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Showing posts from January, 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-7

अब बात चलते-चलते मुहावरों तक आ ही गई है तो बताते चलें कि हमारे देश में एक मुहावरा है - भिगो कर जूते मारना. वैसे मैं सही कह रहा हूँ, मैं भिगो कर जूते मारना पसन्द नहीं करता. इसकी वजह यह है कि मैं जूते सिर्फ़ दो तरह के पहनता हूँ- या तो चमडे के या फिर कपडे के. इन दोनों ही प्रकार के जूतों के साथ एक बडी भारी दिक्कत यह है कि इनसे मारने पर किसी को चोट तो कम लगती है और आवाज़ ज़्यादा होती है. ख़ास तौर से चमडे वाले जूते के साथ तो बहुत बडी दिक्कत यह है कि भीगने से वे ख़राब हो जाते हैं. अब अगर जूते भीग गए तो मैं चलूंगा कैसे? ऊपर से ज्ञानदत्त जी पानी में रात भर इन्हे भिगोने की बात करते हैं. मुझे लगता है कि पिछले दिनों इन्होने अपने जो एक फटहे जूते का फोटो पोस्ट किया था, वह इसी तरह फटा होगा. जहाँ तक मेरा सवाल है, आप जानते ही हैं, आजकल हर चीज़ का दाम बहुत बढा हुआ है. सब्ज़ियां गृहिणियों के लिए जेवरों की तरह दुर्लभ हो गईं हैं और दाल के मामले में तो पहले से ही आम आदमी की दाल गलनी बन्द है. आम तौर पर आम आदमी को सिर्फ़ सूखी रोटी से काम चलाना पड रहा है. ऐसी स्थिति में मैं घर-परिवार के लिए रोटी का जुगाड करूँ या जूत

अथातो जूता जिज्ञासा-6

अजीत के अलग-अलग नाप वाले जूतों की बात पर मुझे याद आया मेरे एक धर्माग्रज विष्णु त्रिपाठी ने काफ़ी पहले जूतों पर एक कविता लिखी थी. पूरी कविता तो याद नहीं, लेकिन उसकी शुरुआती पंक्तियां कुछ इस तरह हैं : जूते भी आपस में बातें करते हैं. इसमें वह बताते हैं कि आंकडों के तौर पर एक ही नम्बर के दो जूते भी मामूली से छोटे-बडे होते हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे दो जुड्वां भाइयों में बहुत सी समानताओं के होते हुए भी थोडा सा फ़र्क़ होता है. वह बताते हैं कि जूते आपस में बातें करते हुए एक दूसरे से शिकायतें भी करते हैं और ख़ास तौर से बाएं पैर के जूते को दाएं पैर के आभिजात्य से वैसा ही परहेज होता है जैसा धूमिल के शब्दों में दाएं और बाएं हाथ के बीच होता है. आपको इस कविता की वैज्ञानिकता पर सन्देह हो सकता है, लेकिन भाई मुझे कोई सन्देह नहीं है. भला बताइए, जब जड होकर पेड तक बातें कर सकते हैं (और यह बात वैज्ञानिक रूप से सही साबित हो चुकी है) तो भला चेतन होकर जूते बातें क्यों नहीं कर सकते? वैसे करने को तो आप जूतों के चैतन्य पर भी सन्देह कर सकते हैं, लेकिन ज़रा सोचिए जूते अगर चेतन न होते तो चलते कैसे? कम से कम जूतों के चलन

अथातो जूता जिज्ञासा-5

Technorati Tags: satire , society , literature हमारे महान देश की महान जनता जूते या लाठी को केवल सहयोग देती आ रही हो, ऐसा भी नहीं है. हक़ीक़त यह है कि विभिन्न अवसरों पर जूते में अपनी अगाध आस्था भी जताती आई है और आज तक जताती आ रही है. यक़ीन न हो तो आप किसी भी चौराहे पर देख सकते हैं. हम लोग ऐसी सडकों और चौराहों पर ट्रैफिक के नियमों का पालन करना भी अपनी तौहीन समझते हैं, जहाँ जूते की तैनाती न की गई हो. इसके विपरीत जहाँ कहीं जूता दिखाई दे जाता है, वहीं हम अत्यंत ज़िम्मेदार नागरिक होने का परिचय देने को स्वयं ही आतुर हो उठते हैं. यह अलग बात है कि वह जूता कभी चालान के रूप में होता है, तो कभी डंडे के रूप में और कभी जुर्माने के रूप में. जूता न हो तो हम रेल में चलते हुए टिकट तक कटाना गवारा नहीं करते. और अपनी नीति नियामक संस्थाओं यानी संसद तथा विधान सभाओं में तो हम उन्हे भेजने लायक ही नहीं समझते जिन्हें जूता चलाना न आता हो. जूते में हमारी आस्था का इससे बेहतर प्रमाण और क्या हो सकता है! अथातो जूता जिज्ञासा के दूसरे खंड पर टिप्पणी करते हुए भाई आलोक नन्दन जी ने बताया है कि हिन्दी सिनेमा के इतिहास में भी

अथातो जूता जिज्ञासा- 4

अब तक आपने पढा   अथातो जूता जिज्ञासा - 1 अथातो जूता जिज्ञासा - 2 अथातो जूता जिज्ञासा - 3 -------------------------------------------------------------------- अब साहब युवराज तो ठहरे युवराज. रोटी वे जैसे चाहें खाएं. कोई उनका क्या बिगाड लेगा. पर एक बात तो तय है. वह यह कि पादुका शासन की वह परम्परा आज तक चली आ रही है. चाहे तो आप युवराज के ही मामले में देख लें. अभी उन्हें बाली उमर के नाते शासन के लायक नहीं समझा गया और राजमाता ख़ुद ठहरीं राजमाता. भला राजमाता बने रहना जितना सुरक्षित है, सीधे शासन करना वैसा सुरक्षित कहाँ हो सकता है. लिहाजा वही कथा एक बार फिर से दुहरा दी गई. थोडा हेरफेर के साथ, नए ढंग से. अब जब तक युवराज ख़ुद शासन के योग्य न हो जाएं, तब तक के लिए राजगद्दी सुरक्षित. हालांकि इस बार यह कथा जैसे दुहराई गई है अगर उस पर नज़र डालें और ऐतिहासिक सन्दर्भों के साथ पूरे प्रकरण को देखें तो पता चलता है कि यह कथा हमारे पूरे भारतीय इतिहास में कई बार दुहराई जा चुकी है. अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि कालांतर में वही पादुका दंड के रूप में बदल गई. उसे नाम दिया गया राजदंड. वैसे दंड

अथातो जूता जिज्ञासा - 3

Technorati Tags: satire , society , literature अब यह जो जार्ज पंचम का प्रशस्ति गान हम लम्बे समय से गाते चले आ रहे हैं, उसके पीछे भी वास्तव में जूता पूजन की हमारी लम्बी और गरिमापूर्ण परम्परा ही है. दरसल जूता पूजन की जो परम्परा हम गोसाईं के यहाँ देखते हैं, वह कोई शुरुआत नहीं है. सच तो यह है कि उन्होने उस परम्परा के महत्व को समझते हुए ही उसे उद्घाटित भर किया था. सच तो यह है कि जूता पूजन की परम्परा गोसाईं बाबा के भी बहुत पहले, ऋषियों के समय से ही चली आ रही है. हमारे आदि कवि वाल्मीकि ने ही जूते का पूजन करवा दिया था भगवान राम के अनुज भरत जी से. आप जानते ही होंगे भगवान राम के वनगमन के बाद जब भरत जी का राज्याभिषेक हुआ तो उन्होने राजकाज सम्भालने से साफ मना कर दिया. भगवान राम को वह मनाने गए तो उन्होने लौटने से मना कर दिया. आखिरकार अंत मैं उन्होने भगवान राम से कहा कि तो ठीक है. आप ऐसा करिए कि खुद न चलिए, पर अपनी चरणपादुका यानी खडाऊँ दे दीजिए. अब यह तो आप जानते ही हैं कि खडाऊँ और कुछ नहीं, उस जमाने का जूता ही है. सो उन्होने भगवान राम का खडाऊँ यानी कि जूता ले लिया. बुरा न मानिए, लेकिन सच यही है क

अथातो जूता जिज्ञासा - 2

  अथातो जूता जिज्ञासा - 1 के लिए लिंक झलक इसकी कबीर से ही मिलनी शुरू हो जाती है और वह भी बहुत परिपक्व रूप में. तभी तो कभी वह हिन्दुओं को कहते हैं: दुनिया कैसी बावरी पाथर पूजन जाए. घर की चाकी कोई न पूजे जाको पीसा खाए. और कभी मुसलमानों को कहते हैं: कांकर-पाथर जोडि के मसजिद लई चिनाय. ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय . यह सब जब वह कह रहे थे तब वास्तव में कहने के बहाने जूते ही चला रहे थे. यक़ीन न हो तो आज आप अपने तईं यह कह कर देख लीजिए. सिर पर असली के इतने जूते बरसेंगे कि फिर कुछ कहने या लिखने लायक भी नहीं बचेंगे. मैं भी अगर यह कहने की हिम्मत कर पा रहा हूँ तो कबीर के हवाले और बहाने से ही. आज अगर अपने तईं कह दूँ तो पता है कितनी तरह के और कितने जूते मुझे झेलने पडेंगे. अगर पाथर पूजने वाली बात कहूँ तो सिंघल, तोगडिया और शिवसैनिकों के डंडे झेलूँ और मसजिद वाली बात करूँ तो अल कायदा और तालिबान तो बाद में हमारे अगल-बगल की ही धर्मनिरपेक्ष ताक़तें पहले टूट पडें हमारे सिर. और भाई आप तो जानते ही हैं कबीर की 'जो घर जारे आपना' वाली शर्त मानना अपने बूते की बात तो है नहीं. क्योंकि ज

हिटलर,लेनिन और सिफलिसवाद

(गणतंत्र दिवस पर विशेष) सिफलिस को लेकर इतिहास में खूब खेल खेला गया है, और जबरदस्त तरीके से खेला गया है। विश्व नायकों को भी इसमें लपेटने की कोशिश की गई है-हिटलर और लेनिन भी इससे अछूते नहीं थे। अपने विरोधियों को सिफलिस का मरीज बताना इंटरनेशनल डिप्लोमेसी का एक प्रमुख हिस्सा रहा है। किसी महानायक को सिफलिस है या नहीं इसको लेकर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, मनोविज्ञान की दुनिया में इसका इस्तेमाल किया जाये तो और बात है। वैसे फ्रायड ने एडिपस कांप्लेक्स के नाम पर मनोविज्ञान की दुनिया में जो गंदगी उड़ेली है उसे देखते हुये कहा जा सकता है कि फ्राडय को न तो पुरातन कहानियों की समझ थी और न ही मन और विज्ञान की। एडिपस के सिर पर शुरु से ही दुर्भाग्य मडरा रहा था, इसी के वश में आकर उसने अपने पिता की हत्या कर दी थी और फिर मां के साथ उसकी शादी हुई, जिसे फ्रायड ने एडिपस कांप्लेक्स का नाम देकर पूरी दुनिया को गुमराह किया। फ्रायड की सेक्सुअल थ्योरी की सच्चाई चाहे जो भी रही हो,लेकिन उसने अपने थ्योरी के लिए एक पौराणिक कहानी का गलत तरीके से इस्तेमाल किया। अपने पिता की हत्या के पहले एडिपस अप

अथातो जूता जिज्ञासा

Technorati Tags: satire , society , literature अथातो जूता जिज्ञास्याम:. जी हाँ साहब, तो अब यहाँ से शुरू होती है जूते की जिज्ञासा. आप ठीक समझ रहे है मैं जूता शास्त्र लिखने की ही तैयारी मे हूँ. भारत मे शास्त्रो के लेखन की एक लम्बी परम्परा रही है और सभी शास्त्रो की शुरुआत इसी तरह होती है - अथातो से. अथातो से इस्की शुरुआत इसलिए होती है क्योंकि इससे यह जाहिर होत है कि इससे पहले भी इस विषय पर काफी कुछ कहा जा चुका है और आपसे यह उम्मीद की जाती है कि आप उसके बारे मे काफी कुछ जांनते भी हैं. आप जाने या न जाने, पर मै आपसे इतनी तो उम्मीद कर ही सकता हूँ कि आप कम से कम जूते और शास्त्रो के बारे मे तो जानते ही है. तो पहले बात शास्त्रो से ही शुरू करते है. भारत मे छ: शास्त्र तो प्राचीन काल से चले आ रहे है, एक सातवाँ शास्त्र इसमे महापंडित राहुल सान्कृत्यायन ने जोडा - घुमक्कड शास्त्र. अन्यथा न ले, मैं उसी परम्परा को आगे बढा रहा हूँ. आप जानते ही है, घूमने के लिए जो चीज़ सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, वह है पैर. पैर मज़बूत और सही सलामत होँ तभी घूमने का पूरा मज़ा लिया जा सकता है. पुनश्च, पैरों को सही-सलामत व मज़बूत बनाए

मल्हार गाती इतिहासकारों की टोली

हिटलर को लेकर दुनिया भर में बहुत कुछ कहा गया है,कहा जा रहा है और कहा जाता रहेगा। दुनियाभर के कलमची विश्व इतिहास में उसे महाखलनायक के रूप में स्थापित करने के लिए वर्षों से कलम घसीट रहे हैं,हिटलर शब्द को एक गाली के तौर पर स्थापित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है। क्या विश्व इतिहास में हम हिटलर का मूल्यांकन कभी निरपेक्ष भाव से करने का साहस करेंगे,साहस इसलिए कि जहां आप हिटलर के गुणों को सामने लाने की कोशिश करेंगे,लोग आपके अंदर भी रावण को देखने लगेंगे। हिटलर को मानवता का दाग बताया जाता है, क्योंकि उसने बहुत बड़े पैमाने पर यहुदियों की हत्या करवाई। सामूहिक हत्यायें तो इतिहास का अंग रहीं हैं, सिकंदर जब यूनान से अपनी सेना लेकर बढ़ा तो क्या किया था, युद्ध के बाद युद्ध, और युद्द के बाद युद्ध, और युद्ध के बाद युद्ध ! इन युद्धों को जस्टीफाई करने के लिए उसने अपने साथ इतिहासकारों की एक टोली छोड़ रखा था,जो कलात्मक तरीके से इन युद्धों को उचित ठहराते हुये सिकंदर के लिए मल्हार गाते हुये उसे एक विश्व विजेता के रूप में दर्ज कर रहे थे। स्पार्टकस के नेतृत्व में जो सेना रोमन साम्राज्य के खिलाफ खड़ी हुई थी,

अब फिल्मकारों के लिए कितनी कहानी बुन पाते हैं वो जाने

बुश युग की शुरुआत और ओबामा : क्या अमेरिका की जनता ने ओबामा को इसलिये वहां के सर्वोच्च पद पर बैठाया है कि वह काले हैं। यदि हां तो निसंदेह दुनिया आज भी रंगभेद के आधार पर बटी हुई है, और यदि नहीं तो ओबामा की ताजपोशी की गलत व्खाया क्यों की जा रही है, क्या ओबामा के पहले अमेरिकी चुनाव में कोई ब्लैक राष्ट्रपति पद के लिए खड़ा हुआ था।? क्या ओबामा ने चुनाव के पहले वहां की जनता से यह अपील की थी कि वह काले हैं इसलिए लोग उसे वोट दे? यदि नहीं, तो उसे काला राष्ट्रपति के रूप में क्यों प्रस्तुत किया जा रहा है ? इस व्याख्या के पीछे दुनिया एक गुप्त सुख का अहसास तो नहीं कर रही है ? एतिहासिक घटनाओं का संबंध मनोविज्ञान से होता है। भले ही ओबामा राष्ट्रपति के पद पर स्थापित हो गये हों, लेकिन आज भी लोगों के अचेतन में काले और गोरों को लेकर एक लकीर खीची हुई है, और इसी से अभिभूत होकर दुनिया भर में ओबामा के लिए प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति जैसे शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है। क्या इसके पहले अमेरिका के किसी राष्ट्रपति के लिए श्वेत शब्द का इस्तेमाल हुआ है? यदि नहीं तो ओबामा के लिए प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति शब्द का इस्ते

गुस्ताखी माफ़: मेरी नहीं, गालिब की

इष्ट देव सांकृत्यायन इधर देश के राजनीतिक जगत में कुछ ऎसी घटनाएं घटीं की मुझे मिर्जा गालिब बहुत याद आए. ये शेर उन्होंने लिखे तो अपने जमाने में थे, लेकिन मुझे पक्का यकीन है की किसी चुनावी ज्योतिषी से उनकी बड़ी पक्की सांठ-गांठ थी. इसीलिए उन्हें यह सब बातें पहले ही पता चल गई थीं और उन्होंने ये सारे शेर लिख डाले. अब देखिये, अलग-अलग घटनाओं या बयानों के साथ मैं आपको उनके मौजूं शेर पढ़ा रहा हूँ. यकीं मानिए, इसमें मेरा कुछ भी नहीं है. इसलिए अगर किसी को कुछ भी बुरा लगता है तो वो इसके लिए मुझे जिम्मेवार न माने. सीधे मिर्जा असदुल्लाह खान गालिब से संपर्क करे . तो लीजिए आप भी जानिए वे घटनाएं और शेर : मैं अब चुनाव नहीं लडूंगा : अटल बिहारी बाजपेई जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजूं क्या है? मैं राजनीति में सक्रिय रहा हूँ, हूँ और रहूँगा : भैरों सिंह शेखावत गो हाथ को जुम्बिश नहीं, आंखों में तो दम है रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे झारखंड में राष्ट्रपति शासन, गुरूजी आउट निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए थे बड़े बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले कल्याण सिंह और मुलायम की मुला

मन्नू और गुन्नू

(लघु कथा) तीन साल का गुन्नू हमेशा अपनी एक साल बड़ी बहन मनू के पीछे दुमछल्ले की तरह लगा रहता है। जो मनू को चाहिये, वही गुन्नू को भी चाहिये। नहीं मिलने पर हल्ला मचाएगा,गला फाड़ेगा और कभी मन्नू के मुंह पर नाखून भी मार देगा। मन्नू भी कम नहीं है। हर वक्त वह गुन्नू को रुलाने में ही लगी रहती है। किसी भी सामान को लेकर वह घर में इधर-उधर भागेगी और गुन्नू उसके पीछे दौड़ते हुये चिल्लाता रहेगा। मम्मी झपटकर अक्सर दोनों का एक साथ कूटमस कर देती है। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद यह सिलसिला फिर शुरु जाता है। पापा को बच्चों को पीटने में यकीन नहीं है। दोनों बच्चे इस बात को अच्छी तरह से समझ चुके हैं। घर में पापा का पूरा समय इन दोनों बच्चों के झगड़े सुलझाने में ही जाता है। उस दिन पापा घर में पिछले तीन घंटे से बैठकर कुछ लिखने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन मन्नू की हरकतों के कारण उन्हें बार-बार अपनी कु्र्सी से उठकर बीच बचाव करना पड़ रहा था। अंत में उनका धैर्य भी जवाब दे गया और उन्होंने मन्नू के दोनों हाथ पकड़ कर लगे उसे धमकाने, ''खबरदार जो अब तुने गु्न्नू को परेशान किया। तुझे समझ नहीं है कि तू इसकी बड़ी बहन

बड़ी कमबख्त है जिंदगी

बड़ी कमबख्त है जिंदगी जो चैन से जीने नहीं देती,खींच ले जाती है सड़कों पर,...शोर शोर शोर। स्कूली पोशाकों में थरथराते हुये बच्चे....कंधे पर कितबों का बोझ...क्या इन किताबों के सहारे भविष्य में जिंदगी का बोझ उठा पाएंगे....या फिर रेंगेंगी इनकी जिंदगी भी, करोड़ों डिग्रियोंधारियों की तरह। ठेलम ठेल में फंसी जिंदगी धक्के खाती है,सभी जगह तो कतार लगे हैं..माथे से चूता पसीना...फटे हुये जूतों में घुसे हुये पैर....न चाहते हुये भी घिसती है जिंदगी...नक्काशी करती है अपने अंदाज में अनवरत...कई बार उसकी गर्दन पकड़कर पूछ चुका हूं- तू चाहती क्या है...मुस्करा सवाल के जबाब में सवाल करती है...तू मुझसे क्या चाहता है...तुने खुद तो धकेल रखा है मुझे लोगों की भीड़ में,पिचलने और कुचलने के लिए...उठा कोई सपनीली सी किताब और खो जा शब्दों के संसार में......या तराश अपने लिए कोई सपनों की परी और डूब जा उसकी अतल गहराइयों में। दूसरों के शब्द रोकते तो हैं, लेकिन उस ताप में तपाते नहीं है,जिसकी आदत पड़ चुकी है जिंदगी के साथ...सपनों के परी के बदन पर भी कई बार हाथ थिरके हैं,लेकिन खुरदरी जिंदगी के सामने वो भी वह भी फिकी लगती है...ब

मोदी के सामने बुजुर्गों का आर्शिवाद पाने की चुनौती

आद्योगिक समूहों की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का जिस तरह से नाम उछाला गया है,वह निसंदेह भाजपा के ऊपर दबाव बनाने का एक तरीका है,जो आगामी लोकसभा चुनाव में नेतृत्व को लेकर अंतकलह के दौर से गुजर रही है। निसंदेह इससे प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की दावेदारी को मजबूती मिलेगी, और पार्टी में हर स्तर पर मोदी को लेकर लॉबिंग तेज होगी। प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पर सार्वजनिकतौर पर मुहर लगाने के पहले नरेंद्र मोदी को अभी भाजपा के अंदर ही नाना प्रकार के खेल खेलने होंगे। वाजपेयी जेनरेशन के कई नेता इस पद के इंतजार में बुढ़े हो चुके हैं और आसानी से मोदी के नाम पर सहमति के लिए तैयार नहीं होंगे। मोदी को पूरे सम्मान के साथ इन थके हुये नेताओं के साथ जुगलबंदी करते हुये आगे बढ़ना होगा। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि एक बहुत बड़ा तबका मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर देखने का न सिर्फ सपना देख रहा है,बल्कि इस सपने को जमीन पर उतारने के लिए कमर कसे हुये है। भाजपा के थके हुये नेताओं पर इस तबके को अब यकीन नहीं है,क्योंकि विगत में सत्ता में आने के बाद उन्होंने जो कुछ किया है वह श

खबर टीआरपी के लिए की फिलॉसफी नहीं चलेगी

मीडिया अपनी विश्वनीयता किस कदर खो चुकी है इसका अंदाज लगाना सहज है। आंकड़ों की भाषा में बात करें तो, आप प्रत्येक दसवें आदमी से पूछे,दस में से आठ लोग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का मुंह बंद करने के पक्ष में मजबूती से खड़ा मिलेगा। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रति आम जनता का यह तत्कालिक गुस्सा नहीं है, यह वर्षों से धीरे-धीरे पल रहा है। वर्षों से ये लोग अपने को खुदा समझने की गलती कर रहे थे। अभी सुनने में आया है कि इनलोगों ने अपने लिए एक गाइड लाइन तैयार किया है। यदि वास्तव में एसा कुछ हुआ है, तो सूचन के अधिकार के तहत उस गाइडलाइन को सार्वजनिक किया जाये। और साथ ही ये लोग यह भी बताये कि इस गाइड लाइन को पूरी मजबूती से लागू करने की क्या व्यवस्था है। पहले ये लोग जनहित को परिभाषित करे। टीआरपी के चक्कर में पड़े, जरूर पड़े (वैसे टीआरपी के मैकेनिज्म को भी परखने की जरूरत है। ),लेकिन जनहित को अनदेखी कर के नहीं। ये तभी होगा जब ये लोग जनहित को परिभाषित करेंगे। चिरकुटई की सारी सीमा ये लोग पार कर चुके है। चैन से सोना है तो जागते रहो,कहीं भी हो सकता है क्रिमिनल..ये सब क्या है। लोगों के दिमाग में खौफ भरने वाली बात है। कि

मीडिया को अपने तरीके से भौंकने दो

मुंबई पर लादेनवादी हमले के बाद मीडिया ने गैरजिम्मेदार भूमिका तो निभाई ही, अब लादेनवादियों से निपटने में नाकाम सरकार मीडिया पर लगाम लगाने की तैयारी करके अपनी गैर जिम्मेदारी की सजा गैरजिम्मेदार मीडिया को देने पर तुली हुई है। देश की जनता मीडिया को बुरी तरह से लत्तम-जुत्तम कर कर चुकी है। और मीडिया के अंदर भी अपनी खुदी की भूमिका को लेकर मंथन चल रहा है। एसे में सरकार अपना पूरा ध्यान देश की अंदरूरी समस्या के साथ-साथ सीमाओं को चाक चौबंद करने में लगाये तो ज्यादा बेहतर होगा। मीडिया चाहे कितनी भी जिम्मेदार हो, लेकिन बातों को लोगों तक पहुंचा तो देती है। विभिन्न मुल्कों में प्रेस की मुक्ति के लिए लोगों ने लंबा संधर्ष किया है। अपने देश में भी ब्रिटिश हुकूमत के मीडिया को कुचलने की भरपूर कोशिश की गई है। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी समय-समय पर मीडिया के मुंह को बंद करने की कोशिश कर चुके हैं। और इसका क्या नतीजा निकला सबको पता है। अत मीडिया को रेग्यूलेट करने की बात गलत है। इसका यह मतलब नहीं है कि मीडिया को बेलगाम छोड़ दिया जाये। मीडिया के लिए एक कोड आफ कंडक्ट की जरूरत तो है ही। बेहतर होगा तमामा मीडिया

सुभाष चंद्र बोस अभी भारत में होते

सुभाष चंद्र बोस अभी भारत में होते और यह सुनते कि कांग्रेस के अंदर प्रधानमंत्री पद के नाम के लिए कोर्ट सेवा हो रहा है तो वह क्या करते। कांग्रेस में उनको कार्य कहां करने दिया गया। उस वक्त इतिहास गांधीवाद की लपेट में था। क्या कांग्रेस के अंदर अब कहीं सुभाष चंद्र बोस की धारा बह रही है या वह भी इतिहास में दफन हो गया है। अभी देश का मामला है,मुंबई में चली गोलियों का मामला है। एक ओर पाकिस्तान के साथ गलथेरी करने में लगी हुई सरकार, और दूसरी ओर प्रधानमंत्री पद के लिए अभी से नब्बे डिग्री पर झुकी हुई है कांग्रेस है। पूछों प्रधानमंत्री पद की बात करने वालों से...आतंकवाद के साथ दो- दो हाथ करने के बारे में क्या सोचता है, एक समय था जब पीस सेना श्रीलंका में राजीव गांधी ने भेजा था..कांग्रेस का सारा डोकोमेंटशन पर सोनिया गांधी कहीं नहीं है, कम से कम सरकारी लेवल पर तो बिल्कुल ही नहीं...क्या इंदरा गांधी की हत्या एग्रेसिव सिख मूवमेंट के कारण हुई थी, या मामला कुछ और था। देखने वाली बात यह है कि भारत किधर बह रहा है...और किधर बहेगा। नमस्खार....नारे बनाओ, बातों को दूर तक पहुंचाओ...लेकिन नये नारों के लिए नये गी

भाड़े की लौंडिया थिरके या नहीं, पर देश जरूर थिरकेगा

एक डॉक्टर जब खुदा का उम्र पूछता है तो मुझे नीत्शे याद आता है, जिसने खुदा के मौत की घोषणा की थी। चिपलूकर की ठंडे खून पर आकर ध्यान अटक जाता है। इधर-उधर की साइट पर नजर दौड़ाते हुये कई बार कोशिश करता हूं कि इन दोनों को दिमाग से झटकू, लेकिन दोनों एक साथ उथल पुथल मचाते हैं। नीत्शे युद्ध-गीत लिखता था, और कहता था ईश्वर मर चुका है, जबकि डॉक्टर ईश्वर की उम्र पूछ रहे हैं। अब यदि नीत्शे में विश्वास करे तो खुदा उसी दिन मर गया था, जिस दिन उसने उसके मौत की घोषणा की थी, कम से कम नीत्शे के लिए तो मर ही गया था। मौत से पहले खुदा के जन्म के रहस्य को सुलझाना जरूरी है। इसका जन्म कैसे हुआ ,नर से या मादा से,या दोनों के सम्मिलन से। पुराने बाइबिल का खुदा बादलों की ओट में चलता था और वही से आदेश देता था, यूनान और भारत वर्ष का खुदा कई रूप में था। कुरान का खुदा भी अदृश्य था। खुदा एक कलेक्टिव अवधारणा है या नीत्शे की खुदा की तरह सबजेक्टिव ? किसी ने कहा था, खुदा ने इनसान को नहीं, बल्कि इनसान ने खुदा को जन्म दिया है। यदि डार्विन पर यकीन करे तो, इनसान क्रमश विकास का एक रूप है, इसी तरह खुदा भी क्रमश विकास का परिणाम है।

याद आती तो होगी मेरी आवारगी तुझे

दूर तलक ले जाती थी, मेरी आवारगी तुझे संग संग उड़ा ले जाती थी मेरी आवारगी तुझे मेरे बहकते हुये कदमों से,जब सिमटती थी तुम हौले से थपथपती थी मेरी आवारगी तुझे। ठिठुरती हुई रात में अलाव के करीब किसी अजनबी मजदूर से बीड़ी लेकर मैं आता था करीब तेरे,गर्माहट लिये धूम सी दमकाती थी मेरी आवारगी तुझे । सूनी सड़को पे यूंही पिछलते हुये रात के साथ संग-संग चलते हुये अनकही बातों पर मुस्काराते हुये झुमाती थी मेरी आवारगी तुझे। आंखों में मचलती शरारत लिये रातो को ठहरने को कहती थी तू तेरे कांधों से नीचे सरकते हुये डुबोती थी मेरी आवारगी तुझे। कहते है कि बदली है जमाने की हवा ठंडी सड़कों पर अब अंगारे बिखरे हैं तेरी परछाई भी अब मयस्सर नहीं पर याद आती तो होगी मेरी आवारगी तुझे ?

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