रेडिएशन, कटोरा और केकड़े


एक तरफ तो मोबाइल के टावरों से होने वाली रेडिएशन की बड़ी बात की जाती है. हजारों नुकसान गिनाए जाते हैं. और दूसरी तरफ हर शख्स के हाथ में दो-तीन फोन और उनमें पाँच-आठ सिम हैं.

यही नहीं, सबको बहुत अच्छी कनेक्टिविटी भी चाहिए. चाहे बात करने के लिए हो या फिर सर्फिंग के लिए. बात करते वक्त आवाज़ साफ़ सुनाई देनी चाहिए, जरा सी घिचपिच नहीं होनी चाहिए, एक बार भी संपर्क नहीं टूटना चाहिए और नेट के मामले में गूगल पर कैचवर्ड डालते ही टेक्स्ट से लेकर फोटो और विडियो तक पूरा मसाला हाजिर हो जाना चाहिए.

हम तो ट्रंककॉल वाली पीढ़ी से हैं. मेरी पीढ़ी के हर शख्स को ठीक से पता होगा कि हम सीधे मोबाइल पर नहीं आए. यहाँ तक कि एक से दूसरे शहर या कस्बे में बात भी लैंडलाइन फोन पर सीधे नहीं हो पाती थी. आपको अपने घर के फोन से केवल अपने शहर भर में बात करने की सुविधा थी. शहर से कहीं बाहर बात करनी हो तो पहले एक्सचेंज मिलाना पड़ता था. एक्सचेंज वाले बड़ी कृपा करके आपकी ट्रंक कॉल बुक करते थे. पता नहीं, तब एसटीडी-आइएसडी जैसी कोई व्यवस्था भी थी या नहीं.

फिर एसटीडी आया. पीसीओ भी आए. पीसीओ का धंधा आया, बड़े जोर से पनपा और उसके पनपते ही मोबाइल आया. मोबाइल आया और आते ही फैल गया, महामारी की तरह. इसे मजाक मत समझिए. मोबाइल वाकई महामारी है. लेकिन अभी हमने सुविधा और अपने दैहिक-मानसिक स्वास्थ्य में से सुविधा के नाम पर महामारी को चुन लिया है. सीधा मतलब है कि अभी हम यह स्वीकार नहीं कर पाए हैं कि यह महामारी है. अगर हमने थोड़ा-थोड़ा समझ लिया है तो भी हम यह मानकर चल रहे हैं कि अरे इतना भी नुकसानदेह नहीं है जितना लोग हल्ला मचाए हुए हैं. और हुआ भी तो क्या, देखा जाएगा. ख़ैर, प्रदूषण वगैरह बहुत चीजों की तरह इसे भी हम स्वीकार करेंगे, लेकिन तब जब हाथ में कुछ नहीं रह जाएगा.

तो मोबाइल ने एक तरफ तो पीसीओ को खाया, दूसरी तरफ बच्चों और जवानों को, लोगों के रिश्तों को. माता-पिता अब बच्चों को खुद मोबाइल थमा देते हैं. अपना पीछा छुड़ाने के लिए. बच्चे पहले कार्टून, फिर गेम और फिर खतरनाक गेम में बिजी हो जाते हैं. अगर वे खतरनाक गेम से बचकर सर्वाइव कर गए और युवा हुए तो फिर सोशल मीडिया, सीरियल, सिरीज, मूवी और पोर्न तक आते हैं.

उसके बाद रेडिएशन को कौन पूछता है! मंत्री जी अगर कहते हैं कि मोबाइल टावर से रेडिएशन नहीं होता तो ठीक कहते हैं. वैज्ञानिकों और उनकी प्रयोगशालाओं को जो कहना हो, कहा करें. हम तो मंत्री जी को ही ठीक मानेंगे. क्या मंत्री जी अगर कह दें कि रेडिएशन होता है और यह आपके लिए खतरनाक है, तो क्या आप अपनी जेब में मोबाइल रखना बंद कर देंगे? नहीं न? फिर फालतू का बखेड़ा क्यों?

आप तो अगर जेब में कूवत हुई तो फाइवजी के आते ही श्रीमान फोरजी को सिपुर्दे कूड़ेदान करेंगे. जेब तो छोड़िए बेडरूम से लेकर वॉशरूम तक मोबाइलजी का साथ नहीं छोड़ेंगे. फिर मतलब क्या है रेडिएशन का?

हाँ, रेडिएशन का सवाल आप उठाएंगे जरूर, केवल तब जब आपके पड़ोसी के घर की छत पर टावर लगेगा. क्यों? क्योंकि इससे उसे चार पैसे की आमदनी हो सकती है. यानी आपकी समस्या रेडिएशन नहीं, पड़ोसी की आमदनी है और हम हिंदुस्तानी तो हैं ही कटोरे में डाले गए चार केकड़े.
हम हिंदुस्तानियों के लिए तो स्वास्थ्य की परवाह भी एक पाखंड है. यह पाखंड और पाखंड के तहत हल्ला छोड़िए. रेडिएशन का असली इलाज फालतू का हल्ला नहीं, सिर्फ और सिर्फ़ पूंजीवाद का टेंटुआ है. लेकिन आप उसका टेंटुआ क्या दबाएंगे! आपकी जेब दो-तीन हैंडसेट रखकर वह आपका टेंटुआ बहुत कसकर पकड़े हुए है. हालांकि वह हाथ जिसमें आपकी गर्दन जकड़ी हुई है, उसे अभी आप प्रेयसी के कोमल हाथ समझ रहे हैं.



Comments

  1. बेहद उम्दा....

    आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है|

    https://hindikavitamanch.blogspot.com/2019/11/I-Love-You.html

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