चतुष्पदी
हो गए बस में अगर एक पागल चाह के
फूल बन जाएंगे खुद सारे कांटे राह के
इक ज़रा सी जिंदगी की फिक्र इतनी किसलिए
चल रहा ब्रह्माण्ड जब बिन किसी परवाह के
फूल बन जाएंगे खुद सारे कांटे राह के
इक ज़रा सी जिंदगी की फिक्र इतनी किसलिए
चल रहा ब्रह्माण्ड जब बिन किसी परवाह के
बहुत बढिया!!
ReplyDeleteये तो इत्ती घणी धांसू है, कि आपकी सी ना लग रही।
ReplyDeleteजी हां; बिल्कुल सही। वह गाना भी है न - हर फिक्र को धुयें में उड़ाता चला गया। बस वैसा ही कुछ होना चाहिये जीवन में।
ReplyDeleteकुछ धांसू वांसू नाहीं बा भइया। हम्मे त इहे लगत बा। अब भउजाई से मिले के परी कि इनके कुछ समझावा। बड़ा एहर ओहर के बात लिखत हवें। अरे आपन नाहीं त दुसरे क त खयाल रखही के परी न। आदमी खाली अपने खातिर थोड़े न जियेला। ओकरे जिंदगी पर तमाम लोगन के हक होला। अगर अइसन नाहीं होत त जनता काहें बीमा करावे खातिर टूटति।
ReplyDeleteबाकी बाद में लिखब।
churng ji
ReplyDeleteekdam tohre jvn ke anuroop kavita baa
siddhartha chapra bihar