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Showing posts from September, 2015

चित्रकूट में शेष दिन

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हरिशंकर राढ़ी  स्फटिक शिला: चित्रकूट शहर से कुछ ही दूरी पर मंदाकिनी के तट पर यह शिला है जो स्फटिक पत्थर की ही। नदी के उस पर सुंदर घना जंगल है और कुल मिलाकर नेत्रों को बड़ी शांति मिलती है। इस शिला पर भगवान राम सीता के साथ बैठा करते थे और समय को देखते रहते थे। यहीं इंद्रपुत्र जयंत कौवे के भेश में सीता के चरणों में चोंच मारकर भागा था और श्रीराम ने सींक का तीर चलाकर दंडित किया था। यह कथा बहुत प्रसिद्ध है। लेकिन, मुझे जो चीज सबसे रोचक लगी, वह यह कि राम कितने प्रकृति प्रेमी रहे होंगे और कितना चिंतन करते रहे होंगे। उनका सीता जी के साथ प्रेम का एक सुुंदर प्रसंग रामचरित मानस में मिलता है:


एक बार चुनि कुसुम सुहाए।
निजकर भूषण राम बनाए।।
सीतहिं पहिराए प्रभु सादर।
बैठे फटिक शिला पर सुंदर।।
                            (अरण्य कांड, )
इस शिला पर राम के पैरों के चिह्न बने हुए दिखाई देते हैं। यहीं पर जयंत ने अपनी एक आंख देकर अपने प्राणों की रक्षा की थी। जयंत की वह आंख भी यहां पत्थर पर अंकित है।
जानकी कुंड:  स्फटिक शिला से रामघाट की ओर बढ़ने पर जानकी कुण्ड  मिलता है। दरअसल यह मंदाकिनी का एक घाट है जहाँ च…

इन्द्राणी के बहाने

हालांकि मीडिया के सोचने-करने के लिए हमेशा बहुत कुछ रहता है, इस वक़्त भी है. न तो किसानों की आत्महत्या रुकी है, न कंपनियों की लूट, न ग़रीबों-मज़दूरों का शोषण, न फीस के नाम पर स्कूलों की लूट. सांस्कृतिक दृष्टि से देखें देश का सबसे बड़ा पर्व महाकुंभ नासिक में और राजनीतिक नज़रिये से चुनाव बिहार में चल ही रहे हैं. मीडिया चाहे तो इनके बहाने उन बुनियादी सवालों से जूझ सकती है जिनसे जूझना देश और जन के लिए ज़रूरी है. लेकिन हमारी मीडिया ऐसा कभी करती नहीं है. इन सवालों से वह हमेशा बचती रही है और आगे भी बचती रही है. इनसे बचने के लिए ही वह कभी कुछ झूठमूठ के मुद्दे गढ़ती है और कभी तलाश लेती है. जिन मुद्दों को वह तलाश लेती है, उनमें कुछ देश को जानना चाहिए या जिन प्रश्नों की ओर देश का ध्यान जाना चाहिए, उनसे वह हमेशा बचती है. ऐसा ही एक मुद्दा इन दिनों इंद्राणी मुखर्जी का है. ख़बरें उन्हें लेकर बहुत चल रही हैं, लेकिन उन तीखे प्रश्नों से हमारी मीडिया बच कर भाग जा रही है, जो उठाए ही जाने चाहिए. वही प्रश्न उठा रहे हैं भारत संस्कृति न्यास के अध्यक्ष संजय शांडिल्य
वास्तव में कहा आ गए है हम। क़ुछ समझ में नहीं आता। हम…

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चित्रकूट में शेष दिन