निठारीकरण हो गया

कर दिया जो वही आचरण हो गया ।

लिख दिया जो वही व्याकरण हो गया ।

गोश्त इन्सान का यूं महकने लगा

जिंदगी का निठारीकरण हो गया ।

क्योंकि घर में ही थीं उसपे नज़रें बुरी

द्रौपदी के वसन का हरण हो गया ।

उस सिया को बहुत प्यार था राम से

पितु प्रतिज्ञा ही टूटी , वरण हो गया ।

'राढ़ी ' वैसे तो कर्ता रहा वाक्य का

वाच्य बदला ही था, मैं करण हो गया ।

कल भगीरथ से गंगा बिलखने लगी

तेरे पुत्रों से मेरा क्षरण हो गया । ।

Comments

  1. बहुत सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है!
    बधाई!

    ReplyDelete
  2. गोश्त इन्सान का यूं महकने लगा
    जिंदगी का निठारीकरण हो गया ।
    बहुत खूबसूरती से कही बात

    ReplyDelete
  3. बहुत ही सुन्दर और प्रासंगिक.

    ReplyDelete
  4. उधर आपने लिखा, बहुत बहुत खूब
    इधर मेरे दिल का हरण हो गया !!

    ..बार-बार पढ़के संतुलन खो गया ?

    ReplyDelete
  5. vaah raarhee jee.vyawastha kee visangatiyon par kyaa sateek dhang se piroya hai.

    ReplyDelete
  6. अद्भुत है यह रचना. जितनी बार पढ़ी जाए, नई ही लगेगी. आज के आदमी की पीड़ा बिलकुल सही पहचान है.

    ReplyDelete

Post a Comment

सुस्वागतम!!

Popular posts from this blog

रामेश्वरम में

...ये भी कोई तरीका है!

आइए, हम हिंदीजन तमिल सीखें

Most Read Posts

Bhairo Baba :Azamgarh ke

Maihar Yatra

रामेश्वरम में

Azamgarh : History, Culture and People

सीन बाई सीन देखिये फिल्म राब्स ..बिना पर्दे का

ये क्या क्रिकेट-क्रिकेट लगा रखा है?

गन्ने के खेत में रजाई लेकर जाती पारो

...ये भी कोई तरीका है!

आइए, हम हिंदीजन तमिल सीखें

गढ़ तो चित्तौडग़ढ़...