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Showing posts from February, 2020

हड़बड़ी से गड़बड़ी

इष्ट देव सांकृत्यायन ' पाकिस्तान ज़िंदाबाद ' के नारे लगाना सरासर ग़लत है और यह सीधे-सीधे देशद्रोह की हरकत है , इसमें तो कोई दो राय हो ही नहीं सकती. लेकिन उस पर हमला करना या उसका घर घेरना भी कोई अच्छा काम नहीं कहा जा सकता. देशद्रोहियों के ख़िलाफ़ जनरोष स्वाभाविक है. उसे समझा जा सकता है. लेकिन रोष में होश खो देना और कानून को अपने हाथों में ले लेना भी कोई ढंग का काम नहीं है. कानून अपना काम कर रहा है. वह कोई सोया हुआ नहीं है और न बेहोश है. हमने इसकी गति सत्तर वर्षों से मंथर ही बनाए रखी है. तो हमें यह भी समझना होगा कि रातो-रात कुछ नहीं होता. किसी व्यवस्था या सरकार से चमत्कार की आशा नहीं करनी चाहिए. वरना वही होगा जो ऐसे मामलों में होता है. इसके पहले कि कोई और भीड़ अमूल्या या उसके परिजनों के ख़िलाफ़ कोई क़दम उठाए और आप उसका हिस्सा बन जाएं , आपको वह बात सुननी और समझनी होगी जो उसने नारे लगाने के बाद कही है. उसने कहा है - " मैं जो भी आज कर रही हूं , वो मैं नहीं कर रही हूं। मैं सिर्फ इसका फेस बन गई हूं , मीडिया की बदौलत। लेकिन मेरे पीछे बहुत सारे अडवाइजरी कमिटिय

कानून किसके साथ?

इष्ट देव सांकृत्यायन कश्मीर में ये अनपढ़ और बेरोजगार युवा थे. गरीबी और बदहाली से तंग. दिल्ली में ये विश्वविद्यालय के छात्र निकले. लखनऊ में ये गरीब बेसहारा मजदूर हो गए. और कानून तो हुजूर वह तो कुछ लोगों की उस टाइप वाली रखेल है जिसका कोई हक नहीं और जिसे वे जैसे चाहें प्रताड़ित कर सकते हैं. निर्भया के बाद भी अगर किसी को कोई शक बचा हो तो उसका कोई इलाज नहीं है. केवल इसी देश में न्याय आतंकवादियों के बचाव में सेना का रास्ता रोकने और उस पर हमला करने वाले नागरिकों पर गोलियां चलाने से रोक सकता है. जनता की गाढ़ी कमाई से बनी सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने वालों को वसूली की नोटिस भेजे जाने पर स्टे दे सकता है. इस पृथ्वी नामक ग्रह के किसी और कोने के इतिहास में अगर ऐसा कुछ हुआ दिखा हो तो जरा बताइएगा. अब सवाल यह है कि विश्वविद्यालय स्तर पर पहुंचकर अगर यही पत्थरबाजी ही पढ़ाई जानी है तो बेहतर होगा कि इसकी पढ़ाई सभी बोर्डों में प्राइमरी स्तर से ही करा दी जाए. वरना इस समाज का क्या होगा ? क्या एक बड़ा तबका सिर्फ़ अपराधों का भुक्तभोगी बनने के लिए होगा ? और दूसरा बड़ा तबका सिर्फ

चीन में मानवाधिकार

इष्ट देव सांकृत्यायन  मानवाधिकार पर सबसे उत्तम अमल चीन में हो रहा है. 1951 में तिब्बत में मानवाधिकार का शत-प्रतिशत क्रियान्वयन उन्होंने कैसे किया , यह तो मैंने देखा नहीं. लेकिन उसका उत्तम परिणाम मेरे सामने है. धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) से लेकर यहाँ दिल्ली में मजनू का टीला और बंगलुरु तक मैं देख चुका हूँ. दूसरा उदाहरण मेरे यह शरीर धारण करने से पहले का ही है. अपने गुलाबी चच्चा तिब्बत के बाद भी शील पंच करते हुए ' हिंदी चीनी भाई भाई ' रेंकंने में लगे रहे और उधर अब जिस चिकन नेक की बात श्री शरजील इमाम जी कर रहे हैं , उसे रेतने की व्यवस्था हो गई. कोर्स वाली किताबें तो नहीं , लेकिन प्रत्यक्षदर्शियोंं के संस्मरणों से पता चला कि कुछ लोग , जो अब श्री शरजील इमाम जी के पक्ष में तर्कों के वाण लेकर खड़े हैं , चीन के पक्ष में खड़े थे और उन्हीं के प्रतिनिधि गुलाबी चच्चा के मुख्य सलाहकार रहते हुए ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों में सौंदर्य प्रसाधन बनवा रहे थे. तब उन्होंने चीन से आई सेना को भारत के लिए मुक्ति सेना बताया था और रावण की हँसी फीकी हो जाती होगी जब वे लोग भारत के स्वतंत्रता

मेरी चीन यात्रा - 12

यात्रावृत्त शुरू से पढ़ने के लिए कृपया यहाँ देखें:   पहली ,  दूसरी ,  तीसरी ,  चौथी ,  पांचवीं ,   छठी ,  सातवीं ,  आठवीं ,  नौवीं ,  दसवीं   और   ग्यारहवीं   कड़ी   डॉ. अरविंद मिश्र इस समापन अंक में मैं कुछ छिटपुट बातों के साथ वापसी यात्रा की चर्चा करुंगा। सम्मेलन के दूसरे दिन डा. श्रीनरहरि ने अपराह्न को बताया कि एशियन साइंस फिक्शन एसोसिएशन की एक मीटिंग शाम को बुलाई गई है जिसमें उन्हें जाना है। मैं अभी भी इस एसोसिएशन के इक्ज़िक्यूटिव बोर्ड में हूं मगर मुझे कोई सूचना नहीं थी। डा. नरहरि ने कहा कि वी चैट चेक करिए होगी जरूर। देखा मगर नहीं थी। डा. नरहरि होटेल में ही आहूत मीटिंग में त्वरा से निकल गए।   अब बिना बुलाए तो भगवान के पास भी न जाऊं वाला ही विकल्प मेरे सामने था। गया नहीं मगर इसके बारे में वी चैट पर लिख जरुर दिया। एक दो मेम्बर्स ने भी कहा कि उन्हें भी कोई सूचना नहीं दी गई। बहरहाल बिना सभी बोर्ड मेम्बर्स को सूचित किए इस बैठक में क्या गुल खिले मालूम नहीं हो पाया। डा. नरहरि ने तदनंतर बताया कि बैठक में अगला सम्मेलन किस देश में हो इस पर वोटिंग थी मगर उन्होंने इसमें

मेरी चीन यात्रा – 11

कृपया शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें: पहली , दूसरी , तीसरी , चौथी , पाँचवीं , छठी , सातवीं , आठवीं , नौवीं और दसवीं कड़ी  डॉ. अरविंद मिश्र   मेरे कुछ विज्ञानकथा कीड़ा (सा इं स फिक्शन बुकवर्म) मित्रों को अब तक के संस्मरणों के बजाय सम्मेलन के एजे ंडा की चर्चा की दरकार है। वैसे तो मैंने स ंप न्न विमर्शों की थोड़ी झलक पहले भी दे रखी है कि ंतु विज्ञानकथा प्रेमियों को और चाहि ए - दिल मांगे मोर की तर्ज पर। मैंने पहले भी यह स्पष्ट किया था कि वहां चर्चा परिचर्चा और विमर्श एक ही समय में कई कक्षों में समानांतर चल रहा था जिसे अकेले कवर कर पाना/सुनना संभव नहीं था। हां , कार्यक्रम विवरणिका से हम विषयों पर आपको   एक दृष्टि डालने का अवसर जरुर दे सकते हैं। मुख्य विषय निम्नवत रहे – १-विज्ञानकथा और न ई अर्थव्यवस्था २-एशि या ई विज्ञानकथा का भविष्य ३-वर्ल्डकान आयोजन के विविध पहलू ४-विविधतायुक्त जपानी विज्ञानकथा ५-कोरिआई विज्ञानकथा का भविष्य और वर्तमान ६-विज्ञानकथा और नगरीय नियोजन की संकल्पना एं ७-चीनी विज्ञानकथा का अनुवाद और निर्यात ८-विज्ञानकथा से प्रेम क्यों ? ९-वैज्ञानिक प्रग

मेरी चीन यात्रा - 10

यात्रावृत्त शुरू से पढ़ने के लिए कृपया देखें : पहली , दूसरी , तीसरी , चौथी , पांचवीं , छठीं , सातवीं , आठवीं एवं नौवीं कड़ी  डॉ. अरविंद मिश्र  मुझे आगाह किया गया था कि चीन में गूगल , वाट्सअप और फेसबुक काम नहीं करते । बस वी चैट अच्छा काम करता है। मैंने चायनीज सिम ले लिया था। वी चैट ऐप पहले से ही मोबाइल में था। उसके द्वारा कुछ चीनी मित्रों से बात की थी तो उन्होंने भी गूगल और अन्य प्रचलित सोशल साइट के चीन में निष्क्रिय होने की बात की थी। हां वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नंबर) के सहारे सब ऐप उपयोग में लाए जा सकते। वीपीएन के लिए तो हम कोशिश नहीं कर सके। यात्रा पर रवाना हो गए। मगर यह आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई कि कभी कभार वाट्सअप और फेसबुक पर संदेशों का आदान प्रदान हो जा रहा था। खास तौर पर जब हमारे विमान की आपात लैंडिंग चोंगक्विंग अ ंत रराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुई तो हमने ' सा इं स फिक्शन इन इ ंडि या ' के अपने वाट्सअप ग्रुप में भी ' एसओएस ' किया था और मित्रों की शुभकामनाएं प्राप्त की थीं। बल्कि कुछ मित्रों ने आश्चर्य भी व्यक्त किया था और पूछा भी कि चीन से वाट्स

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