कोरोना के बाद की दुनिया – 4

इष्ट देव सांकृत्यायन 

इसके पहले कि भारत में शल्य समस्या, उसके प्रभावों और निराकरण पर बात की जाए, दुनिया के बाजार में साख के महत्व और उसमें चीन की हिस्सेदारी पर बात कर लेते हैं। अधिक विस्तार के लिए मित्रों से क्षमा चाहता हूँ, लेकिन आगे की बातों से इसका बड़ा गहरा संबंध है और इसलिए इसकी चर्चा मुझे जरूरी लगती है। लॉयड ब्लैंकफीन एक अमेरिकी निवेश बैंकर हैं। वह कहते हैं, “आपको अपने जीवन में ऐसे लोग चाहिए ही होते हैं जो आपके साथ काम करना चाहें और आपकी मदद करना चाहें। मेरे हिसाब से संगठनात्मक ढांचे का बहुत महत्व नहीं है। इसीलिए मैं अपने उच्चाधिकारियों की नज़र में अपनी साख बनाए रखना चाहता हूँ लेकिन अधिक प्रयास अपने सहयोगियों की साख प्राप्त करने की दिशा में करता हूँ।”

यह सही है कि किसी की बात कोई ब्रह्मवाक्य नहीं है, लेकिन बाजार और कूटनीति की दुनिया पूरी तरह साख पर ही निर्भर है। बाजार में चीन की साख केवल और केवल सस्ते के लिए है। वहाँ बने सामानों के टिकाऊपन और गुणवत्ता की स्थिति यह है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा चुटकुले चीन के उत्पादों पर ही हैं। चीन में बने किसी भी सामान को दुनिया में कहीं भी, यहाँ तक कि तीसरी दुनिया और उससे भी बाहर के देशों में भी स्टेटस सिंबल नहीं माना जाता। गौर करने की बात यह है कि उपभोक्ता सबसे ज्यादा मध्यवर्ग से होते हैं। मध्यवर्ग की मनोदशा यह है कि वह निरंतर विकासशील या कम से कम विकास के लिए प्रयत्नशील है। आज जो निम्न मध्यवर्ग में है, उसकी सारी जद्दोजहद कल किसी तरह उच्च मध्यवर्ग में पहुँच जाने के लिए है। ठीक इसी तरह जो उच्च मध्यवर्गीय है, वह उच्च वर्ग में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्षरत है। जिसे निम्नवर्ग कहा जाता है, वह भी इस दौड़ से बाहर है नहीं, यह अलग बात है कि वह दौड़ लगाता हुआ दिखता नहीं है।

भारतीय बाजार दुनिया भर को अपनी इसी विशेषता के लिए आकर्षित करता है कि उसके पास मध्यवर्ग की बहुत बड़ी आबादी है। मध्यवर्ग खर्च की अपनी सीमा को खींचने का अभ्यस्त होता है। उसे अगर कोई दस हजार की मिल रही है, वही अगर थोड़ी बेहतर क्वालिटी में 12 हजार की मिले तो वह या तो दो महीने रुक जाएगा या फिर कर्ज ले लेगा। बाजार के इस हिस्से से होने वाली कमाई के साथ-साथ इसके ढुलमुलपन को भी सभी जानते हैं। जो कंपनियां बहुत महंगे सामान बनाती हैं, उन्हें सस्ते सामान बनाना भी आता है। सस्ते बनाने से अगर उन्हें अपनी साख पर बट्टा लगता दिखेगा तो इसके लिए भी रास्ते उनके पास हैं। महंगे और सस्ते के लिए दो अलग-अलग ब्रांडनेम पंजीकृत करा लेंगी। आखिर नेक्सन बनाने वाली टाटा नैनो बना ही रही है न! यही दुनिया की दूसरी कंपनियां क्यों नहीं कर सकतीं!

अमेरिका अगर अपनी कंपनियों से त्वरित कार्रवाई वाले अंदाज में चीन छोड़ भारत का रुख करने को कह रहा है तो इसका मतलब ही यह है कि वह इसकी योजना बना चुका है। यह बात पहले ही स्पष्ट है कि भारत के बाजार की मध्यवर्गीय विशिष्टता, उसकी व्यय क्षमता और उसकी संभावनाओं को वह ठीक से जानता है। यह बात केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। बाजार की संभावनाएं थोड़े बहुत अंतर के साथ दुनिया भर में ऐसी ही हैं।

संभावनाओं और उन पर दूसरे देशों की नजर के अलावा एक और बात है। वह यह कि भारत समेत कई देशों के लोग चीनी उत्पादों को छोड़ने का मन पहले से ही बनाए बैठे हैं। उन्हें सिर्फ़ विकल्प और अवसर चाहिए। यहाँ तक कि आजकल अपने को चीन का सबसे करीबी मित्र बताने वाले पाकिस्तान की भी जनता चीन को पसंद नहीं करती। हुक्मरानों की बात अलग है और बाजार हुक्मरानों के बनाए कानूनों भर से नहीं चलता। उसके चलने के लिए जनभावना बहुत जरूरी होती है। जिन देशों से चीन का कोई सीमा विवाद नहीं है और जनता उससे सीधे प्रभावित नहीं होती, उन देशों में भी अब कोरोना के बाद चीन के प्रति घृणा का जबर्दस्त माहौल बन चुका है।

वह जनभावना ही है जिसके लिए पिछली सदी के जर्मन व्यंग्यकार लुडविग बॉर्न ने कहा, “साख एकमात्र ऐसी संपदा है जिसे दुनिया की कोई प्रतिस्पर्धा कम मूल्य पर बिकने या नष्ट होने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।” दुर्भाग्य से चीन ने साख की कभी परवाह की ही नहीं। न तो बाजार में और न कूटनीति में। जिस भारत ने अपने सामने आई थाली उसकी ओर टरकाकर उसे सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दिलवाई, आज वह उसी भारत की स्थायी सदस्यता के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। हिंदी चीनी भाई भाई का नारा लगाते हुए उसने भारत पर ही हमला कर दिया और हमारे एक भूभाग पर कब्जा जमा बैठा। नत्थी वीजा का थेथरपन आज तक नहीं छोड़ पाया। डोकलाम पर दुनिया भर में अपमानित होने के बाद भी उसकी नीयत और बेशर्मी में कोई अंतर नहीं आया।

अपने ही नागरिकों के वुहान में चीन ने क्या किया, इसका पता सिर्फ़ सल्फर डाई ऑक्साइड के धुएं ने दिया। शिन झियांग में उइगुर लोग और थ्येन आन मन चौक जैसी घटनाएं पूरी दुनिया के लिए चेतावनी हैं। हाँगकांग, ताइवान, दक्षिण कोरिया, म्यांमार, मलेशिया, वियतनाम... आसपास का ऐसा एक भी देश नहीं जिससे चीन के रिश्ते अच्छे हों। क्यों? केवल एक कारण और वह है उसकी साम्राज्यवादी नीति। भीतर तानाशाही और बाहर साम्राज्यवादी।

तिब्बत अलग पूरी दुनिया में चीन का सच उधेड़ रहा है। आज की तारीख में निर्वासित, अशक्त और वयोवृद्ध संन्यासी दलाई लामा का दुनिया भर में जो सम्मान है, क्या ख़ुद को आजीवन तानाशाह सम्राट घोषित कर चुके शी जिनपिंग उसके सामने कहीं ठहरते हैं! जिस दिन दुनिया चीन के इस वाइरस हमले से उबरेगी, उससे पहले ही बाजार और कूटनीति के महारथी इन विषयों पर मंथन कर चुके होंगे। कोई बहुत बड़ा स्वार्थ और वह भी किसी राजनेता का कुछ निजी क़िस्म का, आड़े न आया तो सबका निष्कर्ष वही होगा जो अभी आपका है।

शेष अगली कड़ी में

©Isht Deo Sankrityaayan

 


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