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Showing posts from 2013

PANCHVATI AND NASIK

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यात्रा वृत्तांत
                                      पंचवटी में                                                                     -हरिशंकर राढ़ी ब्रह्मगिरि से वापसी
गोदावरी उद्गम के दर्शन  से संतुष्टि  लेकिन उसके जन्मस्थल पर ही प्रदूषण  से असंतुष्टि का  भाव लेकर हम वापस चले। वापसी की यात्रा सुगम थी और सूर्य का ताप कम हो जाने से सुहावनी लग गई रही थी। इस क्षेत्र में लाल बंदरों की बहुतायत है। उतरते समय वे सीढि़यों पर उछल-कूद करते हुए अपने कौतुकों से सबका मनोरंजन कर रहे थे। एक बच्चे को धमकाकर एक कपि जी ने पानी की बोतल छीनी और महोदय उसका ढक्कन किसी समझदार आदमी की तरह खोलकर पानी पीने लगे। इसके बाद एक आम देशी  नागरिक की तरह उन्होंने खाली बोतल बेपरवाह होकर किसी एक दिशा  में उछाल दी ।
 त्र्यंबक एक अद्भुत एवं दिव्य प्रभाव का तीर्थ माना जाता है। धार्मिक कर्मकांडों में श्रद्धा रखने वालों के लिए यह विशेष  महत्त्व का स्थान है। बहुत से लोग यहां केवल कालसर्प योग की शांति  के लिए  ही जाते हैं। यहां त्रिपिंडी विधि पूजन होता है तथा नारायण नागबलि पूजा तो केवल त्र्यंबकेश्वर  में ही होती है। त्र्यंबकेश्…

Triambkeshwar Darshan

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यात्रा वृत्तांत                      त्र्यंबकं गौतमीतटे --हरिशंकर  राढ़ी
मृत्युभय से मुक्ति प्रदान करने वाले महामृत्युंजय  मंत्र के आदि शब्द  --ऊँ त्र्यंबकं यजामहे ...... निश्चित  रूप से भगवान त्रयंबकेश्वर  के महत्त्व को रेखांकित करते हैं। भगवान शिव  के द्वादश  ज्योतिर्लिंगों  में त्रयंबकेश्वर  की विशिष्ट महिमा  है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रयंबकेश्वर  जैसा पवित्र स्थल, गोदावरी जैसी पवित्र नदी और ब्रह्मगिरि जैसा पवित्र पर्वत दूसरा नहीं है। गौतम ऋषि  के तप से पावन और आंजनेय हनुमान के जन्म स्थल से दिव्य यह भूमि अद्भुत प्रभाव से युक्त है। द्वादश  ज्योतिर्लिंगों में त्रयंबकेश्वर  का स्थान महत्त्वपूर्ण है। मृत्युंजय की भावना को बल प्रदान करने वाले इस ज्योतिर्लिंग की यात्रा हर आस्थावान व्यक्ति करना चाहता है। इस तीर्थ की यात्रा मैं पहले भी 2007 में कर आया था। दूसरी बार जब द्वादश  ज्योतिर्लिंग यात्रा के क्रम में घृष्णेश्वर  ज्योतिर्लिंग की यात्रा की योजना बनी तो त्र्यंबक उसमें फिर शा मल हो गया। दरअसल इस बार शिरडी  जाने का भी मन था और ये सभी जगहें महाराष्ट्र  में एक ही परिधि में पड़ती है…

Yatra Manual

व्यंग
                                        यात्रा मैनुअल                                                                                   -हरिशंकर  राढ़ी (यह व्यंग्य ‘जागरण सखी’ में प्रकाशित हो चुका है. यह दूसरी और अंतिम किश्त है। )

         स्लीपर क्लास में यात्रा के लिए जिन विशिष्ट  वस्तुओं की आवश्यकता  होती है, उनकी सूची एक्सक्लूसिवली यहां दी जा रही है। (खाना-पानी, बिस्तर-चादर जैसे सामानों का उल्लेख कर यहां मैनुअल का स्तर नहीं गिराया जाएगा।) यात्रीगण एक किता संड़सी, पेंचकस और मजबूत रस्सी प्राथमिकता के तौर पर रख लें। दरअसल, स्लीपर क्लास की कौन सी खिड़की की चिटकनी खराब है, किसका शीशा  टूटा हुआ है और कौन सी खिड़की का शटर या तो खुल नहीं रहा है या बंद नहीं हो रहा है, इसकी जानकारी संचार साधनों के इतने विकास के बावजूद आपको नहीं मिल पाएगी। बंद खिड़की को खोलने के लिए इन प्राथमिक हथियारों की नितांत आवश्यकताहोती है। मान लिया गर्मी का मौसम है और शटर या शीशा  ऊपर होकर अंटकता ही नहीं, अर्थात वह हमेशा  गिरी हुई राजनीति की स्थिति में रहता है तो आप आम आदमी होने के कारण अंदर-अंदर खौल कर रह जाने…

Yatra Manual

व्यंग्य                      यात्रा मैनुअल                                                                             -हरिशंकर  राढ़ी (यह व्यंग्य ‘जागरण सखी’ में प्रकाशित  हो चुका है)

 अगर मैं महान दार्शनिकों  और धर्माचार्यों द्वारा स्थापित इस मत को नकार भी दूं कि जीवन एक यात्रा है, तब भी आज की यात्राओं की लंबाई और यात्रियों की संख्या अकूत रह जाएगी। उद्योगी पुरुषों  द्वारा परंपरागत उद्योगों को दरकिनार करके नए-नए उद्योग स्थापित किए जा रहे हैं। शिक्षा  उद्योग, धर्म उद्योग, प्रवचन उद्योग, वासना उद्योग, रोग उद्योग, फिल्म उद्योग, टीवी उद्योग के साथ-साथ पर्यटन उद्योग खूब विकसित हुआ है। यात्राओं की भरमार हो गई। यात्रावृत्तांतों से साहित्य और इंटरनेट को भर दिया गया। यात्रावृत्तांत एक विधा के रूप में स्थापित हो गया। कुछ बुद्धिमान लेखकों और सलाहकारों ने अपने लेख के माध्यम से यात्रा की तैयारियों और सावधानियों की दीक्षा भी दी। लेकिन सच तो यह है कि यात्रा के लिए निहायत जरूरी वस्तुओं तथा सावधानियों का जिक्र आज तक किसी अखबार या पत्रिका में हुआ ही नहीं, जिसका खामियाजा बेचारा अनुभवहीन यात्री बार-बार…

बाबा की सराय में बबुए

इष्ट देव सांकृत्यायन 
इससे पहले -  वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त आयाम से विधा की ओर ब्लॉग बनाम माइक्रोब्लॉग 
अपना सामान J कमरे में टिका कर और फ्रेश होकर नीचे उतरा तो संतोष त्रिवेदी, हर्षवर्धन, शकुंतला जी और कुछ और लोग लॉन में टहलते मिले. एक सज्जन और दिखे, जाने-पहचाने से. शुबहा हुआ कि दूधनाथ जी (जो कि थे भी) हैं. अनिल अंकित जी से कुछ बतिया रहे थे, लिहाजा बीच में टोकना अच्छा नहीं लगा. मैंने कहा बतिया लेने देते हैं, अपन बाद में तय करते हैं, वही हैं या कोई और. इस बीच अरविन्द जी के साथ बैठ गए. दुनिया-जहान की बातें होती रहीं. ख़ासकर भारतीय वांग़्मय में ही मौजूद विज्ञान कथाओं की तमाम संभावनाओं की. बीच-बीच में कुछ इधर-उधर जीव-जंतुओं को लेकर व्याप्त लोकभ्रांतियों की. इस बीच सिद्धार्थ आए, उन्होंने बताया कि उन्हें सपत्नीक किसी पुराने मित्र के यहां जाना है. थोड़ी देर में आते हैं. अरवंद जी भी फ्रेश होने अपने कक्ष में चले गए. तब तक दूधनाथ जी ख़ाली हो गए थे. अकेले टहल रहे थे. मैंने सोचा पूछ ही लेते हैं. ‘क्या आप दूधनाथ जी हैं...’ मैंने हाथ बढ़ाते हुए पूछा. ‘जी हां, मैं हूं...’ उनका सौजन्यपूर्ण जवाब था. ह…

ब्लॉग बनाम माइक्रोब्लॉग

इष्ट देव सांकृत्यायन

इससे पहले :  वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त और आयाम से विधा की ओर

इस सत्र के बाद मेरे पुराने साथी अशोक मिश्र से मुलाक़ात हुई. मालूम हुआ कि अब वे वहीं विश्वविद्यालय की ही एक साहित्यक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं. ज़ाहिर है, पुराने दोस्तों से 
मिलकर सबको जैसी ख़ुशी होती है, मुझे भी हुई. हम लोग जितनी देर संभव हुआ, साथ रहे. प्रेक्षागृह के बाहर निकले तो मालूम हुआ कि अभी आसपास अभी कई निर्माण चल रहे हैं. ये निर्माण विश्वविद्यालय के ही विभिन्न विभागों, संकायों, संस्थानों और छात्रावासों आदि के लिए हो रहे थे. विश्वविद्यालय से ही जुड़े एक सज्जन ने बताया कि तीन साल पहले तक यहां कुछ भी नहीं था. जैसे-तैसे एक छोटी सी बिल्डिंग में सारा काम चल रहा था. राय साहब के आने के बाद यह सारा काम गति पकड़ सका और विश्वविद्यालय ने केवल पढ़ाई, बल्कि साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी अपनी धाक जमाने लायक हो पाया. अब तो टीचरों से लेकर स्टूडेंटों तक में (माफ़ करें, ये उन्हीं के शब्द हैं) काफ़ी उत्साह है. लोग इसे आपकी दिल्ली के जेएनयू से कम नहीं समझते. अच्छा लगा जानकर कि विश्वविद्यालय तरक्की की ओर है.
अग…

आयाम से विधा की ओर

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इष्ट देव सांकृत्यायन 
यह भी पढ़ लें : वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त 
अगले दिन सुबह मैं ठीक समय पर तैयार होकर नागार्जुन सराय आ गया. बस निकलने ही वाली थी, इसलिए और कुछ भी किए बग़ैर मैं सीधे बस में बैठ गया. बस में भरपूर हंसी-ठिठोली करते थोड़ी ही देर में हम लोग सेवाग्राम पहुंच गए. बिलकुल प्राकृतिक वातावरण में मौजूद एक बड़े से परिसर में कई छोटे-छोटे घर... प्रकृतिप्रदत्त सुविधाओं से संपन्न. खपरैल के इन्हीं  घरों में से एक में गांधी जी का ऑफिस हुआ करता था, एक में वह रहते थे और एक में भोजन करते थे. एक घर के बारे में बताया गया कि यहां एक बार जब वे बीमार पड़ गए थे, तब रहे थे. यह उनके लिए उद्योगपति जमनालाल बजाज ने बनवाया था. कुछ लोग बड़ी श्रद्धापूर्वक गांधी जी को याद कर रहे थे, कुछ उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों की चर्चा में मशगूल थे, कुछ क्रांतिकारियों के प्रति उनके दृष्टिकोण और कुछ उनके अहिंसा और सत्य पर किए गए प्रयोगों के.वैसे यशपाल के माध्यम से गांधी जी को जानने वालों की भी कमी नहीं थी. अच्छी बात यह थी कि सभी ने सच्चे गांधीवादी होने का परिचय दिया. बीच-बीच में व्यंग्यकार संतोष त्रिवेदी सबका भरपूर …

वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त

इष्ट देव सांकृत्यायन
डॉ. अरविंद मिश्र का ब्लॉग क्वचिदन्यतोsपि बहुत दिनों से पढ़ता आ रहा था. वैज्ञानिक विषयों पर और उससे इतर भी, लोकजीवन के विविध विषयों पर उनका लेखन प्रभावित करने वाला है. हमारा एक-दूसरे के ब्लॉग पर आना-जाना लगभग अच्छे पड़ोसियों जैसा रहा है, यह अलग बात है कि मुख़ातिब नहीं हो सके थे, पर होने का मन था. वयंग्यकार और आम बातचीत को भी तुकबंदी में ढालने की क्षमता रखने वाले अविनाश वाचस्पति मुन्नाभाई से काफ़ी पहले एक बार की मुलाक़ात तो थी. यह मुलाक़ात लगभग उन्हीं दिनों की थी, जब ब्लॉगबुखार वैसे ही फैल रहा था, जैसे आजकल डेंगू. उसके बाद फ़ोन पर हमारी बातचीत ज़रूर हुई, लिखना-पढ़ना तो लगा ही रहा, पर मुलाक़ात नहीं हुई. ब्लॉगिंग के बिलकुल शुरुआती दौर में ही मुलाक़ात हुई थी फ़ुरसतिया यानी अनूप शुक्ल जी से. संस्थागत मीटिंग के लिए कानपुर गया था. गीतकार साथी विनोद श्रीवास्तव से ब्लॉग में साहित्य का ज़िक्र चला तो उन्होंने बताया कि यहां फुरसतिया जी हैं. यह तो मालूम था कि अच्छा लिखने-पढ़ने वाले हैं, क्योंकि उनका ब्लॉग मैं देख चुका था.साहित्य के अलावा और भी बहुत कुछ था हिन्दिनी पर, रोचक और मह…

होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

भाई ख़ुर्शीद अनवर की फेसबुकिया दीवार से बाबा बुल्ले शाह (बुल्ला की जाणां मैं कौण .... तो सुना ही होगा आपने रब्बी शेरगिल का, वही वाले) एक दिलकश कलाम : 


होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

नाम नबी की रतन चढी, बूँद पडी इल्लल्लाह
रंग-रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फ़ना-फी-अल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

अलस्तु बिरब्बिकुम पीतम बोले, सभ सखियाँ ने घूंघट खोले
क़ालू बला ही यूँ कर बोले, ला-इलाहा-इल्लल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

नह्नो-अकरब की बंसी बजायी, मन अरफ़ा नफ्सहू की कूक सुनायी
फसुम-वजहिल्लाह की धूम मचाई, विच दरबार रसूल-अल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

हाथ जोड़ कर पाऊँ पडूँगी आजिज़ होंकर बिनी करुँगी
झगडा कर भर झोली लूंगी, नूर मोहम्मद सल्लल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

फ़ज अज्कुरनी होरी बताऊँ , वाश्करुली पीया को रिझाऊं
ऐसे पिया के मैं बल जाऊं, कैसा पिया सुब्हान-अल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

सिबगतुल्लाह की भर पिचकारी, अल्लाहुस-समद पिया मुंह पर मारी
नूर नबी डा हक से जारी, नूर मोहम्मद सल्लल्लाह
बुला शाह दी धूम मची है, ला-इलाहा-इल्लल्लाह
होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह


कैसे कहूं?

इष्ट देव सांकृत्यायन 

ज़िंदगी से ज़िंदगी ही लापता है, कैसे कहूं?
हर ज़ख़्म ही दिया हुआ आपका है, कैसे कहूं?

हुक़ूमत क़ानून की है, ऐसा कहा जाए
और ये भी हुक़्म उनके बाप का है, कैसे कहूं?
सहाफ़त से शराफ़त के सारे रिश्ते ख़त्म  सियासत सा ये धंधा पाप का है, कैसे कहूं?
किताब-ए-तर्ज़-ए-हुक़ूमत के हर सफ़े में सुन उसी के गर्ज़ का फैला रायता है, कैसे कहूं?
झोपड़ी के सामने ही महल है, पर दरमियां
करोड़ों मील लंबा फ़ासला है, कैसे कहूं?


क्या करेंगे आप?

इष्ट देव सांकृत्यायन 
इरादे बुनियाद से ही हिले हैं, क्या करेंगे आप?
झूठो-फ़रेब के ही सिलसिले हैं, क्या करेंगे आप?

इस समुंदर में रत्न तो लाखों पड़े हैं, मगर
जो मिले ख़ैरात में ही मिले हैं, क्या करेंगे आप?

हमको गुल दिखाकर खार ही कोंचे गए हैं हमेशा आब उनके बाग में ही खिले हैं, क्या करेंगे आप?

अहा, अहिंसा! शान जिनके होंठों की है शुरू से ठंडे गोश्त पर वे ही पिले हैं, क्या करेंगे आप?
एक-दो बटनें दबीं और सबके नुमाइंदे हो गए किसके क्या शिकवे-गिले हैं, क्या करेंगे आप?


मंडोर से आगे

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हरिशंकर राढ़ी 

( गतांक से आगे )
वर्तमान समय में यह लगभग 82 एकड़ के उद्यान  क्षेत्र में फैला हुआ है। मंडोर उधान की यात्रा राजस्थानी संस्कृति  का साक्षात्कार कराने में सक्षम है।  उद्यान में प्रवेश करते ही वीरों की दालान (हॉल ऑफ़ हीरोज) के दर्शन  होते हैं जो एक ही चटटान को काटकर बनार्इ गर्इ है। 18वीं शताब्दी में निर्मित वीरों एवं देवताओं की दालान मारवाड़ी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है।  उद्यान में एक संग्रहालय भी स्थापित है जिसमें तत्कालीन राजपरिवारों का इतिहास दर्शाया  गया है। इस संग्रहालय का सबसे आकर्शक पक्ष इसमें अनेक शास्त्रीय  राग-रागिनियों पर आधारित चित्रकला का प्रदर्शन  है। राग मालकोश , मधु-माधवी, आदि का विभिन्न भाव-भंगिमाओं एवं काल्पनिक परिसिथतियों के आधार पर अत्यंत भावनात्मक और कोमल चित्रांकन किया गया है।
   जनाना महल के बाहर इकथंबा महल नामक एक मीनार है जो तीन मंजिली है। इसका निर्माण महाराजा अजीत सिंह के काल (1705-1723 र्इ0) में हुआ था। परिसर में प्रचुर हरियाली और शांति  का वातावरण है। चिडि़यों का झुंड रह-रहकर आसमान को भर लेता है और उनके मधुर कलरव से मंडोर का उधान गुंजित हो जा…

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चित्रकूट की ओर

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