेरा चेहरा चांद जैसा, तो कोई ऐसा अर्थ नहीं है कि चेहरा चांद जैसा है। फिर भी वक्तव्य व्यर्थ भी नहीं है। चांद जैसा तो चेहरा हो कैसे सकता है?

फिर ऐसे लोग हैं, जिन्होंने काव्य की भाषा को तथ्य की भाषा सिद्ध करने की चेष्टा की है। जैसे जीसस को कहा है ईसाइयों ने कि वे कुंआरी मां से पैदा हुए।

यह काव्य है। कुंआरी मां से कोई कभी पैदा नहीं होता। यह तथ्य नहीं है, यह इतिहास नहीं है, पर फिर भी बड़ा अर्थपूर्ण है, इतिहास से भी ज्यादा अर्थपूर्ण है। यह बात अगर इतिहास से भी घटती, तो दो कौड़ी की होती। इसमें जानने वालों ने कुछ कहने की कोशिश की है, जो साधारण भाषा में समाता नहीं।

उन्होंने यह कहा है कि जीसस जैसा व्यक्ति सिर्फ कुंआरी मां से ही पैदा हो सकता है। जीसस जैसी पवित्रता, कल्पना भी हम नहीं कर सकते कि कुंआरेपन के अतिरिक्त और कहा से पैदा होगी! इसे न तो सिद्ध करने की कोई जरूरत है, न असिद्ध करने की कोई जरूरत है। दोनों ही नासमझियां हैं। इसे समझने की जरूरत है। काव्य एक सहानुभूति चाहता है। ये सब काव्य हैं। इनको काव्य की तरह समझो, तब इनका माधुर्य अनूठा है; तब इसमें तुम डुबकियां लगाओ और बड़े हीरे तुम ले आओगे, बड़े मोती चुन लोगे।

लेकिन किनारे पर दो तरह के लोग बैठे हैं, वे डुबकी लगाते ही नहीं। एक सिद्ध करता रहता है कि यह बात तथ्य नहीं है, झूठ है। वह भी नासमझ है। दूसरा सिद्ध करता रहता है कि यह तथ्य है, झूठ नहीं है। वह भी नासमझ है। क्योंकि वे दोनों ही एक ही मुद्दे पर खड़े हैं। दोनों ही यह मान रहे हैं, उन दोनों की भूल एक ही है कि काव्य की भाषा तथ्य की भाषा है। दोनों की भूल एक है। वे विपरीत मालूम पड़ते हैं, विपरीत हैं नहीं।

सारा धर्म एक महाकाव्य है। अगर यह तुम्हें खयाल में आए, तो आषाढ़ की पूर्णमा बड़ी अर्थपूर्ण हो जाएगी। अन्यथा, एक तो आषाढ़, पूर्णिमा दिखाई भी न पड़ेगी। बादल घिरे होंगे, आकाश तो खुला न होगा, चांद की रोशनी पूरी तो पहुंचेगी नहीं। और प्यारी पूर्णिमाएं हैं, शरद पूर्णिमा है, उसको क्यों न चुन लिया? ज्यादा ठीक होता, ज्यादा मौजूं मालूम पड़ता।

नहीं; लेकिन चुनने वालों का कोई खयाल है, कोई इशारा है। वह यह है कि गुरु तो है पूर्णिमा जैसा और शिष्य है आषाढ़ जैसा। शरद पूर्णिमा का चांद तो सुंदर होता है, क्योंकि आकाश खाली है। वहा शिष्य है ही नहीं, गुरु अकेला है। आषाढ़ में सुंदर हो, तभी कुछ बात है, जहां गुरु बादलों जैसा घिरा हो शिष्यों से।

When Is the Next Full Moon? | 2020 Full Moon Dates and Names

शिष्‍य सब तरह के जन्‍मोंजन्‍मों के अंधेरे का लेकर आ गए। वे अंधेरे बादल हैं, आषाढ़ का मौसम हैं। उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी रोशनी पैदा कर सके, तो ही गुरु है। इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा! वह गुरु की तरफ भी इशारा है उसमें और शिष्य की तरफ भी इशारा है। और स्वभावत: दोनों का मिलन जहां हो, वहीं कोई सार्थकता है।

ध्यान रखना, अगर तुम्हें यह समझ में आ जाए काव्यप्रतीक, तो तुम आषाढ़ की तरह हो, अंधेरे बादल हो। न मालूम कितनी कामनाओं और वासनाओं का जल तुममें भरा है, और न मालूम कितने जन्मोंजन्मों के संस्कार लेकर तुम चल रहे हो, तुम बोझिल हो। तुम्हें तोड़ना है, तुम्हें चीरना है। तुम्हारे अंधेरे से घिरे हृदय में रोशनी पहुंचानी है। इसलिए पूर्णिमा!

चांद जब पूरा हो जाता है, तब उसकी एक शीतलता है। चांद को ही हमने गुरु के लिए चुना है। सूरज को चुन सकते थे, ज्यादा मौजुद होता, तथ्यगत होता। क्योंकि चांद के पास अपनी रोशनी नहीं है। इसे थोडा समझना।

चांद की सब रोशनी उधार है। सूरज के पास अपनी रोशनी है। चांद पर तो सूरज की रोशनी का प्रतिफलन होता है। जैसे कि तुम दीए को आईने के पास रख दो, तो आईने में से भी रोशनी आने लगती है। वह दीए की रोशनी का प्रतिफलन है, वापस लौटती रोशनी है। चांद तो केवल दर्पण का काम करता है, रोशनी सूरज की है।

हमने गुरू को सूरज ही कहा होता, तो बात ज्यादा तथ्यपूर्ण होती। मिश्रित कर दे। चांद शून्य है; उसके पास कोई रोशनी नहीं है, लेता और सूरज के पास प्रकाश भी महान है, विराट है। चांद के पास कोई बहुत बड़ा प्रकाश थोड़े ही है, बड़ा सीमित है; इस पृथ्वी तक आता है, और कहीं तो जाता नहीं।

पर हमने सोचा है बहुत, सदियों तक, और तब हमने चांद को चुना है दो कारणों से। एक,गुरु के पास भी रोशनी अपनी नहीं है, परमात्मा की है। वह केवल प्रतिफलन है। वह जो दे रहा है, अपना नहीं है; वह केवल निमित्तमात्र है, वह केवल दर्पण है।

तुम परमात्मा की तरफ सीधा नहीं देख पाते, सूरज की तरफ सीधा देखना बहुत मुश्किल है। देखो, तो अड़चन समझ में आ जाएगी। प्रकाश की जगह आंखें अंधकार से भर जाएंगी। परमात्मा की तरफ सीधा देखना असंभव है, आंखें फूट जाएंगी, अंधे हो जाओगे। रोशनी ज्यादा है, बहुत ज्यादा है, तुम सम्हाल न पाओगे, असह्य हो जाएगी। तुम उसमें टूट जाओगे, खंडित हो जाओगे, विकसित न हो पाओगे।

इसलिए हमने सूरज की बात छोड़ दी। वह थोड़ा ज्यादा है; शिष्य की सामर्थ्य के बिलकुल बाहर है। इसलिए हमने बीच में गुरु को लिया है।

गुरु एक दर्पण है, पकड़ता है सूरज की रोशनी और तुम्हें दे देता है। लेकिन इस देने में रोशनी मधुर हो जाती है। इस देने में रोशनी की त्वरा और तीव्रता समाप्त हो जाती है। दर्पण को पार करने में रोशनी का गुणधर्म बदल जाता है। सूरज इतना प्रखर है, चांद इतना मधुर है!

इसलिए तो कबीर ने कहा है, गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय। किसके छुऊं पैर? वह घड़ी आ गई, जब दोनों सामने खड़े हैं। फिर कबीर ने गुरु के ही पैर छुए, क्योंकि बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।

सीधे तो देखना संभव न होता। गुरु दर्पण बन गया। जो असंभवप्राय था, उसे गुरु ने संभव किया है, जो दूर आकाश की रोशनी थी, उसे जमीन पर उतारा है। गुरु माध्यम है। इसलिए हमने चांद को चुना।

गुरु के पास अपना कुछ भी नहीं है। कबीर कहते हैं, मेरा मुझमें कुछ नहीं। गुरु है ही वही जो शून्यवत हो गया है। अगर उसके पास कुछ है, तो वह परमात्मा का जो प्रतिफलन होगा, वह भी विकृत हो जाएगा, वह शुद्ध न होगा।

चांद के पास अपनी रोशनी ही नहीं है जिसको वह मिला दे, है सूरज से, देता है तुम्हें। वह सिर्फ मध्य में है, माधुर्य को जन्मा देता है।

सूरज कहना ज्यादा तथ्यगत होता, लेकिन ज्यादा सार्थक न होता। इसलिए हमने चांद कहा है।

फिर सूरज सदा सूरज है, घटताबढ़ता नहीं। गुरु भी कल शिष्य था। सदा ऐसा ही नहीं था। बुद्ध से बुद्ध पुरुष भी कभी उतने ही तमस, अंधकार से भरे थे, जितने तुम भरे हो। सूरज तो सदा एकसा है।

इसलिए वह प्रतीक जमता नहीं। गुरु भी कभी खोजता था, भटकता था, वैसे ही, उन्हीं रास्तों पर, जहां तुम भटकते हो, जहां तुम खोजते हो। वही भूलें गुरु ने की हैं, जो तुमने की हैं। तभी तो वह तुम्हें सहारा दे पाता है। जिसने भूलें ही न की हों, वह किसी को सहारा नहीं दे सकता। वह भूल को समझ ही नहीं सकता। जो उन्हीं रास्तों से गुजरा हो; उन्हीं अंधकारपूर्ण मार्गों में भटका हो, जहां तुम भटकते हो, उन्हीं गलत द्वारों पर जिसने दस्तक दी हो, जहां तुम देते हो; मधुशालाओं से और वेश्यागृहों से जो गुजरा हो; जिसने जीवन का सब विकृत और विकराल भी देखा हो, जिसने जीवन में शैतान से भी संबंध जोड़े होंवही तुम्हारे भीतर की असली अवस्था को समझ सकेगा।

नहीं, सूरज तुम्हें न समझ सकेगा, चांद समझ सकेगा। चांद अंधेरे से गुजरा है; पंद्रह दिन, आधा जीवन तो अंधेरे में ही डूबा रहता है। अमावस भी जानी है चांद ने, सदा पूर्णिमा ही नहीं रही है। भयंकर अंधकार भी जाना है, शैतान से भी परिचित हुआ है, सदा से ही परमात्मा को नहीं जाना है। यात्री है चांद। सूरज तो यात्री नहीं है, सूरज तो वैसा का वैसा है। अपूर्णता से पूर्णता की तरफ आया है गुरु चांद की तरहएकम आई, दूज आई, तीज आईधीरेधीरे बढ़ा है एकएक कदम। और वह घड़ी आई, जब वह पूर्ण हो गया है।

गुरु तुम्हारे ही मार्ग पर है; तुमसे आगे, पर मार्ग वही है। इसलिए तुम्हारी सहायता कर सकता है। परमात्मा तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता।

यह तुम्हें थोड़ा कठिन लगेगा सुनना। परमात्मा तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता, क्योंकि वह उस यात्रा में कभी भटका नहीं है, जहां तुम भटक रहे हो। वह तुम्हें समझ ही न पाएगा।वह तुमसे बहुत दूर है। उसका फासला अनंत है। तुम्हारे और उसके बीच कोई भी सेतु नहीं बन सकते।

गुरु और तुम्हारे बीच सेतु बन सकते हैं। कितना ही अंतर पड़ गया हो पूर्णिमा के चांद मेंकहां अमावस की रात, कहां पूर्णिमा की रातकितना ही अंतर पड़ गया हो, फिर भी एक सेतु है। अमावस की रात भी चांद की ही रात थी, अंधेरे में डूबे चांद की रात थी। चांद तब भी था, चांद अब भी है। रूपांतरण हुए हैं, क्रांतिया हुई हैं; लेकिन एक सिलसिला है।

तो गुरु तुम्हें समझ पाता है। और मैं तुमसे कहता हूं तुम उसी को गुरु जानना, जो तुम्हारी हर भूल को माफ कर सके। जो माफ न कर सके, समझना, उसने जीवन को ठीक से जीया ही नहीं। अभी वह पूर्ण तो हो गया होगाजो मुझे संदिग्ध है। जो दूज का चांद ही नहीं बना, वह पूर्णिमा का चांद कैसे बनेगा? धोखा होगा।

इसलिए जो महागुरु हैं, परम गुरु हैं, वे तुम्हारी सारी भूलों को क्षमा करने को सदा तत्पर हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि स्वाभाविक है, मनुष्यमात्र करेगा। उन्होंने स्वयं की हैं, इसलिए दूसरे को क्या दोष देना! क्या निंदा करनी! उनके मन में करुणा होगी।

चांद तो सारी यात्रा से गुजरा है, सारे अनुभव हैं उसके। मनुष्यमात्र के जीवन में जो हो सकता है, वह उसके जीवन में हुआ है। वही गुरु है, जिसने मनुष्यता को उसके अनंतअनंत रूपों में जी लिया हैशुभ और अशुभ, बुरे और भले, असाधु और साधु के, सुंदर और कुरूप। जिसने नरक भी जाना है, जीवन का स्वर्ग भी जाना है; जिसने दुख भी पहचाने और सुख भी पहचाने, जो सबसे प्रौढ़ हुआ है। और सबकी संचित निधि के बाद जो पूर्ण हुआ है, चांद हुआ है।

इसलिए हम सूरज नहीं कहते गुरु को, चांद कहते हैं। चांद शीतल है। रोशनी तो उसमें है, लेकिन शीतल है। सूरज में रोशनी है, लेकिन जला दे। सूरज की रोशनी प्रखर है, छिदती है, तीर की तरह है। चांद की रोशनी फूल की वर्षा की तरह है, छूती भी नहीं और बरस जाती है।

गुरु चांद है, पूर्णिमा का चांद है। और तुम कितनी ही अंधेरी रात होओ और तुम कितने ही दूर होओ, कोई अंतर नहीं पड़ता, तुम उसी यात्रापथ पर हो, जहां गुरु कभी रहा है।

इसलिए बिना गुरु के परमात्मा को खोजना असंभव है। परमात्मा का सीधा साक्षात्कार तुम्हें जला देगा, राख कर देगा। सूरज की तरफ आंखें मत उठाना। पहले चांद से नाता बना लो। पहले चांद से राजी हो जाओ। फिर चांद ही तुम्हें सूरज की तरफ इशारा कर देगा। बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय। इसलिए आषाढ़ पूर्णिमा गुरुपूर्णिमा है। पर ये काव्य के प्रतीक हैं। इन्हें तुम किसी पुराण में मत खोजना। इनके लिए तुम किसी शास्त्र में प्रमाण मत खोजने चले जाना। यह तो जैसा मैंने देखा है, वैसा तुम से कह रहा हूं।

– ओशो

[ गीता-दर्शन-भाग(8) प्रवचन-201 ]

 

सागर कमल की पाँच कविताएँ


पेशे से शिक्षक सागर कमल मेरठ जिले के बाफर गाँव के रहने वाले हैं. एक सहज, संवेदनशील और उत्साही युवा सागर तोमर (मूल नाम) के लिए खेती-किसानी सिर्फ नारा नहीं है. किसान परिवार में जन्मे सागर आज भी गाँव में रहते हैं और गाँव के ही संस्कारों में रचे-बसे हैं. वह गाँव आपको सागर की कविताओं में मूल संवेदना के रूप में सहज भाव से बहता हुआ दिखेगा. फिलहाल उनकी पाँच कविताएँ: 


क्योंकि मैं सूर्य हूँ


मैं उगता हूँ

मैं चढ़ता हूँ

मैं जल-जलकर चमकता हूँ

डूबना भी मुझी को पड़ता है

क्योंकि मैं सूर्य हूँ !

मैंने भोगी है

परिवर्तन की अनंत ज्वलंत यात्रा

यही जलता हुआ परिवर्तन मेरी पूँजी है

इस पूँजी का समान वितरण

करना मुझी को पड़ता है

क्योंकि मैं सूर्य हूँ  !

 

मैं ही तो हूँ

सृष्टि का मूलाधार

मेरे बिना तुम्हारे कल्प-विकल्प क्या हैं ?

तुम्हारी सर्द विचारों से भरी दुनिया को

भावों का ताप ,

देना मुझी को पड़ता है

क्योंकि मैं सूर्य हूँ  ! 

 

 

 

 आशा और निराशा

 

आशा !

एक अतिक्षीण डोरी-सी

कभी तो अदृश्य

जिस पर हम जीवन के महत्त्वपूर्ण

निजी सुख-दु:खपूर्ण

आवरण टाँगते हैं, सुखाते हैं

और निराशा ?

मुखद्वार में ठुकी, एक अरसे से रुकी

थोड़ा आगे को झुकी

स्थूल और मज़बूत कील के जैसी

जो घर से बाहर निकलते

रोज़ ही आते-जाते

माथे से टकराती है

और अक्सर घायल कर जाती है 

तो क्यों न डोरी को कील से

बाँध, तानकर स्थिरता दी जाए ?

क्योंकि निराशा का शब्दांत भी

आशा ही तो है   !

 

  

 संबंध

 

तुमने हमेशा मुझे

एक टूटी हुई

चप्पल की तरह निबाहा !

और मैंने ?

तुम्हें अपनी लाइब्रेरी में रखी

किसी किताब की तरह चाहा !

मैं तुम्हारे लिए सदा ही

एक डस्टबिन से ज़्यादा

कुछ नहीं रहा

और तुम मेरे निकट

जैसे मोक्ष बनकर रहीं  !

हमारा संबंध भी

नाजायज़ माँ-बाप की तरह था

कि ना कोई दोस्ती

ना दुश्मनी ही रही

गड़े हुए धन पर साँप की तरह था  !

ये निबाहट, ये चाहत

ऐसे रही कि जैसे खट्टी दही में

थोड़ी मीठी खाँड मिला दी जाए,

जैसे बिनब्याही माँ

अपने बच्चे को

जिए जाए !

चाहे जो कुछ रहा हो

तुम्हारे लिए

पर मेरे लिए कमबख़्त

प्रेम से कम कुछ भी नहीं  !  !


जैसे कि . . .

 

जैसे नदी में दोहराव नहीं होता

जैसे हवा सिर्फ़ बहना जानती है

जैसे कविता का धर्म है

सिर्फ़ कविता होना  !

जैसे हाली धरती का सीना चीरता है

इसलिए नहीं कि उसे चीर पसंद है

बल्कि इसलिए कि

वह बीज को चूमना

और फ़सल को दुलारना चाहता है  !

जैसे किताब का मुड़ा हुआ पन्ना

ठोस प्रमाण है लगावट का

जैसे चूल्हे की आग में

संघर्ष पकता है माँ के जनमभर का  ! !

जैसे पीढ़ियों का अंतराल

एक चिलम के धुएँ में उड़ जाता है

जैसे धुआँ शायद बादल बन जाता है  !

जैसे जैसे जैसे . . .

कि मैं बस तुम्हें

प्रेम करना चाहता हूँ

क्योंकि यही तो एक समस्या है

कि इसके सिवा

मुझे कुछ आता भी नहीं  ! !

 

 

 

 तुम लौट जाओ

 

इससे पहले कि

पतझड़ बसंत में बदले

और सूखे पत्ते फिर लहरा उठें

इससे पहले कि

बंजर धरती हाली को पुकारे

और बेचारी फिर से धीरज धरे

इससे पहले कि

भादवे का रामजी टूटकर बरसे

और मेरा मन फिर तरसे

इससे पहले कि

असोज के सफ़ेद बादल काले हो जाएँ

और अपेक्षा के बीज में अंकुर निकल आएँ

इससे पहले कि

अंकुर विवश हो पौधा बनने के लिए

और उस पेड़ की भावनाएँ फिर पिघलें  !

 

इससे पहले कि . . .

मेरे शब्दों को तुम सिर्फ़

अच्छी कविता कहकर बरी हो जाओ . . .

तुम लौट जाओ

हाँ, हाँ तुम लौट जाओ  ! !      

 

© सागर कमल