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Showing posts from January, 2008

मोहल्ले का चार सौ बीसा

आज एक मजेदार बात. मोहल्ले ने आज अपने चार सौ बीस पोस्ट पूरे कर लिए. वही अविनाश भाई वाले मोहल्ले ने. मैंने अचानक अपना ब्लोग खोला तो वहाँ मोहल्ले के हिस्से में मुझे यह जानकारी मिली. मुझे एक घटना याद आई. उन दिनों में गोरखपुर में ही था और वहाँ दैनिक जागरण का सिटी रिपोर्टर था. एक सुनसान दिन था. ऐसा दिन कि खबरें न के बराबर थीं और पन्ने पूरे करने थे. विज्ञापन भी ज्यादा नहीं थे. मजबूरन में अपने रिपोर्टर बंधुओं से कह रहा था कि भाइयों कुछ करो. सब कुछ करने के बावजूद जब पेज पूरे नहीं हुए तो मैंने एक-एक बंधु से उनकी बीट के हाल लेने शुरू किए. टेलीफोन विभाग उन दिनों देखते थे गिरीश. उन्होने हँसते हुए बताया कि हमारे यहाँ तो आजकल सिर्फ चार सौ बीसी की चर्चा चल रही है. मैंने डिटेल जानना चाह तो उन्होने बताया कि टेलीफोन विभाग इन दिनों एक नंबर को लेकर परेशान है. नंबर है 33420 और यह जिसे दिया जाता है वही दस-बीस दिन में तंग आकर लौटा जाता है. तब इतनी आसानी से फोन नहीं मिलते थे. उस पर लौटा जाना. यह तो गजब की गुस्ताखी है. कारण पूछने पर पता चला कि वह नंबर मिलते ही जाने कहाँ-कहाँ से अनजान फोन आने लगते हैं और सिर्

विस्फोट : बौद्धिक विमर्श में प्रामाणिकता और शुचिता की मिसाल

कृपया इसे किसी हार - जीत के रूप में न देखें । सवाल बौद्धिक विमर्श में प्रामाणिकता और शुचिता बनाए रखने का है । ये किसी भी हार - जीत से बड़ी चीज है । हमें ये कामना करनी चाहिए कि जो प्रामाणिक नहीं होगा , वो नष्ट हो जाएगा । जैसा कि मैंने पहले भी लिखा था - इससे मैकाले के बारे में कुछ बदल नहीं जाएगा । लेकिन न्याय की इमारत सच की बुनियाद पर खड़ी हो तो बेहतर । - दिलीप मंडल संजय तिवारी चाहते तो ऐसा नहीं भी कर सकते थे । और वो ऐसा नहीं करते तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता ? लेकिन संजय तिवारी ने वो किया जिसका मौजूदा दौर में घनघोर अभाव है । बात इतनी - सी थी कि मैंने रिजेक्टमाल, इयत्ता और कबाड़खाना पर एक पोस्ट डाली थी । पोस्ट तो अपने चंदू भाई के एक लेख की प्रतिक्रिया में थी । लेकिन साथ में इस बात का जिक्र था कि कुछ जगहों पर ( बतंगड़ , विस्फोट और आजादी एक्सप्रेस का मैंने जिक्र किया था , वैसे ये बात है कई और जगहों पर भी ) मैकाले को जिस तरह से उद्धृत किया जा

मुर्दा आचरण के खिलाफ

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इष्ट देव सांकृत्यायन आज वह दिन है जब आचार्य रजनीश ने इस दुनिया से विदा ली थी. आचार्य रजनीश से मेरी कभी मुलाक़ात तो नहीं हुई, रूबरू कभी उनको देखा भी नहीं. जब तक वह थे तब तक उनके प्रति में भी वैसे ही विरोध भाव से भरा हुआ था, जैसे वे बहुत लोग हैं जिन्होंने उनको ढंग से पढा-सूना या जाना नहीं. और यह कोई आश्चर्यजनक या अनहोनी बात नहीं हुई. मैंने उन्हें जाना अचानक और वह भी कबीर के मार्फ़त. हुआ यों कि में अपनी बड़ी बहन के घर गया हुआ था और वहाँ जीजा जी के कलेक्शन में मुझे एक किताब मिली 'हीरा पायो गाँठ गठियायो'. यह कबीर के कुछ पदों की एक व्याख्या थी. सचमुच यह हीरा ही था, जिसे मैंने गाँठ गठिया लिया. कबीर के पदों की जैसी व्याख्या रजनीश ने की थी, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ तक कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्य के बडे आलोचकों और व्याख्याकारों से भी नहीं मिल पाई थी. हालांकि तब मैंने उसे अपनी काट-छाँट के साथ पढा था. चूंकि पूरी तरह नास्तिक था, आत्मा-परमात्मा में कोई विश्वास मेरा नहीं था, इसलिए जहाँ कहीं भी वैसी कोई बात आई तो मैंने मन ही मन 'सार-सार को गहि रही, थोथा देई उड़ाय' वाले भाव

कविता

झूठ : चार दृश्य (१ ) जब मैं झूठ बोलता हूँ तो लोग कहते हैं - यह आदमी बडा अच्छा है । (२ ) जब मैं झूठ बोलता हूँ तो मेरी भाषा में प्रवाह होता है , मन में विश्वास , स्वर में ओजस्विता एवं मिठास का विचित्र सा एहसास होता है । (३) झूठ के पाँव नहीं होते , इसके पंख होते हैं , झूठ उड़ता है । (४ ) झूठ : सच का सौतेला भाई माँ की कृपा से प्रगति कर गया है ।

ghazel

सजा अपनी बचा के आप भी रखिये अभी दुआ अपनी । दरख्त ढूंढ रहा है अभी हवा अपनी । वो क्या हुई जो बनाया था कभी ढूंढ कर हार गया वह जमीं खुदा अपनी । एक फरिश्ता जिसे था सच का गुमा काट कर दे गया जुबा अपनी । तमाम लोग हमारे ही राज करते हैं यही उम्मीद है अपनी यही सजा अपनी । इन अंधेरों की बात मानी तो खुद बुझा दोगे तुम शमां अपनी । अगले सावन को भी वो जेठ बना जाएगा भूल कर भी न उसे तश्नागी दिखा अपनी । मेरी बस्ती की तरफ चाँद अब नहीं आता सहम के उसने बदल दी है अब दिशा अपनी । हमारे अश्क हैं Rarhi और खरीदार हमीं चलेगी कब तलक दुकान ये भला अपनी ।

इतिहास का कोई अंतिम सच या निर्णायक पाठ नहीं होता

- दिलीप मंडल मैकाले पर फिर से बात करनी है । एक इनविटेशन से ट्रिगर मिला था । फिर मैकाले के बारे में जानने समझने की कोशिश की । कुछ लिखा भी । उस पर एक लेख आया चंद्रभूषण जी का । चंद्रभूषण या अपनों के लिए चंदू , उन लोगों में हैं जो बोलते / लिखते हैं , तो गंभीरता से सुनना / पढ़ना पड़ता है । उनके कहे में सार होता है । हल्की बातें वो नहीं करते । इसलिए मैकाले को पिछली कुछ रातों में जग - जगकर एक बार फिर पढ़ा । अनिल सिंह यानी रघुराज जी कहेंगे कि पोथी के पढ़वैया को फिर से कोई दोष होने वाला है । लेकिन अनिल जी , हम भी क्या करें । हमें पढ़ने का मौका हजारों साल के इंतजार के बाद मिला है । नए मुल्ला की तरह अब हम ज्यादा प्याज खा रहे हैं । किसी भूखे इंसान को भकोस - भकोस कर खाते देखा है आपने ? अभी तो हम बहुत पढ़ेंगे और बहुत लिखेंगे । झेलिए , उपाय क्या है ? लेकिन बात शुरू हो उससे पहले एक टुकड़ा मैकाले के बारे में , जो हर्ष के ब्लॉग में है , संजय तिवारी जी के ब्लॉग म

खेल भावना की ऐतिहासिक मजबूरी

केशव सिडनी में हुए कोलाहल के बाद आज से पर्थ टेस्ट शुरू हो गया और पहली इनिंग्स में भारत ने ठीक प्रदर्शन भी कर दिया. अब चूँकि सबका गुस्सा थोडे काबू में आ गया है तो चलिए ज़रा कुछ कठोर और कटु सत्यों पर बात की जाए. चाचा नेहरू का मैं प्रशंसक हूँ और उनकी तमाम बातों में मुझे काफी सार भी नज़र आता है, पर पहले एशियन खेलों के उद्घाटन पर उन्होने एक लाइन कही थी उससे मैं कतई इत्तेफाक नही रखता. उनका कहना था कि खेल को जीत या हार के तराजू में तौलने के बजाये खेल की भावना से खेला जाना चाहिए. मेरा मानना कुछ और है. जिन्हें मानव इतिहास और मानव के विकास कि ज्यादा जानकारी नही है वे ऐसी बातें करें तो समझ में आता है. ये बात काबिले गौर है कि संस्कृति के विकास के बाद मनुष्य ने अपने अन्दर छिपी आदिम आक्रामकता को संभ्रांत तरीके से प्रदर्शित करने के लिए खेल ईजाद किये. लेकिन नियम और कायदों की आड़ खड़ी करने के बावजूद ये बात जल्दी ही साफ हो गई कि जैसे ही खेल कि गहमा गहमी बढ़ती तो आदमी के अन्दर छिपा हुआ जानवर अपने पूरे जंगली स्वरूप में बाहर आ जाता. ये स्थिति रोमन काल से ही चली आ रही है और मानव के विकास के १० लाख साल के इत

12 जनवरी 2008 की आधी रात के बाद विवेकानंद को पढ़ते हुए...

अद्वैत मत की ध्वजा पश्चिम में लहराने वाले स्वामी विवेकानंद का आज जन्मदिन है। इसलिए विवेकानंद को नए सिरे से पढ़ना शुरू किया- खंड एक, फिर दो, फिर कुछ चिट्ठियां और खंड तीन। खंड तीन में स्वामीजी का मद्रास के विक्टोरिया हॉल में भाषण। विश्व धर्म महासम्मेलन के बाद मद्रास में उनका स्वागत हुआ। भीड़ इतनी थी कि स्वागत समारोह में उनका भाषण नहीं हो पाया। यही भाषण बाद में विक्टोरिया हॉल में दिया गया। पूरा भाषण आप इस साइट पर देख सकते हैं। यहां उस भाषण के एक अंश का अनुवाद प्रस्तुत है। मूल इंग्लिश उसके नीचे पढ़िए। ये अंश इसलिए, क्योंकि ये विवेकानंद की उस बहुचर्चित-ज्ञात छवि से प्रस्थान है, जिसके बारे में सभी जानते हैं। पढ़िए विवेकानंद को : "समाज सुधारकों की पत्रिका में मैंने देखा कि मूझे शूद्र बताया गया है और चुनौती दी गई है कि शूद्र संन्यासी कैसे हो सकता है। इस पर मेरा जवाब है : मैं अपना मूल वहां देखता हूं जिसके चरणों में हर ब्राह्मण ये कहते हुए वंदना करता है और पुष्प अर्पित करता है - यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नम:। और जिनके पूर्वपुरुष क्षत्रीय में भी सबसे पवित्र गिने जाते हैं। अगर आप अपने

भारतीय समाज की गुत्थियां और 21वीं सदी में विवेकानंद का आह्वान

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- दिलीप मंडल "पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिंदू धर्म के समान इतने उच्च स्वर से मानवता के गौरव का उपदेश करता हो, और पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिंदू धर्म के समान गरीबों और नीच जातिवालों का गला ऐसी क्रूरता से घोंटता हो।" "अब हमारा धर्म किसमें रह गया है? केवल छुआछूत में - मुझे छुओ नहीं , छुओ नहीं। हम उन्हें छूते भी नहीं और उन्हें ‘दुर’ ‘दुर’ कहकर भगा देते हैं। क्या हम मनुष्य हैं?" "भारत के सत्यानाश का मुख्य कारण यही है कि देश की संपूर्ण विद्या-बुद्धि राज-शासन और दंभ के बल से मुट्ठी भर लोगों के एकाधिकार में रखी गयी है।" "यदि स्वभाव में समता न भी हो, तो भी सब को समान सुविधा मिलनी चाहिए। फिर यदि किसी को अधिक तथा किसी को अधिक सुविधा देनी हो, तो बलवान की अपेक्षा दुर्बल को अधिक सुविधा प्रदान करना आवश्यक है। अर्थात चांडाल के लिए शिक्षा की जितनी आवश्यकता है, उतनी ब्राह्मण के लिए नहीं।" "पुरोहित - प्रपंच ही भारत की अधोगति का मूल कारण है। मनुष्य अपने भाई को पतित बनाकर क्या स्वयं पतित होने से बच सकता है? .. क्या कोई व्यक्ति स्वयं

चतुष्पदी

हो गए बस में अगर एक पागल चाह के फूल बन जाएंगे खुद सारे कांटे राह के इक ज़रा सी जिंदगी की फिक्र इतनी किसलिए चल रहा ब्रह्माण्ड जब बिन किसी परवाह के

ग़ज़ल

हमे एक जगह भारतेंदु जी की ग़ज़ल मिली और जान कर ताज्जुब हुआ कि वे इस विधा मे भी लिखते थे । इस लिए देखें तो हिन्दी कवियों द्वारा भी इस विधा का इस्तेमाल पहले से होता आ रहा है .इसी लिए उसे यथावत पेश कर रहा हूँ ताकि आप लोग भी इसे पढ़ सकें- "फिर बहार आई है, फिर वही सागर चले । फिर जुनूँ ताजा हुआ, फिर जख्म दिल के भर चले।। तिरुए दीदार हूँ उस अब रूए खमदार का, क्‍यों न गर्दन पर मेरे रुक-रुक के यों खंजर चले। माल दुनिया वक्‍ते रेहतल सब रहा बालाए ताक, हम फकत बारे गुनाह को दोष पर लेकर चले। खाकसारी ही है माजिब सखलंदी की मेरे, काट डालूँ सिर अगर मनजूँ मेरा तनकर चले। मौत पर मेरे फरिश्‍ते भी हसद करने लगे, दोश पर अपने मेरा लाश वो जब लेकर चले। दागे दिल पस पर सूरते लाला मेरा तमजा हुआ, वह चढ़ाने के लिए जब फूल मसकद पर चले। खानए जंजीर से एक शोरगुल बरपा हुआ, दो कदम भी जब दरे जिंदा से हम बाहर चले। दम लबों पर है तुझे मुतलक नहीं आता दयाल, काम अब तो खंजरे खूँख्‍वार गर्दन पर चले। इस कदर है जाकै ताली हम पै फुरकत में तेरी, बैठ जाते हैं अगर दो गाम भी उठकर चले। गर्दिशे किस्‍मत से हम मायूस होकर ऐ 'रसा

ग़ज़ल

अब सुनाई ही नहीं देती है जनता की पुकार। इस तरह छाया हुआ है उनपे गद्दी का खुमार ॥ अब दुकानों से उधारी दूर की एक बात है- जब बगल वाले नहीं देते हैं अब हमको उधार ॥ लाँघ पाना या गिरा पाना जिसे मुमकिन नहीं - हर दिलों के दरमियाँ नफरत की है ऊँची दिवार॥ सैकड़ों बगुलों ने मिल घेरा है एक दो हंसों को- लगता नामुमकिन है लाना अब सियासत में सुधार॥ खुद की कुर्बानी का जज्बा गुम गया जाने कहाँ- इस शहर में हर कोई है लूटने को अब तयार॥ -विनय ओझा 'स्नेहिल '

क्रिकेट के बहाने ऑस्ट्रेलियाई समाज का पोस्टमार्टम

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एक सौ बीस साल में एक ही मूल निवासी ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर... ... और शिकायत ये कि भारत में नीची जाति वालों को क्रिकेटर बनने का मौका नहीं दिया जाता । ये सच है कि भारतीय क्रिकेट टीम में कोई दलित नहीं है । इस समय तो कोई ओबीसी - बनिया भी नहीं है । आदि वासी भी कोई नहीं है । भारत की लगभग 75 फीसदी आबादी जिन समुदायों को लेकर बनती है , शायद किसी संयोग की वजह से (?) वो भारतीय क्रिकेट टीम में नदारद है । ये एक ऐसी समस्या है जिससे भारत को निबटना ही होगा । भारतीय विविधता का जीवन के अलग अलग क्षेत्रों में नजर न आना खतरनाक है और ये हमारे समय की एक गंभीर गंभीर समस्या है । लेकिन आश्चर्यजनक बात ये है कि भारतीय क्रिकेट में जातिवाद की बात उस ऑस्ट्रेलया में चल रही है जहां क्रिकेट में नस्लवाद की जड़े बेहद गहरी हैं । ऑस्ट्रेलियाई मूल निवासी यूरोपीय पादरियों के आने के बाद से ही क्रिकेट खेल रहे हैं । 1868 में पहली बार मूल निवासियों की क्रिकेट टीम इंग्लैंड पहुंची और उसने 115 दिन

...तो ऑस्ट्रेलियाई हमें पढ़ाएंगे जाति का पाठ!

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- दिलीप मंडल ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख अखबार सिडनी मॉर्निंग हेरॉल्ड को लगता है कि भारतीय क्रिकेटरों के सेलेक्शन में जातिवाद चलता है । सिडनी मॉर्निंग हेरॉल्ड ने आज खत्म हुए टेस्ट मैच में खेलने वाले क्रिकेटरों की एक गलत - सही टाइप की लिस्ट छापी है । आप लोग भी देख लीजिए : ब्राह्मण - अनिल कुंबले , राहुल द्रविड़ , वीवीएस लक्ष्मण , सचिन तेंडुलकर , सौरव गांगुली , आर पी सिंह (?), इशांत शर्मा जाट - युवराज सिंह राजपूत - महेंद्र सिंह धोनी मुसलमान - वसीम जाफर सिख - हरभजन सिंह . पूरी खबर के लिए सिडनी मॉर्निंग हेरॉल्ड साइट के इस लिंक पर क्लिक कर लीजिए । इसके साथ एक और लेख पढ़ लीजिए , जो है तो चार साल पुराना , लेकिन क्रिकेट की जाति चर्चा में इसका जिक्र आ रहा है । वैसे भारतीय क्रिकेट में जाति के आधार पर भेदभाव और दलित क्रिकेटर विनोद कांबली (54.20 का एवरेज और 227 का अधिकतम स्कोर ) की सिर्फ 17 टेस्ट के बाद विदाई जैसी मार्मिक बातें छापने वाले सिडनी मॉर्निंग हेरॉल्ड के स

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